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सेंट जोंस कॉलेज के जंतु विभाग ने किया शोध, पापाटासी मक्खी ने काला आजार को बिहार से कश्मीर तक पहुंचाया
Mon, 22 Feb 2021 11:20 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Mon, 22 Feb 2021 11:20 AM IST
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ब्लू टंग बीमारी का वाहक कुलिक्वाईडस मक्खी
- फोटो : अमर उजाला
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तंत्रिका तंत्र (नर्वस) सिस्टम को प्रभावित करने वाली बीमारी काला आजार बिहार से कश्मीर पहुंची है। इसे बीमारी की वाहक मक्खी पापाटासी ले गई है। यह निष्कर्म सेंट जोंस कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसरों के शोध में निकला है। बिहार और कश्मीर में मक्खी के डीएनए लक्षण 95 फीसदी तक एक जैसे मिले हैं।
काला आजार (लैशमानियासिस) बीमारी पर करीब छह वर्ष तक शोध कार्य किया गया। इसमें पता चला कि मक्खी की पांच प्रजातियां इसकी कारक हैं। इनमें से मुख्य पापाटासी ही है। यह परिवहन के माध्यम से बिहार से कश्मीर तक पहुंची है। बिहार में काला आजार बीमारी 200 साल पहले आ गई थी। कश्मीर में आठ साल पहले पहुंची है। शोध में निष्कर्ष यह निकला कि बिहार से कश्मीर में जाने वाले मजदूरों के साथ पापाटासी मक्खी भी कश्मीर पहुंची और फिर वहां रोग की कारक बनी।
कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग के डॉ. गिरीश माहेश्वरी के निर्देशन में यह शोध कार्य किया गया। इसमें रोग वाहकों का डीएनए अनुक्रमण (सीक्वेंसिंग) किया गया। लार ग्रंथी से रोग कारक प्रजाति की पहचान की गई। डॉ. माहेश्वरी ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में काला आजार बीमारी से पीड़ित 200 मरीजों को चिह्नित किया गया।
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काला आजार (लैशमानियासिस) बीमारी पर करीब छह वर्ष तक शोध कार्य किया गया। इसमें पता चला कि मक्खी की पांच प्रजातियां इसकी कारक हैं। इनमें से मुख्य पापाटासी ही है। यह परिवहन के माध्यम से बिहार से कश्मीर तक पहुंची है। बिहार में काला आजार बीमारी 200 साल पहले आ गई थी। कश्मीर में आठ साल पहले पहुंची है। शोध में निष्कर्ष यह निकला कि बिहार से कश्मीर में जाने वाले मजदूरों के साथ पापाटासी मक्खी भी कश्मीर पहुंची और फिर वहां रोग की कारक बनी।
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कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग के डॉ. गिरीश माहेश्वरी के निर्देशन में यह शोध कार्य किया गया। इसमें रोग वाहकों का डीएनए अनुक्रमण (सीक्वेंसिंग) किया गया। लार ग्रंथी से रोग कारक प्रजाति की पहचान की गई। डॉ. माहेश्वरी ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में काला आजार बीमारी से पीड़ित 200 मरीजों को चिह्नित किया गया।
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डॉ. गिरीश माहेश्वरी
- फोटो : अमर उजाला
डीएनए अनुक्रमण से यह स्पष्ट हो गया कि पापाटासी ट्रेन या बस से कश्मीर में पहुंची। शोध को डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी, नई दिल्ली में जमा कर दिया गया है। शोध टीम में डॉ. गीता माहेश्वरी, अनुष्का छौंकर, रेनू, वरुण शर्मा व शिवांगी रहीं।
शरीर पड़ जाता है काला
