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Agra News: लाइक, शेयर और सब्सक्राइब...तबाह हो रही बच्चों की लाइफ
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प्रो. मोहम्मद अरशद खान, डॉ. पूनम तिवारी
आगरा। बच्चों में सोशल मीडिया की लत लगने का बड़ा कारण उनसे रील बनवाना है। रील बनाने के बाद उनमें लाइक, शेयर और सब्सक्राइब देखने की जिज्ञासा बनी रहती है। वे बार-बार फोन चेक करते हैं और कम लाइक मिलने पर बेचैन होते हैं। इससे उनकी पढ़ाई-लिखाई भी प्रभावित हो रही है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि अभिभावक बच्चों को रील बनाने की आदत न लगने दें। न ही खुद उनसे रील बनवाएं।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय के निदेशक प्रो. दिनेश राठौर ने बताया कि बच्चों से रील बनवाना या उनकी रील बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है। परिजन रील बनाने के बाद सोशल मीडिया पर उसे शेयर करते हैं। शुरुआत में यह शौक लगता है लेकिन फिर इसकी लत लग जाती है। रील को कितने लाइक मिले, कितनों ने शेयर किया, इसके लिए बच्चे बार-बार फोन देखते हैं।
लाइक-शेयर कम होने और दूसरों की रील ज्यादा पसंद किए जाने पर उनमें बेचैनी होने लगती है। लंबे समय के बाद इससे बच्चों की पढ़ाई और अन्य काम प्रभावित होते हैं। वह हर वक्त यही सोचते हैं कि क्या रील बनाई जाए। इससे उनके व्यवहार में भी बदलाव आता है। ऐसी परेशानी वाले 20-25 मामले हर माह ओपीडी में आते हैं। मानसिक स्वास्थ्य संस्थान का हेल्पलाइन नंबर 14416 है।
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रील के फेर में बच्चों की क्षमता हो रही सीमित
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. मोहम्मद अरशद खान का कहना है कि कई अभिभावक बच्चों की रील इसलिए भी बनवाते हैं, जिससे उनकी कमाई हो सके। इससे कुछ कमाई तो हो सकती है लेकिन बच्चों में अन्य क्षेत्र में बेहतर करने की क्षमता सीमित होने लगती है। पढ़ाई-लिखाई प्रभावित होने के साथ उसका पूरा ध्यान रील बनाने के लिए नए आइडिया पर ही लगा रहता है। ऐसे में बच्चों का कॅरिअर भी प्रभावित होने का खतरा रहता है।
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रील बनाना प्रतिष्ठा का प्रतीक मान रहे हैं लोग
आरबीएस कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग की डॉ. पूनम तिवारी का कहना है कि रील बनाना लोगों ने प्रतिष्ठा का प्रतीक बना लिया है। बड़ी संख्या में लोग बच्चों की रील भी बना रहे हैं। बच्चों में गेम और रील की सबसे ज्यादा लत लग रही है। इससे उसका मानसिक और सामाजिक व्यवहार भी विकृत हो रहा है। कई बार बच्चे साइबर क्राइम का शिकार भी हो जाते हैं। हाल ही में एक स्कूल के बच्चे के साथ ऐसी घटना घटित हुई थी। ऐसे में अभिभावक बच्चों की रील बनाने से बचें।
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इन बातों का रखें ध्यान:
- खाली समय में पेंटिंग, खेलकूद, संगीत समेत अन्य शौक पूरे करें।
- भोजन करते समय और सोने से पहले मोबाइल-टीवी देखने से बचें।
- अभिभावक भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित करें।
- बार-बार फोन देखने, बेचैन होने पर बच्चों की काउंसलिंग कराएं।
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मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय के निदेशक प्रो. दिनेश राठौर ने बताया कि बच्चों से रील बनवाना या उनकी रील बनाने का चलन तेजी से बढ़ा है। परिजन रील बनाने के बाद सोशल मीडिया पर उसे शेयर करते हैं। शुरुआत में यह शौक लगता है लेकिन फिर इसकी लत लग जाती है। रील को कितने लाइक मिले, कितनों ने शेयर किया, इसके लिए बच्चे बार-बार फोन देखते हैं।
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लाइक-शेयर कम होने और दूसरों की रील ज्यादा पसंद किए जाने पर उनमें बेचैनी होने लगती है। लंबे समय के बाद इससे बच्चों की पढ़ाई और अन्य काम प्रभावित होते हैं। वह हर वक्त यही सोचते हैं कि क्या रील बनाई जाए। इससे उनके व्यवहार में भी बदलाव आता है। ऐसी परेशानी वाले 20-25 मामले हर माह ओपीडी में आते हैं। मानसिक स्वास्थ्य संस्थान का हेल्पलाइन नंबर 14416 है।
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रील के फेर में बच्चों की क्षमता हो रही सीमित
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. मोहम्मद अरशद खान का कहना है कि कई अभिभावक बच्चों की रील इसलिए भी बनवाते हैं, जिससे उनकी कमाई हो सके। इससे कुछ कमाई तो हो सकती है लेकिन बच्चों में अन्य क्षेत्र में बेहतर करने की क्षमता सीमित होने लगती है। पढ़ाई-लिखाई प्रभावित होने के साथ उसका पूरा ध्यान रील बनाने के लिए नए आइडिया पर ही लगा रहता है। ऐसे में बच्चों का कॅरिअर भी प्रभावित होने का खतरा रहता है।
रील बनाना प्रतिष्ठा का प्रतीक मान रहे हैं लोग
आरबीएस कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग की डॉ. पूनम तिवारी का कहना है कि रील बनाना लोगों ने प्रतिष्ठा का प्रतीक बना लिया है। बड़ी संख्या में लोग बच्चों की रील भी बना रहे हैं। बच्चों में गेम और रील की सबसे ज्यादा लत लग रही है। इससे उसका मानसिक और सामाजिक व्यवहार भी विकृत हो रहा है। कई बार बच्चे साइबर क्राइम का शिकार भी हो जाते हैं। हाल ही में एक स्कूल के बच्चे के साथ ऐसी घटना घटित हुई थी। ऐसे में अभिभावक बच्चों की रील बनाने से बचें।
इन बातों का रखें ध्यान:
- खाली समय में पेंटिंग, खेलकूद, संगीत समेत अन्य शौक पूरे करें।
- भोजन करते समय और सोने से पहले मोबाइल-टीवी देखने से बचें।
- अभिभावक भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल सीमित करें।
- बार-बार फोन देखने, बेचैन होने पर बच्चों की काउंसलिंग कराएं।

प्रो. मोहम्मद अरशद खान, डॉ. पूनम तिवारी