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दवाई से मिठाई तक ये है आगरा के पेठा का पूरा सफर, इस काल में हुई खोज

Thu, 25 Jan 2018 04:00 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला आगरा Updated Thu, 25 Jan 2018 04:00 PM IST
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history of petha in agra
पेठा - फोटो : google
यूपी में एक जिला, एक उत्पाद के तहत आगरा से चयनित प्रसिद्ध पेठा समय के साथ रंग और स्वाद में बदलता जा रहा है। मुगल काल में औषधि के तौर पर बना पेठा, आज देश-विदेश में लोगों की जुबां पर मिठास घोल रहा है। सरकार ने इसे जिले के उत्पाद के तौर पर चयनित कर इसकी मिठास को दोगुना कर दिया है। 
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वर्तमान में शहर में 500 पेठा इकाइयां हैं और लगभग 5000 फुटकर विक्रेता हैं। यहां से प्रतिदिन लगभग 8-10 क्विंटल पेठा देश-विदेश में भेजा जाता है। पेठा कारोबारियों के अनुसार 1950 के दशक में सादा पेठे का निर्माण किया जाता था। 
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1958 के बाद सूखे मेवे पिस्ते, काजू, बादाम, केसर और इलायची आदि का प्रयोग किया जाने लगा, जो धीरे-धीरे देश-विदेश में भी छाने लगा। वर्तमान में 50 से अधिक किस्मों का पेठा विभिन्न स्वाद और रंगों में बनाया जा रहा है। 
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history of petha in agra
पेठा - फोटो : अमर उजाला
पेठा कारोबारियों के अनुसार 1940 से पूर्व पेठा आयुर्वेदिक औषधि के रूप में तैयार किया जाता था। इसका उपयोग वैद्य अंलावित्त, रक्त विकार, बात प्रकोप और जिगर कि बीमारी के लिए करते थे। इसे पेठा कुम्हड़ा नाम के फल से बनाया जाता है, जो कि औषधीय गुणों से भरपूर होता है। 

शुरूआत में इसे दवाई के रूप में प्रयोग किया जाता था तो इसमें मिठास नहीं होती थी, लेकिन 1945 के बाद इसके स्वाद में बदलाव किया गया। इसको गोदकर और खांड के स्थान पर चीनी और सुगंध का प्रयोग करते हुए सूखा पेठा के साथ रसीला पेठा बनाया जाने लगा। 

history of petha in agra
पेठा - फोटो : google
पेठा कारोबारियों के  अनुसार शाहजहां के राजवैद्य ने कुम्हड़ा फल का बीज यमुना नदी के किनारे मिला था, उसने ही इसका पेड़ यहां लगाया और औषधि के रूप में इसका उपयोग किया गया।

पेठा व्यवसायी सीताराम ने बताया कि हम दशकों से पेठे का कारोबार कर रहे हैं। इस दौरान काफी बदलाव देखने को मिले हैं। पहले सिर्फ सादा पेठा बनते थे। अब 50 से अधिक किस्में बनाते हैं।  

पेठा व्यवसायी पवन गर्ग बताते हैं कि पेठे का उपयोग पहले औषधि के रूप में किया जाता था। यह कई प्रकार की बीमारियों के इलाज में काम आता है। माना जाता है कि इसकी खोज मुगल काल के दौरान हुई थी।
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