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Agra News: तब देश की आजादी के लिए चंबल के डकैतों ने उठा लिए थे हथियार

Sun, 30 Nov 2025 02:27 AM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Sun, 30 Nov 2025 02:27 AM IST
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Then the Chambal dacoits took up arms for the freedom of the country.
क्रांतिकारी गेंदालाल दी​क्षित की जयंती पर विशेष: प्रतिमा
बाह। भदावर की बलिदानी माटी में 30 नवंबर 1988 में मई गांव में जन्में गेंदालाल दीक्षित क्रांति के कमांडर इन चीफ बने। उनकी अगुआई में चंबल के बागियों ने देश की आजादी के लिए अपनी बंदूकें उठाई थी। अफसोस आजादी के बाद से अब तक उनके गांव में प्रतिमा तक नहीं लग सकी है।
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गांव आने वाले बड़े-बुजुर्ग उनके घर के अवशेष में माथा टेकते हैं तो परिजन उनके बलिदान पर गर्व और गौरव से भर जाते हैं। लेकिन उपेक्षा से आहत हैं। परिजन चाहते हैं कि सरकार उनके लिए कुछ करे या न करे, गेंदालाल दीक्षित की यादों का स्मारक बनवा दे। दो साल पहले क्रांतिकारी के जीवनीकार शाह आलम के नेतृत्व में मई गांव स्थित खंडहर में शिलालेख स्थापित किया गया था। शाह आलम राना ने बताया कि 21 फरवरी 1915 में राष्ट्रीय क्रांति के आगाज से पहले आजादी के आंदोलन को धार देने के लिए गेंदालाल दीक्षित ने चंबल के बागी सरदार पंचम सिंह समेत 30 डकैतों का हृदय परिर्वतन कर मात्र वेद संस्था बनाई। 1916 में वह संस्था के कमांडर इन चीफ बने। पंचम सिंह को अध्यक्ष, लक्ष्मणानंद और ब्रह्मचारी को संगठन कर्ता बनाया। संस्था में 500 घुड़सवार, 2000 पैदल सैनिक थे, संस्था का कोष 8 लाख रुपये था। संगठन को चलाने के लिए 40 लोगों की केंद्रीय समिति बनी, जिसमें 30 चंबल के बागी और 10 क्रांतिकारी शामिल थे। इन 10 क्रांतिकारियों में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल भी थे।
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ब्रिटिश हुकूमत ने क्रांति को कुचलने के लिए चंबल के मोर्चे पर पुलिस कप्तान यंग को भेजा। मैनपुरी डकैती को अंजाम देने से पहले ब्रिटिश पुलिस से हुई मुठभेड़ में 35 क्रांतिकारी शहीद हो गए। गेंदालाल दीक्षित को गिरफ्तार कर लिया। आजाद हुए तो मई गांव में गेंदालाल दीक्षित के घर पर और कोटा में भाई के घर पर सीआईडी बैठा दी। 3000 का इनाम घोषित कर दिया। लेकिन जीते जी अंग्रेज सेना उनको पकड़ नहीं सकी। शरीर कमजोर होने के साथ ही क्षय रोग ने गेंदालाल दीक्षित को चपेट में ले लिया। दिल्ली में एक कोठरी में उनकी पत्नी फूलमती उनके साथ थी। हालत बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के अरबन अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां 21 दिसंबर 1920 को अंतिम सांस ली।
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