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आगरा कथा: प्रतापपुरा में आई थी पहली मोटर कार, जानिए इसका इतिहास
Sun, 07 Feb 2021 12:40 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sun, 07 Feb 2021 12:40 PM IST
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आगरा: प्रतापपुरा का फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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प्रतापपुरा वह इलाका है जहां शहर में सबसे पहले मोटर कार आई। सिर्फ यही नहीं, यहीं पर शहर का पहला पेट्रोल पंप खुला। हालांकि इतिहास की किताबों में इसका उल्लेख नहीं मिलता कि प्रतापपुरा का नाम किसके नाम पर रखा गया लेकिन इसके साथ कई दिलचस्प किस्से जुड़े हैं।
इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे ने बताया कि वर्ष 1863 में यहां पहली मोटर कार आई। यह सरकारी कार थी। लोग उसे देखने के लिए आते थे। इसके बाद लाला खूबचंद ने मोटर पार्ट्स की शहर की पहली दुकान खोली। इसके बाद सिलसिला चल पड़ा। एक पारसी सेठ ने अजमेर रोड पर पेट्रोल पंप खोल लिया। नहर दफ्तर के इंजीनियर ने निजी कार खरीद ली। इसके बाद आगरा के रईसों ने भी कारें खरीदीं। दयालबाग के साहिबजी महाराज उस समय की सबसे महंगी रोल्स रॉयस कार खरीद लाए। छिली ईंट की घटिया के एडवोकेट पंडित कृष्णदत्त ने फ्रेंच कार सिंट्रोइन खरीदी।
शहर का पहला डाकखाना भी यहीं पर
प्रतापपुरा इलाके में ही वर्ष 1863 में आगरा क्लब खुला। उसी साल नहर का दफ्तर खुला। वर्ष 1905 में बड़ा डाकखाना बना। इस इलाके में बड़े बंगले थे। ये अंग्रेजों, नवाबों और पारसियों के थे। वर्ष 1857 के गदर से पहले पादरियों ने आगरा में बैपटिस्ट मिशन के दो प्रमुख केंद्र बनाए। इनमें से एक प्रतापपुरा में था, दूसरा इरादत नगर के चितौरा में।
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इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे ने बताया कि वर्ष 1863 में यहां पहली मोटर कार आई। यह सरकारी कार थी। लोग उसे देखने के लिए आते थे। इसके बाद लाला खूबचंद ने मोटर पार्ट्स की शहर की पहली दुकान खोली। इसके बाद सिलसिला चल पड़ा। एक पारसी सेठ ने अजमेर रोड पर पेट्रोल पंप खोल लिया। नहर दफ्तर के इंजीनियर ने निजी कार खरीद ली। इसके बाद आगरा के रईसों ने भी कारें खरीदीं। दयालबाग के साहिबजी महाराज उस समय की सबसे महंगी रोल्स रॉयस कार खरीद लाए। छिली ईंट की घटिया के एडवोकेट पंडित कृष्णदत्त ने फ्रेंच कार सिंट्रोइन खरीदी।
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शहर का पहला डाकखाना भी यहीं पर
प्रतापपुरा इलाके में ही वर्ष 1863 में आगरा क्लब खुला। उसी साल नहर का दफ्तर खुला। वर्ष 1905 में बड़ा डाकखाना बना। इस इलाके में बड़े बंगले थे। ये अंग्रेजों, नवाबों और पारसियों के थे। वर्ष 1857 के गदर से पहले पादरियों ने आगरा में बैपटिस्ट मिशन के दो प्रमुख केंद्र बनाए। इनमें से एक प्रतापपुरा में था, दूसरा इरादत नगर के चितौरा में।
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रकाबगंज में है ऑटो पार्ट्स का बड़ा कारोबार
आगरा ऑटो ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष संजय सिंघल ने बताया कि रकाबगंज थाना क्षेत्र में स्क्रैप और ऑटोपार्ट्स का काम बड़े पैमाने पर होता है। 100 दुकानें और शोरूम हैं। पिछले करीब 100 वर्षों से यह कारोबार हो रहा है।
गुरु तेगबहादुर की याद में बना गुरुद्वारा
रकाबगंज में ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी है। यह गुरु तेगबहादुर महाराज जी की याद में बना है। गुरुद्वारा गुरु के ताल के मास्टर गुरनाम सिंह ने बताया कि उनकी दिल्ली चांदनी चौक में शहीदी हुई थी। गुरु महाराज का शीश जैता जी श्री आनंदपुर साहिब लेकर आ गए थे और गुरु महाराज का धड़ चांदनी चौक पर ही था।
गुरु महाराज के सेवक लक्खी शाह बंजारा धड़ रकाबगंज लेकर आए और यहां घर में अंतिम संस्कार किया। मुगलों से बचने के लिए उन्होंने कह दिया कि उनके घर में आग लग गई है। यह वर्ष 1675 की बात है। बाद में उन्होंने गुरु महाराज के अंतिम संस्कार की जानकारी दी। 11 मार्च, 1793 में बाबा बघेल सिंह ने दिल्ली फतह की, तब गुरुद्वारे में सेवा आरंभ की।
आगरा ऑटो ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष संजय सिंघल ने बताया कि रकाबगंज थाना क्षेत्र में स्क्रैप और ऑटोपार्ट्स का काम बड़े पैमाने पर होता है। 100 दुकानें और शोरूम हैं। पिछले करीब 100 वर्षों से यह कारोबार हो रहा है।
गुरु तेगबहादुर की याद में बना गुरुद्वारा
रकाबगंज में ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी है। यह गुरु तेगबहादुर महाराज जी की याद में बना है। गुरुद्वारा गुरु के ताल के मास्टर गुरनाम सिंह ने बताया कि उनकी दिल्ली चांदनी चौक में शहीदी हुई थी। गुरु महाराज का शीश जैता जी श्री आनंदपुर साहिब लेकर आ गए थे और गुरु महाराज का धड़ चांदनी चौक पर ही था।
गुरु महाराज के सेवक लक्खी शाह बंजारा धड़ रकाबगंज लेकर आए और यहां घर में अंतिम संस्कार किया। मुगलों से बचने के लिए उन्होंने कह दिया कि उनके घर में आग लग गई है। यह वर्ष 1675 की बात है। बाद में उन्होंने गुरु महाराज के अंतिम संस्कार की जानकारी दी। 11 मार्च, 1793 में बाबा बघेल सिंह ने दिल्ली फतह की, तब गुरुद्वारे में सेवा आरंभ की।