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आगरा कथा: किले की खाई से निकला दरेसी का वजूद, अंग्रेजों से जुड़ा है इसका रोचक इतिहास
Sat, 27 Feb 2021 12:04 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sat, 27 Feb 2021 12:04 AM IST
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आगरा का दरेसी बाजार
- फोटो : अमर उजाला
आगरा शहर का दरेसी बाजार विकसित तो हुआ अंग्रेजों के जमाने में लेकिन इसकी नींव रख दी गई थी मुगलों के दौर में। दरअसल, जब आगरा किले की खाई बनाई गई तो खोदाई से निकली मिट्टी के ढेर जिस जगह पर रखे गए, वही बाद में दरेसी कहलाया।
इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे अपनी पुस्तक ‘तवारीख ए आगरा’ के हवाले से बताते हैं कि मुगलों के दौर में यह सुनसान इलाका था।
किले की सुरक्षा के लिए खाई बनवाई गई तो मिट्टी को यहां डाला गया। इससे यहां टीले जैसे मिट्टी के तीन ढेर लग गए। ये लंबे समय तक यूं ही बने रहे। अंग्रेजी हुकूमत आने पर इन्हें हटाया गया। अंग्रेजों ने इस क्षेत्र की ड्रेसिंग कराई। इससे जमीन एकसार हो गई। ड्रेसिंग कराने की वजह से इस इलाके को ड्रेसी और फिर दरेसी कहा जाने लगा। धीरे-धीरे इलाका विकसित हुआ। लोग रहने के लिए आए। बाजार बना मगर नाम दरेसी ही रहा।
ये भी पढ़ें- आगरा कथा: अंग्रेज अफसर फैल्यूट से पड़ा फुलट्टी का नाम, दिलचस्प है इसका इतिहास
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अब शहर का प्रमुख बाजार है
छत्ता क्षेत्र में रावतपाड़े के पास स्थित यह बाजार कपड़े, दाल और अनाज की दुकानों के लिए जाना जाता है। यहां साइकिल का भी बड़ा कारोबार है। देश के विभाजन के समय विस्थापित होकर आगरा आए सिंधी समाज के लोगों ने यहां खोखे खोले। फिर ये दुकानोें में बदल गए। यहां 200 से ज्यादा दुकानें हैं।
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इतिहासकार राज किशोर शर्मा राजे अपनी पुस्तक ‘तवारीख ए आगरा’ के हवाले से बताते हैं कि मुगलों के दौर में यह सुनसान इलाका था।
किले की सुरक्षा के लिए खाई बनवाई गई तो मिट्टी को यहां डाला गया। इससे यहां टीले जैसे मिट्टी के तीन ढेर लग गए। ये लंबे समय तक यूं ही बने रहे। अंग्रेजी हुकूमत आने पर इन्हें हटाया गया। अंग्रेजों ने इस क्षेत्र की ड्रेसिंग कराई। इससे जमीन एकसार हो गई। ड्रेसिंग कराने की वजह से इस इलाके को ड्रेसी और फिर दरेसी कहा जाने लगा। धीरे-धीरे इलाका विकसित हुआ। लोग रहने के लिए आए। बाजार बना मगर नाम दरेसी ही रहा।
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छत्ता क्षेत्र में रावतपाड़े के पास स्थित यह बाजार कपड़े, दाल और अनाज की दुकानों के लिए जाना जाता है। यहां साइकिल का भी बड़ा कारोबार है। देश के विभाजन के समय विस्थापित होकर आगरा आए सिंधी समाज के लोगों ने यहां खोखे खोले। फिर ये दुकानोें में बदल गए। यहां 200 से ज्यादा दुकानें हैं।