{"_id":"63ef021bcc98b03f1a0e9558","slug":"pandavas-offered-kanwad-in-bah-bateshwar-shiva-temple-during-agyatvas-know-story-2023-02-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mahashivratri 2023: पांडवों ने इस शिव मंदिर में चढ़ाई थी कांवड़, दर्शन मात्र ही मिटते हैं सारे कष्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mahashivratri 2023: पांडवों ने इस शिव मंदिर में चढ़ाई थी कांवड़, दर्शन मात्र ही मिटते हैं सारे कष्ट
Fri, 17 Feb 2023 09:57 AM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Fri, 17 Feb 2023 09:57 AM IST
सार
बटेश्वर में कल महाशिवरात्रि पर भोले नाथ का गंगाजल से अभिषेक करने के लिए कांवड़ियों का रैला उमड़ेगा। इसका इतिहास महाभारत काल में पांडवों से जुड़ा है।
विज्ञापन
बटेश्वर घाट
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आगरा में बाह से 12 किलोमीटर उत्तर दिशा में यमुना नदी के किनारे बाबा भोलेनाथ की नगरी तीर्थ बटेश्वर धाम। यह कृष्ण भगवान के पूर्वज राजा सूरसेन की राजधानी रही। यमुना किनारे महादेव मंदिरों की अद्भुत श्रंखला। महाशिवरात्रि पर हर वर्ष की भांति 18 फरवरी को यहां भोले नाथ का गंगाजल से अभिषेक करने के लिए कांवड़ियों का रैला उमड़ेगा।
महाभारत काल में पांडवों ने बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाई थी। भोलेनाथ के अभिषेक के लिए पांडव सोरों से कांवड़ में गंगाजल भरकर लाए थे। कहा जाता है कि अज्ञातवास में अपनी पहचान छिपी रहने के लिए उन्होंने शिव का आशीर्वाद कांवड़ चढ़ाकर लिया था।
मंदिर के पुजारी जयप्रकाश गोस्वामी ने बताया कि तभी से बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। महाभारत कालीन परंपरा का निर्वहन करने के लिए बाह ही नहीं मैनपुरी, फिरोजाबाद, इटावा, भिंड, धौलपुर तक से भोले के भक्त सोरों से कांवड़ लेकर बटेश्वर पहुंचेंगे। 132 किमी की पदयात्रा कर बटेश्वर पहुंची भिंड की सरिता, जसवंतनगर की सरोज, राजाखेड़ा के दिमान सिंह ने बताया कि मन्नत पूरी होने पर भोलेनाथ का गंगाजल से अभिषेक कर महाभारत कालीन परंपरा का निर्वहन करेंगे।
विज्ञापन
ये भी पढ़ें - दगाबाज दुल्हन: शादी के तीन घंटे बाद बाइक पर प्रेमी संग हो गई फुर्र, दूल्हे ने नहीं मानी हार, ऐसे लाया वापस
विज्ञापन
महाभारत काल में पांडवों ने बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाई थी। भोलेनाथ के अभिषेक के लिए पांडव सोरों से कांवड़ में गंगाजल भरकर लाए थे। कहा जाता है कि अज्ञातवास में अपनी पहचान छिपी रहने के लिए उन्होंने शिव का आशीर्वाद कांवड़ चढ़ाकर लिया था।
विज्ञापन
इस तरह शुरू हुई परंपरा
मंदिर के पुजारी जयप्रकाश गोस्वामी ने बताया कि तभी से बटेश्वर में कांवड़ चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। महाभारत कालीन परंपरा का निर्वहन करने के लिए बाह ही नहीं मैनपुरी, फिरोजाबाद, इटावा, भिंड, धौलपुर तक से भोले के भक्त सोरों से कांवड़ लेकर बटेश्वर पहुंचेंगे। 132 किमी की पदयात्रा कर बटेश्वर पहुंची भिंड की सरिता, जसवंतनगर की सरोज, राजाखेड़ा के दिमान सिंह ने बताया कि मन्नत पूरी होने पर भोलेनाथ का गंगाजल से अभिषेक कर महाभारत कालीन परंपरा का निर्वहन करेंगे।
विज्ञापन
इंग्लैंड से खींच लाई भोले की आस्था
इंग्लैंड के जैनी और उनके बेटे फाइनी को भोले की भक्ति बटेश्वर खींच लाई। उन्होंने यमुना में मोटरवोट से घूमकर 101 शिवमंदिर शृंखला देखी और ब्रह्मलालजी मंदिर में पूजा अर्चना की। गाइड गजेंद्र सिंह ने उनके हवाले से बताया कि बटेश्वर नाथ की आस्था के बारे में सुन रखा था। यही वजह है कि दर्शन पूजन के लिए इस तीर्थ की यात्रा की है। महाशिवरात्रि पर कांवड़ियों के आने के सिलसिले ने उन्हें बेहद प्रभावित किया।ये भी पढ़ें - दगाबाज दुल्हन: शादी के तीन घंटे बाद बाइक पर प्रेमी संग हो गई फुर्र, दूल्हे ने नहीं मानी हार, ऐसे लाया वापस