{"_id":"65fe90ea9daea1a0e8054c1c","slug":"samajwadi-party-alliance-suffered-losses-victory-margin-decreased-in-mainpuri-akhilesh-had-lost-firozabad-seat-2024-03-23","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"UP: अखिलेश यादव ने फिर कर दी वही गलती, जिसकी वजह से हारे थे यादव बाहुल्य ये सीट; मैनपुरी में हिल गईं थी जड़ें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
UP: अखिलेश यादव ने फिर कर दी वही गलती, जिसकी वजह से हारे थे यादव बाहुल्य ये सीट; मैनपुरी में हिल गईं थी जड़ें
Sat, 23 Mar 2024 01:51 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
ज्योत्यवेंद्र दुबे, मैनपुरी
ज्योत्यवेंद्र दुबे, मैनपुरी
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Sat, 23 Mar 2024 01:51 PM IST
सार
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने जब-जब अन्य दलों से गठबंधन किया नुकसान ही झेलना पड़ा। पिछले चुनावों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इसके बाद भी इस बार फिर सपा और कांग्रेस का गठबंधन है। अब सवाल ये है कि क्या लोकसभा चुनाव 2024 में सपा को मैनपुरी और फिरोजाबाद में इस गठबंधन का लाभ मिलेगा या नहीं...
विज्ञापन
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व कांग्रेस नेता राहुल गांधी।
- फोटो : amar ujala
विस्तार
आमतौर पर राजनीतिक दलों का गठबंधन हारी हुई बाजी जीतने के लिए होता है। लेकिन बृज इस मामले में खास रहा है। बृज की मैनपुरी और फिरोजाबाद सीट पर सपा का गैर दलों के साथ गठबंधन जनता को रास नहीं आया। इस बार भी सपा ने लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है। ये गठबंधन क्या गुल खिलाएगा ये चुनाव परिणाम ही बताएगा।
विज्ञापन
Trending Videos
1996 से लेकर आज तक मैनपुरी लोकसभा सीट सपा का मजबूत गढ़ रही है। यहां सपा से प्रत्याशी कोई भी रहा हो, लोगों ने उसे मुलायम के इशारे पर हमेशा जीत दिलाई। कुछ चुनावों को छोड़ दें तो हमेशा जीत एकतरफा ही रही। 2014 के चुनाव में मुलायम सिंह ने जीत के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। मुलायम सिंह यादव ने भाजपा के शत्रुघन सिंह चौहान को 3.64 लाख वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया था। लेकिन 2019 के चुनाव में जब सपा ने बसपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा तो मैनपुरी की जनता को ये रास नहीं आया।
विज्ञापन
विज्ञापन
जहां गठबंधन से मुलायम सिंह यादव प्रत्याशी थे। ऐसे में सपा और बसपा का वोट मिलाकर उनकी जीत का अंतर बढ़ना चाहिए था। लेकिन हुआ इससे ठीक उल्टा। मुलायम सिंह यादव की जीत का अंतर गिरकर 94389 पर पहुंच गया।
वहीं फिरोजाबाद लोकसभा सीट के मतदाताओं का मिजाज भी कुछ ऐसा ही है। 2014 के सपा के टिकट पर यहां से मुलायम सिंह यादव के भतीजे अक्षय यादव 1.14 लाख के बड़े अंतर से जीते थे। लेकिन 2019 में जब सपा ने बसपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ा तो पार्टी को ये सीट ही गंवानी पड़ गई। गठबंधन के बाद भी यहां से भाजपा के चंद्रसेन जादौन विजयी हुई।
ऐसे में एक बात तो साफ है कि सपा का अन्य दलों से गठबंधन मैनपुरी और फिरोजाबाद की जनता को रास नहीं आता है। इस बार फिर सपा कांग्रेस के साथ गठनबंधन का लोकसभा चुनाव के रण में उतरी है। मैनपुरी और फिरोजाबाद दोनों ही सीट से सपा प्रत्याशी मैदान में हैं। लेकिन ये गठबंधन इस बार लोगों को रास आएगा या नहीं इसे लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। संवाद
2017 के विधानसभा चुनाव में भी हुआ नुकसान
सपा ने 2017 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लड़ा था। ये गठबंधन भी मैनपुरी को खास रास नहीं आया। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा का जिले की चारों सीटों पर कब्जा था, ये चुनाव सपा ने अपने बलबूते ही लड़ा था। वहीं 2017 के चुनाव में सपा को गठबंधन के बाद भी भोगांव सीट गंवानी पड़ी। यहां से तीन बार के विधायक आलोक शाक्य को सपा ने चुनाव लड़ाया था। लेकिन उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े रामनरेश अग्निहोत्री ने मात दे दी थी।
सपा ने 2017 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लड़ा था। ये गठबंधन भी मैनपुरी को खास रास नहीं आया। 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा का जिले की चारों सीटों पर कब्जा था, ये चुनाव सपा ने अपने बलबूते ही लड़ा था। वहीं 2017 के चुनाव में सपा को गठबंधन के बाद भी भोगांव सीट गंवानी पड़ी। यहां से तीन बार के विधायक आलोक शाक्य को सपा ने चुनाव लड़ाया था। लेकिन उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े रामनरेश अग्निहोत्री ने मात दे दी थी।
राजनीति जानकारों की है अलग राय
राजनीति के जानकार सपा के साथ होने वाले गठबंधन को अलग नजरिये से देखते हैं। उनका मानना है कि सपा का कोर वोट बैंक माने जाने वाले यादव हमेशा सपा के साथ रहते हैं। कांग्रेस का कोर वोटर धीरे-धीरे सपा और भाजपा में चला गया है। वहीं बसपा का कोर वोट बैंक भी बीते कुछ चुनावों से असमंजस में है। 2014 के बाद बसपा ने मैनपुरी सीट पर प्रत्याशी ही नहीं उतारा।
राजनीति के जानकार सपा के साथ होने वाले गठबंधन को अलग नजरिये से देखते हैं। उनका मानना है कि सपा का कोर वोट बैंक माने जाने वाले यादव हमेशा सपा के साथ रहते हैं। कांग्रेस का कोर वोटर धीरे-धीरे सपा और भाजपा में चला गया है। वहीं बसपा का कोर वोट बैंक भी बीते कुछ चुनावों से असमंजस में है। 2014 के बाद बसपा ने मैनपुरी सीट पर प्रत्याशी ही नहीं उतारा।