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‘सिस्टर सिटी’ से संवरेगी 390 साल पुराने 'चीनी का रोजा' की सूरत, जानिए इसका इतिहास
अमित कुलश्रेष्ठ, अमर उजाला, आगरा
Updated Mon, 22 Oct 2018 10:50 AM IST
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चीनी का रोजा स्मारक
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ताजनगरी में अब तक उपेक्षित रहे चीनी का रोजा स्मारक की जल्द ही सूरत संवरने वाली है। उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद और आगरा के बीच ‘सिस्टर सिटी’ के एमओयू से इस स्मारक को भी संवारने की चर्चा होने लगी है।
समरकंद और बुखारा के स्मारकों में वैसे ही नीले रंग के टाइल्स का उपयोग किया गया है, जो चीनी का रोजा स्मारक के गुंबद और बाहरी दीवारों की डिजाइन में लगाए गए थे। दिल्ली के मकबरे के गुंबद में इन्हीं टाइल्स का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में चीनी का रोजा में भी ऐसे ही टाइल्स से संवारे जाने की उम्मीदें परवान चढ़ रही हैं।
यमुना नदी के किनारे 390 साल पहले तामीर किया गया चीनी का रोजा स्मारक रामबाग के पास है, जो नीले रंग के ग्लेज्ड टाइल्स से बना है। चीनी का रोजा में यह टाइल्स पूरी तरह से टूटकर निकल चुके हैं और प्लास्टर से स्मारक की दीवारें ही बची हैं।
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समरकंद और बुखारा के स्मारकों में वैसे ही नीले रंग के टाइल्स का उपयोग किया गया है, जो चीनी का रोजा स्मारक के गुंबद और बाहरी दीवारों की डिजाइन में लगाए गए थे। दिल्ली के मकबरे के गुंबद में इन्हीं टाइल्स का उपयोग किया जा रहा है। ऐसे में चीनी का रोजा में भी ऐसे ही टाइल्स से संवारे जाने की उम्मीदें परवान चढ़ रही हैं।
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यमुना नदी के किनारे 390 साल पहले तामीर किया गया चीनी का रोजा स्मारक रामबाग के पास है, जो नीले रंग के ग्लेज्ड टाइल्स से बना है। चीनी का रोजा में यह टाइल्स पूरी तरह से टूटकर निकल चुके हैं और प्लास्टर से स्मारक की दीवारें ही बची हैं।
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ईरान से आए मुगल दरबारी का है स्मारक
'सिस्टर सिटी' के एमओयू के जरिए यमुना नदी के किनारे चार बाग शैली में बनाए गए बागों को संवारने की मशक्कत की जाएगी, लेकिन एएसआई और उजबेकिस्तान सरकार के बीच इस स्मारक के संरक्षण के लिए भी पहल की कवायद चल रही है।
अभी तक इन नीले टाइल्स की उपलब्धता न होने के कारण यह संभव नहीं हो सका था, लेकिन उजबेकिस्तानी राष्ट्रपति के दौरे के बाद यह संभावना तेजी से बढ़ रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही इस योजना पर काम भी शुरू हो सकता है।
1608 में ईरान के शहर शिराज से मुगल दरबार में आए मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराजी को अफजल खां शिराजी का नाम दिया गया था। मुगल बादशाह जहांगीर के बाद शाहजहां के दरबार में शिराजी वित्त मंत्री का दायित्व संभाले हुए था।
अभी तक इन नीले टाइल्स की उपलब्धता न होने के कारण यह संभव नहीं हो सका था, लेकिन उजबेकिस्तानी राष्ट्रपति के दौरे के बाद यह संभावना तेजी से बढ़ रही है। माना जा रहा है कि जल्द ही इस योजना पर काम भी शुरू हो सकता है।
1608 में ईरान के शहर शिराज से मुगल दरबार में आए मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराजी को अफजल खां शिराजी का नाम दिया गया था। मुगल बादशाह जहांगीर के बाद शाहजहां के दरबार में शिराजी वित्त मंत्री का दायित्व संभाले हुए था।
अफजल खां का दफनाया गया
वो तब 7000 जात और 4000 सवारों का मनसबदार रहा। 1639 में अफजल खां की मृत्यु लाहौर में हुई, लेकिन उसे उसकी इच्छा के मुताबिक आगरा में मकबरा बनाकर दफनाया गया। यह मकबरा उसने अपनी जिंदगी में ही बनवा लिया था।
नीले रंग के चमकते टाइल्स से बने उसके मकबरे का नाम टाइल्स के कारण चीनी का रोजा पड़ा। उसका भाई अब्दुल हक भी शिराज से उसके साथ आया था, जो कैलीग्राफी में विशेषज्ञ था। उसे अमानत खां शिराजी का टाइटल दिया गया।
अंग्रेजों ने बचाया चीनी का रोजा का अस्तित्व
1803 में जब आगरा ब्रिटिश हुकूमत के अधीन आया तो चीनी का रोजा अंग्रेजों की प्राथमिकता में था, इसीलिए इसे आर्किटेक्चरल मेरिट देते हुए चीनी का रोजा कंपनी ड्राइंग में शामिल किया गया। 1815 में जब लॉर्ड हेस्टिंग्स आगरा आए तो उनके कलाकार सीताराम ने उन्हें चीनी का रोजा की दो पेंटिंग पेश की।
1835 में फैनी पार्क्स ने चीनी का रोजा के रखरखाव की आलोचना की। इसकेबाद 1899 तक यह बेहद खराब हालात में रहा। इसके अंदर किसान रहे और अपने बैलों को कब्रों के पास बांधते रहे। भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इस मकबरे की स्थिति पर नाराजगी जताई, तब यहां संरक्षण का काम शुरू किया गया।
नीले रंग के चमकते टाइल्स से बने उसके मकबरे का नाम टाइल्स के कारण चीनी का रोजा पड़ा। उसका भाई अब्दुल हक भी शिराज से उसके साथ आया था, जो कैलीग्राफी में विशेषज्ञ था। उसे अमानत खां शिराजी का टाइटल दिया गया।
अंग्रेजों ने बचाया चीनी का रोजा का अस्तित्व
1803 में जब आगरा ब्रिटिश हुकूमत के अधीन आया तो चीनी का रोजा अंग्रेजों की प्राथमिकता में था, इसीलिए इसे आर्किटेक्चरल मेरिट देते हुए चीनी का रोजा कंपनी ड्राइंग में शामिल किया गया। 1815 में जब लॉर्ड हेस्टिंग्स आगरा आए तो उनके कलाकार सीताराम ने उन्हें चीनी का रोजा की दो पेंटिंग पेश की।
1835 में फैनी पार्क्स ने चीनी का रोजा के रखरखाव की आलोचना की। इसकेबाद 1899 तक यह बेहद खराब हालात में रहा। इसके अंदर किसान रहे और अपने बैलों को कब्रों के पास बांधते रहे। भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इस मकबरे की स्थिति पर नाराजगी जताई, तब यहां संरक्षण का काम शुरू किया गया।