अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस: आगरा के आंगन में सुहाने लगी ‘नन्ही चिरैया’ की चहचहाहट, बेटियों की जन्म दर बढ़ी
आगरा जिले में पांच साल में बच्चियों की जन्म दर बढ़ी है। वर्ष 2015 में 1000 बालकों पर 901 बालिकाएं थीं। वहीं अब यह आंकड़ा 936 पर पहुंच गया है। 2020 के जन्म अनुपात में खेरागढ़ में बालकों से ज्यादा बालिकाओं ने जन्म लिया।
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ओ री चिरैया, नन्हीं सी चिड़िया, अंगना में फिर आजा रे...। बेटियां जब अपनों के बीच कम होने लगीं तो गीतकार स्वानंद किरकिरे ने इस गीत के जरिये भ्रूण हत्या जैसे अपराध पर लोगों को झकझोरा। समय बदला, कानून की सख्ती हुई और लोग भी समझने लगे। आगरा के लिए खुशखबर है कि अब आंगन में लोगों को ‘नन्ही चिरैया’ की चहचहाहट सुहाने लगी है। पिछले पांच साल में ताजनगरी में बेटियों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
सीएमओ डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि लोगों में जागरूकता बढ़ी तो बेटियों की जन्म दर भी बढ़ने लगी। भ्रूण लिंग जांच करने वालों को सजा मिलने पर इस काले धंधे पर अंकुश लगने से भी फर्क पड़ा। वर्ष 2015 में बालक-बालिका का औसत 1000/901.16 था। वर्ष 2020 में औसत 1000/936.68 हो गया है। खंदौली, बिचपुरी, सैंया में औसत में ज्यादा अंतर था। वहां सुधार हुआ है। खेरागढ़ में तो बालकों के मुकाबले बालिकाओं का अधिक जन्म हुआ है।
बेटियों के जन्म पर परिजन नहीं होते उदास
ऑब्सट्रेटिक्स एंड गायनोलॉजिकल सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. आरती गुप्ता का कहना है कि पांच से आठ साल पहले तक अस्पताल में बेटियां होने पर परिजन खासतौर से घर की बुजुर्ग महिलाएं उदास हो जाती थीं। पिता भी खुशी कम ही जाहिर करते थे, लेकिन अब बदला हुआ माहौल है, बेटियों के जन्म पर उदासी नहीं दिखती, घर की बुजुर्ग महिलाएं ताने भी नहीं मारती हैं।
खेरागढ़ में बेटों से ज्यादा बेटियों का हुआ जन्म
खेरागढ़ में वर्ष 2015 में साल भर में 1987 बेटे और 1849 बच्चियों का जन्म हुआ था। वर्ष 2020 की बात करें तो 1408 बालक और 1446 बच्चियों का जन्म हुआ है। खंदौली में 3224 बालकों के मुकाबले 2703 बच्चियां जन्मीं, जो 2015 में सबसे कम दर थी। 2020 में यहां भी सुधार हुआ और वर्ष 2009 के मुकाबले 1815 बच्चियां पैदा हुईं।
ये रहे कारण
पीसीपीएनडीटी एक्ट: प्री कंस्पेप्शन एंड प्री नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्सि कानून में दोष सिद्ध होने पर चिकित्सक और भ्रूण लिंग जांच कराने वाले को तीन से पांच साल की सजा और एक लाख रुपये तक का जुर्माना है।
बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ: बेटियों की कमी पर ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ के अभियान से लोगों में जागरूकता आई। बेटियों की शिक्षा और सेहत समेत अन्य योजनाओं का लाभ दिए जाने से परिजनों को सुविधा मिली।
सफलता का मुकाम: जब बेटियों की बेटों की तरह से शिक्षा, सेहत और भविष्य पर ध्यान दिया जाने लगा तो राजनीति, खेलकूद, अंतरिक्ष, सेना समेत अन्य उच्च पदों पर पहुंचकर परिजन और अपने शहर का नाम रोशन करने लगीं।
अकोला - 2035/1751 - 1435/1363
बिचपुरी - 2804/2379 - 2145/2114
बरौली अहीर - 3199/2911 - 2506/2318
शमसाबाद - 3455/3132 - 2545/2335
बाह - 2377/2152 - 1499/1400
पिनाहट - 1807/1635 - 1373/1167
जैतपुर कलां - 1338/1193 - 862/822
फतेहपुर सीकरी - 2276/2085 - 1545/1441
अछनेरा - 2739/2596 - 1273/1199
सैंया - 2185/1977 - 1495/1445
फतेहाबाद - 2636/2482 - 2335/2066
खेरागढ़ - 1987/1849 - 1408/1446
खंदौली - 3224/2703 - 2009/1815
जगनेर - 1453/1339 - 1039/991
एत्मादपुर - 2502/2255 - 1857/1766