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Agra News: अयोध्या में फायरिंग के जिले में मौजूद है कई चश्मदीद
Sun, 21 Jan 2024 12:00 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Updated Sun, 21 Jan 2024 12:00 AM IST
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सोरोंजी। अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस मौके पर तीर्थनगरी के कारसेवक भी मौजूद थे। जो कारसेवा करने के लिए अयोध्या पहुंचे थे। वे विवादित ढांचे के विध्वंश के साक्षी बने। इसी बीच सुरक्षाबलों और पुलिस की फायरिंग के चश्मदीद भी। 23 अक्टूबर 1990 को अयोध्या गए कारसेवकों के जत्थे में पन्नालाल कोठेवार, शिवकुमार भारद्वाज, शिवकुमार शर्मा, ईश्वर चंद्र वाष्र्णेय , राधेश्याम त्रिवेदी, अंब्ररीश उपाध्याय, दिनेश बरवारिया, राजेश मिश्रा रहे।
कारसेवक कासगंज से ट्रेन द्वारा लखनऊ के लिए रवाना हुए। लखनऊ से अयोध्या के लिए सारी ट्रेनें रोक दी गईं थीं। अयोध्या से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए। मनकापुर स्टेशन से पहले ही जंगल में रात में ट्रेन रोक दी गईं। वहां से ग्रामीणों की सहायता से छह दिन पैदल चलकर सभी 31 अक्तूबर को अयोध्या पहुंच पाए। 31 अक्तूबर को पुलिस ने अयोध्या पहुंचे कारसेवकों पर सरयू पुल पर लाठी चार्ज कर दिया। जिसमें पन्नालाल कोठेवार लुहुलूहान हो गए। साथी कारसेवकों ने उनको ट्रेन द्वारा लखनऊ रवाना कर दिया। और नाव द्वारा सरयू नदी के रास्ते जन्मभूमि तक 2 नवंबर को पहुंच गए। जहां पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज के ये सभी कारसेवक गवाह बने। इन सभी के भी पुलिस की लाठियां पड़ी। उस समय निरीह रामभक्तों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने का वाकया याद कर ये राम भक्त कारसेवक फफक पड़े। वर्तमान में इनमें से पन्नालाल कोठेवार जिनका अयोध्या में लाठीचार्ज में गंभीर चोटें आने से कुछ दिन बाद ही निधन हो गया। कारसेवा में हिस्सा लेने वाले जो कारसेवक इस समय तीर्थनगरी में हैं। उन्होंने इस संबंध में जानकारियां दीं।
कारसेवकों की बात-
- कासगंज स्टेशन पर जीआरपी द्वारा ट्रेन में चढऩे से रोकने पर लखनऊ में आईटीआई का पेपर होने के बात कहकर ट्रेन में सवार हो गए। लखनऊ में कारसेवकों की भीड़ के आगे चारबाग स्टेशन पर फोर्स कम होने के कारण ट्रेन में चढऩे से फोर्स नहीं रोक पाया। अयोध्या से डेढ़ किलोमीटर पहले ट्रेनें रोक दी गई। ग्रामीणों ने अपने यहां भोजन खिलाकर जंगलों में रास्ता बताते हुए हमारी अयोध्या तक पहुंचने में काफी मदद की।- अंब्ररीश उपाध्याय।
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- 1990 का अयोध्या का वो मंजर याद कर सिहर उठते हैं। निहत्थे हजारों कारसेवकों की भीड़ पर पहले लाठीचार्ज फिर फायरिंग में न जाने कितने कारसेवक मारे गए। कारसेवकों के शवों को उठा उठाकर सरयू नदी में फेंका जा रहा था। बड़ा ही आंखों के सामने द्रवित करने वाला दृश्य था। लेकिन इस बात का परम संतोष व हर्ष है कि मेरे जीवन काल में ही अयोध्या में प्रभु श्री राम का भव्य व दिव्य मंदिर का निर्माण होकर उसमें राम लला प्रतिष्ठित हो रहे हैं।- राधेश्याम त्रिवेदी।