काला आजार बीमारी में शरीर काला पड़ जाता है। यह नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर देता है। इससे मौत होने की संभावना बढ़ जाती है।
ब्लू टंग बीमारी के वाहक का भी पता लगाया
डॉ. गिरीश माहेश्वरी के ही निर्देशन में सेंट जोंस कॉलेज की जंतु विभाग की टीम ने एक और उपलब्धि हासिल की है। काला आजार के वाहक के साथ ‘ब्लू टंग’ बीमारी के वाहक का पता लगाया है। यह प्रोजेक्ट भी करीब छह वर्ष शुरू हुआ था, अब पूरा हुआ है। शोध रिपोर्ट को डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी में जमा कर दिया गया है। यह बीमारी सर्वाधिक भेड़ों को होती है। जीनोम अनुक्रमण के बाद इस बीमारी की वाहक मक्खियों की 35 प्रजातियों का पता लगा।
अब तक मक्खी की 68 प्रजातियों की पहचान की गई
सेंट जोंस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि जंतु विज्ञान विभाग की ओर से अब तक मक्खी की 68 प्रजातियों की पहचान जीनोम अनुक्रमण के माध्यम से की जा चुकी है। तमाम बड़े विश्वविद्यालयों के हिस्से यह उपलब्धि नहीं है।
शरीर पड़ जाता है काला
काला आजार बीमारी में शरीर काला पड़ जाता है। यह नर्वस सिस्टम को प्रभावित कर देता है। इससे मौत होने की संभावना बढ़ जाती है।
ब्लू टंग बीमारी के वाहक का भी पता लगाया
डॉ. गिरीश माहेश्वरी के ही निर्देशन में सेंट जोंस कॉलेज की जंतु विभाग की टीम ने एक और उपलब्धि हासिल की है। काला आजार के वाहक के साथ ‘ब्लू टंग’ बीमारी के वाहक का पता लगाया है। यह प्रोजेक्ट भी करीब छह वर्ष शुरू हुआ था, अब पूरा हुआ है। शोध रिपोर्ट को डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी में जमा कर दिया गया है। यह बीमारी सर्वाधिक भेड़ों को होती है। जीनोम अनुक्रमण के बाद इस बीमारी की वाहक मक्खियों की 35 प्रजातियों का पता लगा।
अब तक मक्खी की 68 प्रजातियों की पहचान की गई
सेंट जोंस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि जंतु विज्ञान विभाग की ओर से अब तक मक्खी की 68 प्रजातियों की पहचान जीनोम अनुक्रमण के माध्यम से की जा चुकी है। तमाम बड़े विश्वविद्यालयों के हिस्से यह उपलब्धि नहीं है।
ऐसे किया शोध
1. बिहार से काला आजार की वाहक मक्खी पापाटासी के डीएनए लक्षण देखे गए।
2. इसके बाद कश्मीर के हिमालयी क्षेत्रों में काला आजार के कारण तलाशे गए।
3. कश्मीर में भी बीमारी की वजह पापाटासी मक्खी पाई गई।
4. बिहार और कश्मीर की पापाटासी मक्खी के डीएनए लक्षण का मिलान किया गया।
शोध के निष्कर्ष
1. बिहार में काला आजार 200 साल पहले शुरू हुआ
2. मक्खी की पांच प्रजातियां बीमारी की कारक हैं।
3. बिहार से पापाटासी मक्शी कश्मीर पहुंची।
4. बिहार और कश्मीर में पापाटासी के डीएनए लक्षण 95 फीसदी तक एक जैसे मिले।
1. बिहार से काला आजार की वाहक मक्खी पापाटासी के डीएनए लक्षण देखे गए।
2. इसके बाद कश्मीर के हिमालयी क्षेत्रों में काला आजार के कारण तलाशे गए।
3. कश्मीर में भी बीमारी की वजह पापाटासी मक्खी पाई गई।
4. बिहार और कश्मीर की पापाटासी मक्खी के डीएनए लक्षण का मिलान किया गया।
शोध के निष्कर्ष
1. बिहार में काला आजार 200 साल पहले शुरू हुआ
2. मक्खी की पांच प्रजातियां बीमारी की कारक हैं।
3. बिहार से पापाटासी मक्शी कश्मीर पहुंची।
4. बिहार और कश्मीर में पापाटासी के डीएनए लक्षण 95 फीसदी तक एक जैसे मिले।