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UP: शराब पीने की जानकारी छिपाना पड़ा भारी, बीमा कंपनी ने नहीं दिया क्लेम; उपभोक्ता आयोग से भी न मिली राहत
Fri, 08 May 2026 11:13 PM IST
Arun Parashar
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Fri, 08 May 2026 11:13 PM IST
सार
बीमार होने पर पाॅलिसी धारक को एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज में 6 लाख रुपये खर्च हुए। बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इन्कार कर दिया, जिसके बाद उन्हें उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
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जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने खारिज किया केस।
- फोटो : ANI
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विस्तार
शराब पीने की जानकारी छिपाकर बीमा पॉलिसी लेना एक व्यक्ति को भारी पड़ गया। जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (प्रथम) ने डॉक्टर की रिपोर्ट को आधार मानते हुए पीड़ित का दावा खारिज कर दिया। आयोग के अध्यक्ष सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने पाया कि पॉलिसी लेते समय तथ्यों को छिपाया गया था।
मामला न्यू आगरा के दयालबाग निवासी नीरज भार्गव का है। उन्होंने 2016 में एजेंट संजीव शर्मा से अपोलो म्यूनिख हेल्थ इंश्योरेंस (अब एचडीएफसी एर्गो) से 6 लाख रुपये की पॉलिसी ली थी। सितंबर 2020 में बीमार होने पर उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज में 6 लाख रुपये खर्च हुए। बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इन्कार कर दिया, जिसके बाद उन्हें उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
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मामला न्यू आगरा के दयालबाग निवासी नीरज भार्गव का है। उन्होंने 2016 में एजेंट संजीव शर्मा से अपोलो म्यूनिख हेल्थ इंश्योरेंस (अब एचडीएफसी एर्गो) से 6 लाख रुपये की पॉलिसी ली थी। सितंबर 2020 में बीमार होने पर उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज में 6 लाख रुपये खर्च हुए। बीमा कंपनी ने क्लेम देने से इन्कार कर दिया, जिसके बाद उन्हें उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
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आयोग में कंपनी के अधिवक्ता ने साक्ष्य पेश करते हुए बताया कि नीरज ने फॉर्म भरते समय खुद को 'नॉन-एल्कोहलिक' बताया था। हालांकि, इलाज करने वाले रामवेद हॉस्पिटल के डॉ. विवेक अग्रवाल की केस हिस्ट्री रिपोर्ट के अनुसार, मरीज पिछले 10 वर्षों से 'क्रॉनिक अल्कोहलिक' (शराब का आदी) था। तथ्यों को छिपाने के कारण आयोग ने पीड़ित के वाद को निरस्त कर दिया।