- लखनऊ से अयोध्या जाने वाली सभी ट्रेनें बंद कर दी गई थी जिसके कारण गोरखपुर जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए। यह ट्रेन भी मनकापुर से पहले घने जंगलों में रोक दी गई। ग्रामीण कारसेवकों को अपने साथ ले गए। अपने गांव में ठहराकर सुबह अयोध्या जाने का रास्ता बताकर हमारा साहस बढ़ाया। ऐसे ही गावों में होते हुए जंगल के रास्ते छह दिन में अयोध्या पहुंच पाए। वे तमामकष्ट राम लला के बन रहे भव्य मंदिर के आगे नगण्य हैं। जीवन में राम लला के प्रतिष्ठित होने के बाद उनका मंदिर देखने से बड़ा सौभाग्य कुछ भी नहीं है- दिनेश चंद्र बरवारिया।
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कारसेवक कासगंज से ट्रेन द्वारा लखनऊ के लिए रवाना हुए। लखनऊ से अयोध्या के लिए सारी ट्रेनें रोक दी गईं थीं। अयोध्या से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए। मनकापुर स्टेशन से पहले ही जंगल में रात में ट्रेन रोक दी गईं। वहां से ग्रामीणों की सहायता से छह दिन पैदल चलकर सभी 31 अक्तूबर को अयोध्या पहुंच पाए। 31 अक्तूबर को पुलिस ने अयोध्या पहुंचे कारसेवकों पर सरयू पुल पर लाठी चार्ज कर दिया। जिसमें पन्नालाल कोठेवार लुहुलूहान हो गए। साथी कारसेवकों ने उनको ट्रेन द्वारा लखनऊ रवाना कर दिया। और नाव द्वारा सरयू नदी के रास्ते जन्मभूमि तक 2 नवंबर को पहुंच गए। जहां पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज के ये सभी कारसेवक गवाह बने। इन सभी के भी पुलिस की लाठियां पड़ी। उस समय निरीह रामभक्तों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने का वाकया याद कर ये राम भक्त कारसेवक फफक पड़े। वर्तमान में इनमें से पन्नालाल कोठेवार जिनका अयोध्या में लाठीचार्ज में गंभीर चोटें आने से कुछ दिन बाद ही निधन हो गया। कारसेवा में हिस्सा लेने वाले जो कारसेवक इस समय तीर्थनगरी में हैं। उन्होंने इस संबंध में जानकारियां दीं।
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कारसेवकों की बात-
- कासगंज स्टेशन पर जीआरपी द्वारा ट्रेन में चढऩे से रोकने पर लखनऊ में आईटीआई का पेपर होने के बात कहकर ट्रेन में सवार हो गए। लखनऊ में कारसेवकों की भीड़ के आगे चारबाग स्टेशन पर फोर्स कम होने के कारण ट्रेन में चढऩे से फोर्स नहीं रोक पाया। अयोध्या से डेढ़ किलोमीटर पहले ट्रेनें रोक दी गई। ग्रामीणों ने अपने यहां भोजन खिलाकर जंगलों में रास्ता बताते हुए हमारी अयोध्या तक पहुंचने में काफी मदद की।- अंब्ररीश उपाध्याय।
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- 1990 का अयोध्या का वो मंजर याद कर सिहर उठते हैं। निहत्थे हजारों कारसेवकों की भीड़ पर पहले लाठीचार्ज फिर फायरिंग में न जाने कितने कारसेवक मारे गए। कारसेवकों के शवों को उठा उठाकर सरयू नदी में फेंका जा रहा था। बड़ा ही आंखों के सामने द्रवित करने वाला दृश्य था। लेकिन इस बात का परम संतोष व हर्ष है कि मेरे जीवन काल में ही अयोध्या में प्रभु श्री राम का भव्य व दिव्य मंदिर का निर्माण होकर उसमें राम लला प्रतिष्ठित हो रहे हैं।- राधेश्याम त्रिवेदी।
- लखनऊ से अयोध्या जाने वाली सभी ट्रेनें बंद कर दी गई थी जिसके कारण गोरखपुर जाने वाली ट्रेन में सवार हो गए। यह ट्रेन भी मनकापुर से पहले घने जंगलों में रोक दी गई। ग्रामीण कारसेवकों को अपने साथ ले गए। अपने गांव में ठहराकर सुबह अयोध्या जाने का रास्ता बताकर हमारा साहस बढ़ाया। ऐसे ही गावों में होते हुए जंगल के रास्ते छह दिन में अयोध्या पहुंच पाए। वे तमामकष्ट राम लला के बन रहे भव्य मंदिर के आगे नगण्य हैं। जीवन में राम लला के प्रतिष्ठित होने के बाद उनका मंदिर देखने से बड़ा सौभाग्य कुछ भी नहीं है- दिनेश चंद्र बरवारिया।