आगरा: चुनाव में न पेठे की बात हो रही, न जूते की, न ही ताज की, गठबंधन की परीक्षा
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आगरा की तीन चीजें बेहद मशहूर हैं। ताजमहल की खूबसूरती, मुगलकाल के पहले से चली आ रही पेठे की बेजोड़ मिठास और 50 से अधिक देशों में निर्यात किए जा रहे जूताें की चमक। इस चुनाव में तीनों पर ही बात नहीं हो रही। मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी धैर्य दिखाकर सौहार्द बनाए रखने वाली इस सुलहकुल की नगरी में सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण नहीं हो पाता है, इसलिए चुनावी बिसात जातीय समीकरणों पर बिछी है। मुकाबला भाजपा के प्रोफेसर एसपी सिंह बघेल और गठबंधन के मनोज सोनी के बीच लग रहा है। कांग्रेस की प्रीता हरित भी वोटरों के बीच अपनी बात प्रभावी तरीके से रख रही हैं।
तीनों उम्मीदवार इस सीट से पहली बार किस्मत आजमा रहे हैं। प्रदेश के पशुधन मंत्री एसपी सिंह बघेल जलेसर सीट (जो 2009 में परिसीमन में खत्म हो गई) से तीन बार सांसद रह चुके हैं। वह 2014 में फिरोजाबाद से हार गए थे। रीयल एस्टेट कारोबारी मनोज सोनी को 2014 में हाथरस से शिकस्त खानी पड़ी। प्रीता हरित आयकर विभाग में प्रधान आयुक्त के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर कुछ ही दिन पहले ही राजनीति में आईं हैं।
सभी विधानसभा क्षेत्र भाजपा के कब्जे में
यहां की पांचों विधान सभा क्षेत्रों उत्तर, दक्षिण, छावनी, एत्मादपुर और जलेसर में भाजपा के विधायक हंै। भाजपा की यह बड़ी ताकत है। पार्टी के परंपरागत वोटर कहे जाने वाले वैश्य समाज के तीन लाख वोटर हैं। चुनाव के दौरान सपा-बसपा के कई नेता भाजपा में शामिल हुए। बघेल के समर्थन में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, सीएम योगी आदित्यनाथ और गृहमंत्री राजनाथ सिंह रैली कर चुके हैं।
तीन लाख वोट से जीते फिर भी कटा टिकट
एससी आयोग के अध्यक्ष राम शंकर कठेरिया 2014 में तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीते। यह इस सीट पर अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। उन्हें लगभग 54 फीसदी वोट मिले। इस बार जीत की हैट्रिक का मौका था, लेकिन भाजपा ने इस बार उन्हें उनके गृह जनपद इटावा से टिकट दिया है। आगरा में उनके प्रति नाराजगी बताई जा रही थी।
जातीय समीकरण
वैश्य - 3.15 लाख, एससी - 2.80 लाख, मुस्लिम 2.70 लाख, ब्राहमण 1.60 लाख, बघेल 1.30 लाख, जाट 1.25 लाख, यादव 80 हजार, कुशवाहा 70 हजार।
आगरा के किले पर बदलते रहते हैं झंडे
1952 में आगरा दो सीटों में बंटा था-आगरा पूर्वी व आगरा पश्चिम। पश्चिम से कांग्रेस के रघुवर दयाल और पूर्वी से कांग्रेस के ही सेठ अचल सिंह जीते। 1957 में यह एक सीट हो गई। सेठ अचल सिंह 1952 से 1971 तक लगातार पांच बार जीते। 1977 में बीकेडी के शंभूनाथ चतुर्वेदी ने उन्हें जीत का छक्का लगाने से रोका।
इसके बाद आगरा के मतदाता लहर के साथ चले। 80 और 84 में कांग्रेस जीती। 89 में वीपी सिंह की लहर में जनता दल को विजय मिली। 1991, 1996 और 1998 में राम लहर में भाजपा ने हैट्रिक लगाई। 1999 और 2004 में सपा के राज बब्बर जीते जबकि 2009 में सुरक्षित सीट होने पर पहले सांसद बने भाजपा के रामशंकर कठेरिया। 2014 में वे 3 लाख से ज्यादा वोटों से जीते।
बसपा आज तक नहीं जीती यह सीट
बसपा इस सीट पर कभी जीत नहीं पाई, लेकिन इस बार हाथी अकेला नहीं है। सपा और रालोद भी साथ हैं। हालांकि बसपा के पूर्व विधायकों के दूसरे दलों में चले जाने से हाथी की राह थोड़ी मुश्किल हुई है। गठबंधन की ओर से एक ही बड़ी रैली हुई, जिसमें सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह आए, लेकिन चुनाव आयोग की पाबंदी के कारण बसपा अध्यक्ष मायावती शिरकत नहीं कर सकीं। कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने रोड शो किया।