श्री पारस अस्पताल ऑक्सीजन मॉकड्रिल मामला: वकीलों ने कहा- गैर इरादतन नहीं, हत्या की सोची-समझी साजिश
श्री पारस अस्पताल में दमघोंटू मॉकड्रिल मामले में ताजनगरी के प्रबुद्धजन भी अपना आक्रोश व्यक्त कर रहे हैं। अधिवक्ताओं ने भी अपने विचार अमर उजाला से साझा किए हैं। उन्होंने शासन, प्रशासन और आईएमए की भूमिका पर सवाल खड़े किए। कहना है कि मरीजों की मौत गैर इरादतन हत्या नहीं बल्कि हत्या की सोची-समझी साजिश है। इस मामले में रिटायर्ड जज से जांच कराई जाए।
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आगरा के श्री पारस अस्पताल में में अधिवक्ताओं ने प्रशासन, आईएमए और सरकार तीनों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। फौजदारी मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह से वीडियो सामने आया और उसमें जो बातें संचालक ने कहीं, उन्हें सुनकर सब दूध का दूध, पानी का पानी हो गया। सीधे तौर पर यह गैर इरादतन नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत मरीजों की हत्या है। अधिवक्ताओं ने इस पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग उठाई है।
प्रभु ने उसके मुंह से बुलवा दिया, वरना कौन करता यकीन
श्री पारस की जांच में निश्चित रूप से बड़ी खामियां हैं। कानून की नजर से देखा जाए, वीडियो में संचालक का कबूलनामा है। उसने जो गलत काम किया, प्रभु ने उसके मुंह से बुलवा दिया, वरना किसी को क्या मालूम था कि अप्रैल में क्या हुआ। पीड़ित भी अनभिज्ञ थे। इस मामले में अस्पताल संचालक ने मरीजों के जीवन के लिए संघर्ष तो किया नहीं। अपनी वाहवाही लूटने के लिए जिंदगियां खत्म कर दीं। जांच का किन बिंदुओं पर की गई ये भी प्रशासन ने सार्वजनिक नहीं किया।
यह सच्चाई जनता के सामने आनी चाहिए कि उसे क्लीन चिट कैसे और किन तथ्यों पर दी गई। यह गैर इरादन हत्या नहीं, हत्या की सोची-समझी साजिश है। अनजाने में नहीं किया उसने। मॉकड्रिल उसकी दिमागी खुराफात थी। मरीजों के जीवन की कीमत पर उसने प्रयोग किया। वो भी ऐसे वक्त में जब जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। उसे राजनीतिक व प्रशासनिक अमले का संरक्षण मिला। - अशोक गुप्ता, पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता, फौजदारी
प्रशासन ने जांच नहीं की, साक्ष्य मिटाने का प्रयास किया
मॉकड्रिल के जिस तरह से वीडियो आए हैं। मेरा अपना मानना है ये सीधा हत्या का केस बनता है। मॉकड्रिल हुई, लेकिन उसका कोई कारण समझ नहीं आता है। प्रशासन ने जिस तरह से जांच की है उससे लगता है उन्होंने साक्ष्यों को नष्ट करने और दबाने का प्रयास किया। ताकि मौतों की सच्चाई सामने नहीं आ सके। मौतें चार से 16 हो गई। 22 के आरोप हैं। प्रशासन की भी इस मामले में लिप्तता है। इस कांड की सीबीआई जांच हो। प्रशासनिक पहलू की भी जांच होनी चाहिए। मॉकड्रिल जीवन की कीमत पर नहीं कर सकते। तीन मिनट किसी की ऑक्सीजन बंद कर दी, तो वह मर जाएगा। अगर पांच मिनट मॉकड्रिल करें तो आप जानते हैं जो मरीज ऑक्सीजन पर हैं उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह जानबूझकर किया कृत्य है। - हरी दत्त शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता, फौजदारी
रिटायर्ड जज से कराई जा सकती है जांच
