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आगरा कथा: गुजराती ब्राह्मणों ने बसाया था गुजरातीपाड़ा, अकाल के बाद पलायन कर आए थे यहां
Fri, 15 Jan 2021 03:42 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Fri, 15 Jan 2021 03:42 PM IST
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आगरा का गुजरातीपाड़ा
- फोटो : अमर उजाला
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नाई की मंडी में एक मोहल्ले का नाम है गुजरातीपाड़ा। इसके नाम से ही लगता है कि इसका संबंध गुजरात से है। ऐसा है भी। मुगल बादशाह अकबर ने सन 1572-73 में गुजरात पर विजय प्राप्त की। अगले ही साल गुजरात में अकाल पड़ गया। लोग पलायन करने के लिए मजबूर हो गए थे। बड़ी संख्या में गुजराती ब्राह्मण आगरा आए। ये लोग नाई की मंडी में जहां बसे, वही गुजरातीपाड़ा कहलाया।
इतिहासकार राज किशोर राते ने बताया कि बाद में ये लोग गोकुलपुरा में चले गए। इनमें से एक ईश्वर दास नागर शाहजहां के दौर में मनसबदार रहा। कहा जाता है कि ईश्वर दास के एक संबंधी गोकु लदास नागर ने गोकुलपुरा बसाया था।
हमारी धरोहर आगरा कथा: मुगल शासनकाल में बनी ताजनगरी की मंडियां, जानिए इनका इतिहास
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मुगल बादशाह फर्रुखसियर के समय में गुजराती ब्राह्मण छबीलाराम को आगरा का सूबेदार बनाया गया था। गुजराती ब्राह्मणों ने गोकुलपुरा में सोमेश्वर महादेव और हाटकेश्वर महादेव मंदिर बनवाए थे। इन्हें नागर ब्राह्मण कहा जाता था। सत्ता और समाज में इनका अच्छा प्रभाव रहा। 18वीं सदी में जाट राजाओं के पतन के पश्चात ये लोग गोकुलपुरा में जा बसे।
गोकुलपुरा ले आए थे मूर्ति
सतीश चंद्र चतुर्वेदी की किताब आगरानामा में यह भी उल्लेख है कि शाहजहां ने ताजमहल बनवाने के लिए जब राजा मान सिंह का महल उनके पौत्र जय सिंह से लिया तो ईश्वर दास नागर महल के मंदिर की मूर्तियां वहां से गोकुलपुरा ले आए थे। उन्होंने मंदिर में मूर्तियों को स्थापित कराया था।
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इतिहासकार राज किशोर राते ने बताया कि बाद में ये लोग गोकुलपुरा में चले गए। इनमें से एक ईश्वर दास नागर शाहजहां के दौर में मनसबदार रहा। कहा जाता है कि ईश्वर दास के एक संबंधी गोकु लदास नागर ने गोकुलपुरा बसाया था।
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गोकुलपुरा ले आए थे मूर्ति
सतीश चंद्र चतुर्वेदी की किताब आगरानामा में यह भी उल्लेख है कि शाहजहां ने ताजमहल बनवाने के लिए जब राजा मान सिंह का महल उनके पौत्र जय सिंह से लिया तो ईश्वर दास नागर महल के मंदिर की मूर्तियां वहां से गोकुलपुरा ले आए थे। उन्होंने मंदिर में मूर्तियों को स्थापित कराया था।
व्यापार का प्रमुख केंद्र था आगरा
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
मंडियां ही नहीं, गंज और हाई भी
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि व्यापार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अकबर के समय सिर्फ मंडियों की ही स्थापना नहीं की गई, बल्कि हाई और गंज भी बनाए गए। हाई ऐसी जगह होती थी जहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे, जैसे नुनिहाई। इसी तरह गंज संभवत: वे स्थान थे, जहां सामान का भंडारण किया जाता था, जैसे ताजगंज, बेलनगंज, शाहगंज, आलमगंज, मोतीगंज।
राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगलिया दौर में आगरा व्यापार का बड़ा केंद्र रहा। अकबर के समय में देश का ही नहीं, एशिया के प्रमुख बाजार लाहौर और आगरा थे। अकबर के वजीर ए आजम रहे अबुल फजल ने भी इसका वर्णन किया है। दरी-गलीचे, शॉल, मसाले, हाथी दांत, सूती वस्त्र, लोहे के हथियार का कारोबार होता था। आगरा और सीकरी में सिक्कों की टकसालें थीं।
मंडियां ही नहीं, गंज और हाई भी
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि व्यापार को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए अकबर के समय सिर्फ मंडियों की ही स्थापना नहीं की गई, बल्कि हाई और गंज भी बनाए गए। हाई ऐसी जगह होती थी जहां साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक बाजार लगते थे, जैसे नुनिहाई। इसी तरह गंज संभवत: वे स्थान थे, जहां सामान का भंडारण किया जाता था, जैसे ताजगंज, बेलनगंज, शाहगंज, आलमगंज, मोतीगंज।