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कासगंज बवालः नफरत नहीं, यहां की फिजा में है भगवान का गान और अल्लाह की अजान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला कासगंज
Updated Mon, 29 Jan 2018 06:10 PM IST
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गांधी चौक
- फोटो : अमर उजाला
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कासगंज ने हमेशा अमन का पैगाम दिया है। इस शहर की फिजा में नफरत नहीं, मोहब्बत घुली है। जब भी मौका पड़ा, सभी ने मिलजुल कर उसका सामना किया। हिंसा की चिंगारी को कभी शोला नहीं बनने दिया।
मिश्रित आबादी में भी नफरत का बीज नहीं पनप पाया। जाति और धर्म की सरहदों के परे शहर को संवारने का काम किया है। इसका उदाहरण है नदरई बाजार का गांधी चौक। सालों से इस चौक की देखरेख नगर पालिका परिषद कर रही है। मगर, इसके सुंदरीकरण में सभी ने एक साथ अपने हाथ आगे बढ़ाए।
वर्ष 2003 में तत्कालीन सांसद सलीम इकबाल शेरवानी रहे हों या फिर पालिका सदस्य नुस्ताक अहमद, परवीन बेगम, चौधरी अहमद मुशीर, इन सभी ने तत्कालीन पालिका अध्यक्ष डा. शशिलता चौहान, विधायक मानपाल सिंह के साथ मिलकर गांधी प्रतिमा के सुंदरीकरण में अपना सहयोग दिया।
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मिश्रित आबादी में भी नफरत का बीज नहीं पनप पाया। जाति और धर्म की सरहदों के परे शहर को संवारने का काम किया है। इसका उदाहरण है नदरई बाजार का गांधी चौक। सालों से इस चौक की देखरेख नगर पालिका परिषद कर रही है। मगर, इसके सुंदरीकरण में सभी ने एक साथ अपने हाथ आगे बढ़ाए।
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वर्ष 2003 में तत्कालीन सांसद सलीम इकबाल शेरवानी रहे हों या फिर पालिका सदस्य नुस्ताक अहमद, परवीन बेगम, चौधरी अहमद मुशीर, इन सभी ने तत्कालीन पालिका अध्यक्ष डा. शशिलता चौहान, विधायक मानपाल सिंह के साथ मिलकर गांधी प्रतिमा के सुंदरीकरण में अपना सहयोग दिया।
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वर्ष 1950 में भी इसी तरह से सभी ने एकजुट होकर इस गांधी प्रतिमा को संवारने में अपने हाथ आगे बढ़ाए थे। यह तो सिर्फ एक मिसाल है। मोहब्बत और एकजुटता का पैगाम देने वाले ऐसे तमाम उदाहरण हैं। लड़ना, झगड़ना, शहर को दंगे की आग में धकेलना या नफरत के बीज बोना, इस शहर के स्वभाव में नहीं है।
कोतवाली क्षेत्र निवासी लखन सिंह का कहना है कि वर्ष 1992 के बाद अब शहर में दहशत फैली है। इस बीच कभी कोई सांप्रदायिक तनाव जैसी स्थिति नहीं रही।
प्यार-मोहब्बत से रहना और अपने काम में व्यस्त रहना ही यहां के लोगों की आदत में है। सभी जाति और धर्म के लोग गृहस्थी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए मिलजुल कर व्यापार करते हैं। हर रोज भगवान का गान और अल्लाह की अजान से इस शहर की सुबह होती है।
कोतवाली क्षेत्र निवासी लखन सिंह का कहना है कि वर्ष 1992 के बाद अब शहर में दहशत फैली है। इस बीच कभी कोई सांप्रदायिक तनाव जैसी स्थिति नहीं रही।
प्यार-मोहब्बत से रहना और अपने काम में व्यस्त रहना ही यहां के लोगों की आदत में है। सभी जाति और धर्म के लोग गृहस्थी की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए मिलजुल कर व्यापार करते हैं। हर रोज भगवान का गान और अल्लाह की अजान से इस शहर की सुबह होती है।