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जन्माष्टमीः संरक्षण नहीं हुआ तो विलुप्त हो जाएंगी नंदगांव में कृष्णकाल की निशानियां
Wed, 21 Aug 2019 02:20 PM IST
Abhishek Saxena
यतेंद्र तिवारी, अमर उजाला, मथुरा-नंदगांव
यतेंद्र तिवारी, अमर उजाला, मथुरा-नंदगांव
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 21 Aug 2019 02:20 PM IST
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नंदगांव में कृष्णकाल की निशानियां
- फोटो : अमर उजाला
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कान्हा की क्रीड़ा स्थली नंदगांव में कृष्ण काल की कई निशानियां बिना उचित संरक्षण के विलुप्त होने के कगार पर हैं। इन बहुमूल्य निशानियों की न तो स्थानीय लोगों को और न ही शासन प्रशासन को इनके संरक्षण की फिक्र है।
इन धरोहरों को सुरक्षित रखने के कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। प्रचार प्रसार के अभाव में और प्रशासन की नीरसता के चलते तमाम श्रद्धालु कृष्ण के इन निशानों तक पहुंच ही नहीं पाते। इन अमूल्य धरोहरों पर थोड़ा भी ध्यान दिया जाए तो ये निशान और भी लंबे समय तक संरक्षित हो सकते हैं। इनके संरक्षण से निश्चित ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
हाऊ बिलाऊ
मान्यता है कि कृष्ण काल में कंस ने कृष्ण को मारने के लिए राक्षस भेजे थे। सांडिल्य ऋषि के श्राप के चलते राक्षस पाषाण के बन गए। यशोदा मैया कुंड में कन्हैया को जाने से रोकने के लिए इन प्रतिमाओं से डराती थीं।
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जंगल में बसे हाऊ बिलाऊ की 4 प्रतिमाओं में से 2 को करीब डेढ़ दशक पूर्व पाषाण तस्करों द्वारा चुरा लिया गया। बताया गया कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उन दिनों उनकी कीमत करोड़ों में थी। 2 मूर्तियां भी संरक्षण के अभाव में जीर्ण शीर्ण होती चली जा रही हैं।
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इन धरोहरों को सुरक्षित रखने के कोई भी प्रयास नहीं किए गए हैं। प्रचार प्रसार के अभाव में और प्रशासन की नीरसता के चलते तमाम श्रद्धालु कृष्ण के इन निशानों तक पहुंच ही नहीं पाते। इन अमूल्य धरोहरों पर थोड़ा भी ध्यान दिया जाए तो ये निशान और भी लंबे समय तक संरक्षित हो सकते हैं। इनके संरक्षण से निश्चित ही पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।
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हाऊ बिलाऊ
मान्यता है कि कृष्ण काल में कंस ने कृष्ण को मारने के लिए राक्षस भेजे थे। सांडिल्य ऋषि के श्राप के चलते राक्षस पाषाण के बन गए। यशोदा मैया कुंड में कन्हैया को जाने से रोकने के लिए इन प्रतिमाओं से डराती थीं।
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जंगल में बसे हाऊ बिलाऊ की 4 प्रतिमाओं में से 2 को करीब डेढ़ दशक पूर्व पाषाण तस्करों द्वारा चुरा लिया गया। बताया गया कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उन दिनों उनकी कीमत करोड़ों में थी। 2 मूर्तियां भी संरक्षण के अभाव में जीर्ण शीर्ण होती चली जा रही हैं।
मांट विलोमनी
यशोदा मैया जिन बड़ी बड़ी मटकियों में दूध चलाती थीं नंदगांव के लोगों ने आज भी उनमें से एक मटकी को संरक्षित करके रखा हुआ है। बताया जाता है कि करीब दशकों पूर्व इन मटकियों की संख्या 4 से भी अधिक थीं।
बहूमूल्य मटकियों पर ध्यान न देने के चलते केवल एक ही रह गई है। करीब 6 फुट गहरी पाषाण की इस मटकी का आकार कुएं की भांति दिखाई देता है। लोगों का कहना है कि आज भी जब भयंकर गर्मी पड़ती है तो इसमें से घी जैसा चिकना द्रव रिसता है।
चरण चिन्ह
चरण पहाड़ी नामक स्थान पर भगवान कृष्ण के पैरों के निशान आज भी नंदीश्वर पर्वत पर बने हुए हैं। मान्यता है कि इस पर्वत पर बाल कृष्ण ने जब वंशी बजाई तो भगवान शंकर रूपी ये पर्वत द्रवीभूत हो गया। जिस स्थान पर बालकृष्ण के पैर थे वो स्थान भी पिघल गया और निशान बन गए। कुछ श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां छोटा सा मंदिर बना दिया गया है।
यशोदा मैया जिन बड़ी बड़ी मटकियों में दूध चलाती थीं नंदगांव के लोगों ने आज भी उनमें से एक मटकी को संरक्षित करके रखा हुआ है। बताया जाता है कि करीब दशकों पूर्व इन मटकियों की संख्या 4 से भी अधिक थीं।
बहूमूल्य मटकियों पर ध्यान न देने के चलते केवल एक ही रह गई है। करीब 6 फुट गहरी पाषाण की इस मटकी का आकार कुएं की भांति दिखाई देता है। लोगों का कहना है कि आज भी जब भयंकर गर्मी पड़ती है तो इसमें से घी जैसा चिकना द्रव रिसता है।
चरण चिन्ह
चरण पहाड़ी नामक स्थान पर भगवान कृष्ण के पैरों के निशान आज भी नंदीश्वर पर्वत पर बने हुए हैं। मान्यता है कि इस पर्वत पर बाल कृष्ण ने जब वंशी बजाई तो भगवान शंकर रूपी ये पर्वत द्रवीभूत हो गया। जिस स्थान पर बालकृष्ण के पैर थे वो स्थान भी पिघल गया और निशान बन गए। कुछ श्रद्धालुओं के सहयोग से यहां छोटा सा मंदिर बना दिया गया है।