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अपनों को खोने का दर्द: शिक्षामित्र हेमेंद्र का चुनाव ड्यूटी में हुआ था निधन, पत्नी बोलीं- ड्यूटी ने छीन लिए पति

Mon, 31 May 2021 01:05 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Mon, 31 May 2021 01:05 PM IST
सार

पत्नी राधा देवी बोलीं कि चुनाव ड्यूटी में न जाते तो उनके पति आज जिंदा होते। अब हम क्या करें, हमारा एकमात्र सहारा चला गया। हेमेंद्र का बड़ा बेटा हर्ष उपाध्याय 17 वर्ष का है, 12वीं में पढ़ रहा है। 

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Sikshamitra Hemendra Upadhayay Died Due To Corona Virus In Panchayat Election Duty
शिक्षामित्र का परिवार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्राथमिक विद्यालय, खंदौली में तैनात रहे शिक्षामित्र हेमेंद्र उपाध्याय का 26 अप्रैल को निधन हो गया था। परिवार अवसाद में हैं। परिवार में दो बच्चे, पत्नी और बूढ़ी मां है। परिवार में हेमेंद्र उपाध्याय अकेले कमाने वाले थे। परिवार का कहना है कि चुनाव ड्यूटी के दौरान व संक्रमित हुए।

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पत्नी राधा देवी बोलीं कि चुनाव ड्यूटी में न जाते तो उनके पति आज जिंदा होते। अब हम क्या करें, हमारा एकमात्र सहारा चला गया। हेमेंद्र का बड़ा बेटा हर्ष उपाध्याय 17 वर्ष का है, 12वीं में पढ़ रहा है। छोटा बेटा लकी 14 वर्ष का है, कक्षा नौ में पढ़ रहा है। 
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उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षामित्र संघ के जिलाध्यक्ष वीरेंद्र छौंकर का कहना है कि हेमेंद्र उपाध्याय की पंचायत चुनाव में ड्यूटी लगी थी। ड्यूटी से लौटते समय ही रास्ते में उनकी तबियत खराब हो गई थी। जांच में संक्रमण की पुष्टि हुई थी। एक माह बाद भी कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि पीड़ित परिवार की खबर लेने तक नहीं पहुंचा है। उन्होंने पीड़ित परिवार के लिए 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और एक सदस्य को नौकरी की मांग की है।

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‘माता-पिता को नहीं बचा पाने का दर्द सताता रहेगा’
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अरुण जैन ने 30 अप्रैल को अपने पिता सुरेश चंद जैन को खो दिया। अभी डॉ. जैन इस झटके को सहने की हिम्मत जुटा ही रहे थे कि आठ घंटे बाद ही उनकी मां वीना देवी जैन का भी निधन हो गया। अरुण चाइल्ड हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक डॉ. अरुण कहते हैं कि आज मैं जहां भी खड़ा हूं, वो मेरे माता-पिता के दिए हुए संस्कारों की नींव का परिणाम है। काफी कोशिशों के बाद भी उन्हें नहीं बचा पाने का दर्द जीवनभर सताता रहेगा।

बचपन की शरारतों पर मां की पिटाई और फिर पिता का समझाना जब-जब याद आता है, तो मन विचलित हो उठता है। कई बार पढ़ाई पर मां की डांट भी मुझे यादों के झरोखों में ले जाती है। दर्द व्यक्त नहीं कर सकता। कमरे में अपनी पत्नी डॉ. संध्या जैन के सामने रोकर मन को हलका कर लेता हूं। डॉ. संध्या बताती हैं कि मेरे सास-ससुर ने मुझे बहू नहीं बेटी माना और प्यार दिया। अब सिर्फ यादें ही बाकी हैं।
अपनों के खोने का दर्द: बेटे-बहू की मौत के बाद दो बच्चों की जिम्मेदारी संभाल रहे दादा-दादी
 

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