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पुराने पन्नों से: इंदिरा गांधी के चुनावी दांव...जिसके दम पर तीन बार हासिल की सत्ता, विरोधियों को किया था चित
Fri, 31 May 2024 12:21 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
संजीव सिंह, आगरा
संजीव सिंह, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Fri, 31 May 2024 12:21 PM IST
सार
इंदिरा गांधी ने कांग्रेस की कमान संभालने के बाद सियासत के वो दांव खेले, जिसने विरोधियों को कभी सामने टिकने नहीं दिया। इसकी नतीजा रहा कि वे लोकसभा के तीन चुनावों में सरकार बनाने में कामयाब रहीं।
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विस्तार
आयरन लेडी के नाम से मशहूर इंदिरा गांधी ने सफलता के रथ पर सवार कांग्रेस के विजयी अभियान को चुनाव दर चुनाव रफ्तार दी। उनकी बेहतर रणनीति और कुशल नेतृत्व के दम पर कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया। पार्टी के लिए 1967 का पहला ऐसा आम चुनाव था जो नेहरू के नेतृत्व के बिना लड़ा गया। अब उनकी बेटी इंदिरा गांधी के हाथों पार्टी की कमान थी। उन्होंने 1977 के चुनाव तक कांग्रेस को केंद्रीय सत्ता में बनाए रखा। पार्टी को 1967 में 283, 1971 में 352 और 1980 में 353 सीटों पर सफलता मिली।
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चौथी लोकसभा के लिए 1967 में हुए चुनाव तक कांग्रेस दो बड़े चेहरों जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री को खो चुकी थी। इस बार इंदिरा के राजनीतिक कौशल की परीक्षा थी। उनकी अगुआई में कांग्रेस ने 523 में से 283 सीटों पर विजय हासिल की। हालांकि पिछले आम चुनाव की तुलना में उसे 78 सीटें कम मिलीं। पार्टी को 40.78 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की सीटें कम होने की वजह यह थी कि उस समय देश महंगाई, बेरोजगारी, मंदी और खाद्य संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। कांग्रेस केंद्रीय सत्ता में होते भी इन सभी मुद्दों पर नाकाम रही।
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दक्षिण भारत में भी पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा, चूंकि वहां हिंदी भाषा विरोधी आंदोलन जोर पकड़ चुका था। सत्तारूढ़ कांग्रेस इसका भी कोई समाधान नहीं दे सकी। सी राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी को 44 सीटों पर जीत हासिल हुई। उसे 26 सीटों का फायदा हुआ। उसका वोट प्रतिशत 8. 67 फीसदी रहा। भारतीय जनसंघ को 9.31 प्रतिशत वोटों के साथ 35 सीटें मिलीं। यह पिछले चुनाव से 21 सीटें ज्यादा थीं।
पांचवीं लोकसभा के चुनाव तक इंदिरा राजनीति के दांव-पेच अच्छी तरह समझ गई थीं। गरीबी हटाओ के नारे के साथ 1971 के चुनाव में उतरी कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला। 521 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को 352 सीटें मिलीं। पार्टी में विभाजन के बावजूद पिछले चुनाव से यह 69 सीटें ज्यादा थीं। पार्टी को 43. 68 प्रतिशत मत मिले। इस बार भारतीय जनसंघ को 13 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। उसे 22 सीटें मिलीं। भारतीय जनसंघ की 13 सीटें कम होकर 22 ही रह गईं। उसे 7.35 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। भाकपा ( मार्क्सवादी) थोड़े फायदे में रही, उसकी 6 सीटें बढ़कर 25 हो गईं।
आपातकाल की वजह से सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस ने सातवें लोकसभा चुनाव में जोरदार वापसी की। जनता का सीधा सामना कर रहीं इंदिरा के लिए यह चुनाव कतई आसान नहीं था। उनके सामने हर तरफ कठिन चुनौती थी। बिहार में सत्येंद्र नारायण सिन्हा और कर्पूरी ठाकुर, कर्नाटक में रामकृष्ण हेगड़े, महाराष्ट्र में शरद पवार, हरियाणा में देवी लाल और ओडिशा में बीजू पटनायक जैसे नेता उनके कट्टर विरोधी थे। अपने क्षेत्रों में इनका काफी प्रभाव था। जनता पार्टी के अंदर मचे घमासान और देश में हुई राजनीतिक अस्थिरता ने इंदिरा को मौका दिया। जनवरी 1980 में लोकसभा की 531 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस (आई) ने 353 सीटों पर जीत दर्ज की। पार्टी ने 42. 69 वोट प्रतिशत के साथ पिछले चुनाव से 199 सीटें ज्यादा जीतीं। जनता पार्टी को 31 सीटें ही मिल पाईं। उसने 264 सीटें गंवाईं। उसका वोट प्रतिशत सिमटकर 18.97 रह गया।