इस मामले में सभी पहलुओं से जांच होनी चाहिए। संचालक, प्रशासन और पीड़ित तीनों पक्षकार हैं। किन बिंदुओं पर जांच की गई है जब तक वह रिपोर्ट नहीं देख लेते कुछ भी कहना सही नहीं है। पिछली बार अस्पताल बंद हुआ था तो खुल कैसे गया ये बड़ा सवाल है। दबाव मुक्त जांच होनी चाहिए। कोई रिटायर्ड जज से जांच कराई जा सकती है। जज गैर राज्य का भी हो सकता है। - प्रो. अरिवंद मिश्रा, राज्यपाल के पूर्व विधि सलाहकार
पारस अस्पताल को प्रशासन ने जांच में क्लीन चिट देकर पीड़ितों के साथ अन्याय किया है। डॉ. अरिन्जय के वीडियो से तो यही लगता है कि अस्पताल ने 22 मरीजों की हत्या की है। पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए इस मामले में आगरा माइनॉरिटी बार एसोसिएशन हाईकोर्ट में रिट दाखिल करने की तैयारी कर रही है, जिससे कि दोषी अस्पताल संचालक के खिलाफ कार्रवाई हो सके। - शफीक अहमद कुरैशी एडवोकेट, पूर्व सचिव, आगरा माइनॉरिटी बार एसोसिएशन
महामारी में टूटती सांसों के साथ धोखा
महामारी में आम जनमानस की टूटती सांसों के साथ धोखा हुआ। श्री पारस अस्पताल ने चिकित्सा पेशे को शर्मसार किया है। घटना बेहद निंदनीय है। हैरानी की बात ये है कि सबकुछ कांच की तरह साफ है लेकिन प्रशासन, पुलिस और शासन को नहीं दिख रहा। कानूनी कार्रवाई के नाम पर जब प्रशासन को जांच सौंपी तो उन्होंने साक्ष्य नष्ट कर दिए। ऐसे में प्रशासन से न्याय की उम्मीद करना बेमानी लगता है। पूरे मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए। तभी सच्चाई सामने आएगी। - राजवीर सिंह, अधिवक्ता
जांच सही नहीं, वरना क्यों उठती अंगुलियां
प्रशासन की जांच सही नहीं लगती। वरना अंगुलियां क्यों उठतीं। न्यायिक पहलू से देखें तो ये मामला बहुत गंभीर है। इसकी उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए। सभी को मालूम है उस समय ऑक्सीजन की भारी कमी थी। सरकार ने झूठा बोला, प्रशासन भी झूठ बोल रहा है। इससे जनता में क्या संदेश जाएगा। इस मामले का हाईकोर्ट को स्वत: संज्ञान लेना चाहिए। जनहित से जुड़ा सीधा मामला है। ताकि भविष्य के लिए एक नजीर बन सके। मरीजों से खिलवाड़ का अधिकार नहीं है। - धर्मेंद्र वर्मा, अधिवक्ता
आईएमए और संचालक ने किया जांच को प्रभावित
जांच के नाम पर वही हुआ जो जनता सोच रही थी। इसमें आईएमए और अस्पताल संचालक ने जांच को प्रभावित किया है। जिला प्रशासन द्वारा गलत जांच रिपोर्ट दी गई है। श्री पारस ही नहीं, अन्य अस्पतालों ने भी कोविड में मरीजों से ज्यादा बिल की वसूली की। आईएमए मनमानी पर पर्दा डालता रहा है। मरीजों के परिजन चीखते रहे, लेकिन प्रशासन चुप बना रहा। पीड़ितों के साथ न्याय के लिए पूरे प्रकरण की दोबारा निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। - दिनेश शर्मा, महासचिव, एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन
संचालक को गिरफ्तार कर जेल भेजा जाए
यह बेहद संवेदनशील मामला है। अस्पताल संचालक मरीजों की मौत का जिम्मेदार है। उसके खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए। गिरफ्तार कर पुलिस को उसे जेल भेजना चाहिए। प्रशासन भी इस पूरे मामले में जांच के घेरे में है। इस कांड के बाद जनता में अस्पतालों में जाने से भय व्याप्त है। सरकार को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए, तभी जनता को न्याय मिलेगा। - रामप्रकाश शर्मा, सचिव, आगरा बार एसोसिएशन
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