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UP: दिवाली से पहले कछुओं पर खतरा...चंबल सेंक्चुअरी में अलर्ट, निगरानी के लिए लगाई गईं मोटरबोट

Sat, 18 Oct 2025 10:30 AM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: धीरेन्द्र सिंह Updated Sat, 18 Oct 2025 10:30 AM IST
सार

धनतेरस से दिवाली तक चंबल सेंक्चुअरी में कछुओं की सुरक्षा के लिए सतर्कता कर दी गई है। मोटरबोट से नदी में गश्त की जा रही है। 

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Rare Sundari Turtles in Chambal Protected
कछुआ - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

आगरा के बाह से गुजर रही चंबल नदी में कछुओं की 8 दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण हो रहा है। इनमें कठोर कवच वाली ढोर, साल, पचेड़ा, काली ढोर और नरम कवच वाली स्योत्तर, कटहवा, सुंदरी, मोरपंखी प्रजातियां शामिल हैं।
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 बाह के रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने बताया कि कठोर कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच कठोर होता है। यह अस्थियों का बना होता है। कवच कछुओं के लिए सुरक्षा या ढाल का काम करता है। ये कछुए शाकाहारी होते हैं और चंबल की सड़ी गली वनस्पतियों को खाकर नदी के पानी को साफ करते है। जबकि नरम कवच वाले कछुओं का बाहरी कवच मुलायम होता है। यह मांसपेशियों से बना होता है। ये मुख्यतः मांसाहारी होते है। चंबल के मरे और सड़े गले जीव जंतुओं को खाकर पानी को स्वच्छ रखते है। कछुए के भगवान विष्णु के अवतार होने की धार्मिक मान्यता है। अंधविश्वासी लोग धनतेरस से लेकर दिवाली तक संपन्नता के लिए तंत्र मंत्र में नाखून और कवच इस्तेमाल करने के लिए सुंदरी प्रजाति के कछुओं की तस्करी करते हैं।
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 रेंजर ने बताया कि जन सामान्य को जागरूक किया गया है कि कछुए चंबल नदी को साफ करते हैं, अंधविश्वास के चक्कर में कछुओं की तस्करी से बचें। उन्होंने बताया कि तटवर्तीय ग्रामीणों को 60 वन समितियों के माध्यम से संदिग्ध लोगों के दिखने पर वन विभाग को सूचना देने के लिए जागरूक किया गया है। मोटरबोट के जरिए चंबल नदी में नियमित रूप से पेट्रोलिंग की जा रही है। 

कछुओं के संरक्षण पर 15 साल से काम कर रहे टीएसए (टर्टल सर्वाइवल एलायंस) के प्रोजेक्ट ऑफीसर पवन पारीक ने बताया कि सुंदरी प्रजाति के कछुआ का नाम फ्लैप शेल कछुआ है। इसका वैज्ञानिक नाम लिस्सेमिस पंक्टाटा है। सड़े-गले और अवशिष्ट पत्तियां, कीड़े-मकोड़े और जलीय पौधे इनका भोजन होते हैं। स्वच्छता में मददगार होते हैं। हमले का खतरा बढ़ने पर खुद को कवच में भींचकर रक्षा करता है। कवच, नाखून और मांस के लिए इनकी तस्करी का खतरा रहता है।

 
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शांति, तरक्की और संपन्नता के लिए तिलकधारी कछुए की तस्करी
चाइनीज मिथक है कि तिलकधारी कछुए को पालने से घर में शांति, व्यापार में वृद्धि और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है। यही वजह है कि चीन, हांगकांग, थाईलैंड, मलेशिया, पाकिस्तान, सिंगापुर, श्रीलंका में लोग इन्हें खरीदते हैं। दुनिया में लुप्त हुए बटागुर कछुए की तिलकधारी प्रजाति (साल प्रजाति) सिर्फ चंबल नदी में बची है। इनका वैज्ञानिक नाम बटागुर कचुगा (रेड क्राउन रूफ्ड टर्टल) है। प्रजनन सीजन (मार्च-मई) में साल प्रजाति के नर कछुए रंग बदलते हैं। 15 साल से कछुओं के संरक्षण पर काम कर रहे टर्टल सर्वाइवल एलायंस (टीएसए) के प्रोजेक्ट ऑफीसर पवन पारीक ने बताया कि नर कछुए का सिर का रंग लाल, नीला, पीला, सफेद हो जाता है। बटागुर कछुए की 98 फीसदी ढोर प्रजाति चंबल में है। करीब 2 प्रतिशत आबादी गंगा और यमुना में मिलती है। बटागुर कछुए की करीब 500 मादाएं प्रजनन कर रही हैं।

 

जागरुकता से बदली सूरत, बडी आबादी
बाढ़, नदी किनारे पर कछवारी, चोरी छिपे होने वाले खनन और मछली पकड़ने को डाले गए जाल में फंसकर होने वाली मौत से कछुओं की आबादी तेजी से घटी थी। वन विभाग के साथ टीएसए के जागरुकता अभियान से सूरते हाल बदले हैं। नेस्टिंग से लेकर हैचिंग सीजन तक अंडों की रखवाली से भी प्रजनन का ग्राफ बढ़ा है, कुनबा भी।

 

मांस और शक्तिवर्धक दवाओं के लिए होती है तस्करी
मांस और शक्तिवर्धक दवाओं के लिए बिहार, बंगाल के रास्ते विदेशों तक तस्करी कर कछुओं को खपाया जाता है। चंबल से वाया कानपुर होने वाली तस्करी को इटावा में पिछले 4 वर्षों में पकड़े जाने से काफी हद तक अंकुश लगा है।
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