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तर्पण कर की पितरों के मोक्ष की कामना
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कासगंज सोरों की हरि की पैड़ी पर पितरों का तर्पण करते लोग
- फोटो : KASGANJ
सोरों। पितृपक्ष के तीसरे दिन रविवार को हरि पदी के घाटों पर दूरदराज के प्रांतों से आए श्रद्धालुओं ने अपने पितरों को जलदान तर्पण करने के बाद गंगा स्नान किया। सुबह से निजी और परिवहन निगम की बसों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के मोक्ष की कामना से पहुंचे। गृह जनपद के अतिरिक्त अन्य जनपदों एवं बाहरी राज्य राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के लोग भी पितरौ के तर्पण को पहुंच रहे हैं।
लहरा गंगा घाट, कछला घाट, हरिपदी किनारे पहुंचकर श्रद्धालुओं ने तीर्थपुरोहितों से विधिविधान पूर्वक पूजन कराकर पूवर्जों को याद करते हुए तिल, कुश, उड़द, चावल आदि से जल तर्पण किया। गंगास्नान करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र आदि का दान किया। पं. नरेश बरबारिया ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में तिल व कुश का विशेष महत्व है। दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है।
मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु व महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्र भाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का और जड़ भाग पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय है और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माना जाता है।
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कनागत में खूब बिक रही इमरती
सोरों। तीर्थनगरी में श्राद्धपक्ष में इमरती की खूब बिक्री हो रही है। जगह जगह दुकानों पर इमरती सजी हैं। इमरती बनाने की अस्थाई दुुुकानें भी खुल गई हैं। पितृपक्ष में ब्राह्मणों को उड़द की दाल से बनी इमरती खिलाने की परंपरा है। तीर्थनगरी में बस स्टैंड से कछला गेट तक 50 से अधिक जगहों पर इमरती बनाकर बिक्री की जा रही है। इमरती बनाने का 50 साल से ज्यादा का अनुुभव रखने वाले कारीगर राधाकृष्ण का कहना है कि उड़द की दाल और वनस्पति घी से इमरती तैयार करते हैं। इसका मूल्य 100 रुपये प्रतिकिलो है। शुुुद्ध देशी घी से बनी इमरती 230 से 250 रुपये प्रति किलो बक रही है।
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लहरा गंगा घाट, कछला घाट, हरिपदी किनारे पहुंचकर श्रद्धालुओं ने तीर्थपुरोहितों से विधिविधान पूर्वक पूजन कराकर पूवर्जों को याद करते हुए तिल, कुश, उड़द, चावल आदि से जल तर्पण किया। गंगास्नान करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र आदि का दान किया। पं. नरेश बरबारिया ने बताया कि श्राद्ध पक्ष में तिल व कुश का विशेष महत्व है। दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है।
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मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु व महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्र भाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्य का और जड़ भाग पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय है और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माना जाता है।
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कनागत में खूब बिक रही इमरती
सोरों। तीर्थनगरी में श्राद्धपक्ष में इमरती की खूब बिक्री हो रही है। जगह जगह दुकानों पर इमरती सजी हैं। इमरती बनाने की अस्थाई दुुुकानें भी खुल गई हैं। पितृपक्ष में ब्राह्मणों को उड़द की दाल से बनी इमरती खिलाने की परंपरा है। तीर्थनगरी में बस स्टैंड से कछला गेट तक 50 से अधिक जगहों पर इमरती बनाकर बिक्री की जा रही है। इमरती बनाने का 50 साल से ज्यादा का अनुुभव रखने वाले कारीगर राधाकृष्ण का कहना है कि उड़द की दाल और वनस्पति घी से इमरती तैयार करते हैं। इसका मूल्य 100 रुपये प्रतिकिलो है। शुुुद्ध देशी घी से बनी इमरती 230 से 250 रुपये प्रति किलो बक रही है।