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Holika Dahan 2025: होलिका दहन पर रहेगा भद्रा का साया, जानिए होलिका दहन करने का सही मुहूर्त
Tue, 11 Mar 2025 09:33 AM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Tue, 11 Mar 2025 09:33 AM IST
सार
Holika Dahan 2025: रंगों का त्योहार होली हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि के दिन बाद मनाया जाता है। इस बार होलिका दहन 13 मार्च 2025 को है फिर उसके एक दिन बाद 14 मार्च को होली खेली जाएगी। ज्योतिषाचार्य ने कहा कि प्रदोष काल में होलिका दहन अत्यंत शुभ माना गया है।
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होलिका दहन 2025
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन की परंपरा है। मान्यता है इस दिन भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए होलिका का विनाश किया था। इस बार होली पर भद्रा का साया रहेगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. पूनम वार्ष्णेय का कहना है कि होलिका दहन के लिए 13 मार्च की रात 11:28 से 12:06 बजे तक शुभ मुहूर्त है।
ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस बार 13 मार्च को सुबह 10:36 से रात 11:28 बजे तक भद्रा का प्रभाव पृथ्वी पर रहेगा। इस समय होलिका दहन करना वर्जित है। फाल्गुन की पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:36 बजे से 14 मार्च 12:24 बजे तक रहेगी। इसलिए प्रदोष काल में होलिका दहन अत्यंत शुभ माना गया है। सुबह होली की पूजा करने के लिए 10:36 से 1:30 बजे तक शुभ मुहूर्त है। इसके उपरांत 1:30 से 3 बजे तक राहुकाल रहेगा।
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ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस बार 13 मार्च को सुबह 10:36 से रात 11:28 बजे तक भद्रा का प्रभाव पृथ्वी पर रहेगा। इस समय होलिका दहन करना वर्जित है। फाल्गुन की पूर्णिमा तिथि 13 मार्च को सुबह 10:36 बजे से 14 मार्च 12:24 बजे तक रहेगी। इसलिए प्रदोष काल में होलिका दहन अत्यंत शुभ माना गया है। सुबह होली की पूजा करने के लिए 10:36 से 1:30 बजे तक शुभ मुहूर्त है। इसके उपरांत 1:30 से 3 बजे तक राहुकाल रहेगा।
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कौन है भद्रा
पुराणों के अनुसार भद्रा शनिदेव की बहन यानी सूर्यदेव की पुत्री हैं। उनका स्वभाव क्रोधी माना गया है। उनके क्रोधी स्वभाव की वजह से शुभ और मांगलिक कार्य को भद्रा की अवधि में वर्जित माना गया है। इस दौरान भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इस कारण भद्रा काल में शुभ और मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए।
पुराणों के अनुसार भद्रा शनिदेव की बहन यानी सूर्यदेव की पुत्री हैं। उनका स्वभाव क्रोधी माना गया है। उनके क्रोधी स्वभाव की वजह से शुभ और मांगलिक कार्य को भद्रा की अवधि में वर्जित माना गया है। इस दौरान भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती है। इस कारण भद्रा काल में शुभ और मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए।
भद्रा के क्यों नहीं करते होलिका दहन
कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व भद्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा काल में मांगलिक कार्य या उत्सव का आरंभ या समाप्ति अशुभ मानी जाती है, इसलिए भद्रा काल की अशुभता को मानकर कोई भी व्यक्ति शुभ कार्य नहीं करता। कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में चंद्रमा के गोचर पर भद्रा विष्टीकरण का योग बनता है। इस अवधि में भद्रा पृथ्वी लोक में रहती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। भद्रा को क्रोधी स्वभाव का माना जाता है और उनके इसी स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्माजी ने उन्हें कालगणना में एक प्रमुख अंग विष्टीकरण में स्थान दिया। हिंदी पंचांग के पांच प्रमुख अंग होते हैं- तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इसमें करण की संख्या 11 होती है। 11 करणों में 7वें करण विष्टि का नाम भद्रा है। मान्यता है कि ये तीनों लोक में भ्रमण करती है और इस कारण भद्रा काल में किसी भी प्रकार का कोई शुभ कार्य या उत्सव नहीं मनाए जाते है।
कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व भद्रा का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा काल में मांगलिक कार्य या उत्सव का आरंभ या समाप्ति अशुभ मानी जाती है, इसलिए भद्रा काल की अशुभता को मानकर कोई भी व्यक्ति शुभ कार्य नहीं करता। कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि में चंद्रमा के गोचर पर भद्रा विष्टीकरण का योग बनता है। इस अवधि में भद्रा पृथ्वी लोक में रहती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। भद्रा को क्रोधी स्वभाव का माना जाता है और उनके इसी स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्माजी ने उन्हें कालगणना में एक प्रमुख अंग विष्टीकरण में स्थान दिया। हिंदी पंचांग के पांच प्रमुख अंग होते हैं- तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इसमें करण की संख्या 11 होती है। 11 करणों में 7वें करण विष्टि का नाम भद्रा है। मान्यता है कि ये तीनों लोक में भ्रमण करती है और इस कारण भद्रा काल में किसी भी प्रकार का कोई शुभ कार्य या उत्सव नहीं मनाए जाते है।