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UP: धूल-धुंए से सेहत हो रही खराब, एनजीटी में बेहतर हवा का दावा...आंकड़ों से हो रहा खिलवाड़
Tue, 20 May 2025 09:52 AM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमित कुलश्रेष्ठ, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमित कुलश्रेष्ठ, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Tue, 20 May 2025 09:52 AM IST
सार
अस्थमा के रोगियों की संख्या बढ़ी हैं, उनकी परेशानियां बढ़ी हैं, लेकिन राज्य सरकार का दावा है कि आगरा में दो साल में केवल पांच दिन ही खराब हवा में सांस ली गई। बाकी पूरे समय अच्छी गुणवत्ता बनी रही।
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अमर उजाला में प्रकाशित खबर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में डीएम ने यह हलफनामा पेश किया है, जिसमें उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के कागजी आंकड़े बताए गए हैं। इन आंकड़ों पर एनजीटी में ही सवाल उठाए गए हैं। जहां यूपीपीसीबी के प्रदूषण मापी यंत्र लगे हैं वहां स्प्रिंकलर के जरिए पानी का छिड़काव का खुलासा ‘अमर उजाला’ कर चुका है। इसका वीडियो भी वायरल हुआ था। जिसके बाद मौके से स्प्रिंकलर हटवाए गए थे।
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यूपीपीसीबी के हवाले से एनजीटी को बताया गया है कि वर्ष 2023 और 2024 में आगरा की हवा में शानदार सुधार हुआ है। वर्ष 2023 में 364 दिन हवा अच्छी रही, एक दिन ही खराब, जबकि वर्ष 2024 में 362 दिन अच्छी हवा और सिर्फ चार दिन खराब हवा का दावा किया गया है। इन आंकड़ों के उलट एसएन मेडिकल कॉलेज में साल दर साल वायु प्रदूषण से होने वाली बीमारियों के मरीज लगातार बढ़े हैं। इसी दौरान एसएन में आने वाले अस्थमा के मरीजों में से 11 फीसदी बच्चे मिले हैं। एसएन में मेडिसिन विभाग के डॉ. प्रशांत प्रकाश के अनुसार प्रदूषित हवा के कारण प्रभावित बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन एनजीटी में आगरा की हवा बेहद शानदार बताई गई है। बोर्ड के मुताबिक एक्यूआई 200 से ज्यादा होने पर हवा की गुणवत्ता खराब मानी जाती है।
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साल अच्छा एक्यूआई खराब एक्यूआई
2019 269 69
2020 259 107
2021 222 143
2022 344 21
2023 364 1
2024 362 4
2019 269 69
2020 259 107
2021 222 143
2022 344 21
2023 364 1
2024 362 4
कोरोना में फैक्टरी और वाहन बंद, तब खराब रही हवा
कोरोना काल में वर्ष 2020 और दूसरी लहर में 2021 में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े भी एनजीटी में पेश किए गए आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। कोविड काल में लॉकडाउन लगाया गया, तब फैक्टरी, वाहन और प्रदूषण फैलाने वाले ज्यादातर काम बंद थे, लेकिन उन दोनों साल के आंकड़े सबसे ज्यादा है। साल 2020 में 107 दिन और 2021 में 143 दिन हवा खराब बताई गई, जबकि उसके एक साल बाद, जब फैक्टरी, वाहन और प्रदूषण फैलाने वाले काम शुरू हो गए थे, वर्ष 2023 में सिर्फ एक दिन और 2024 में चार दिन हवा खराब दर्ज की गई।
कोरोना काल में वर्ष 2020 और दूसरी लहर में 2021 में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े भी एनजीटी में पेश किए गए आंकड़ों पर सवाल उठाते हैं। कोविड काल में लॉकडाउन लगाया गया, तब फैक्टरी, वाहन और प्रदूषण फैलाने वाले ज्यादातर काम बंद थे, लेकिन उन दोनों साल के आंकड़े सबसे ज्यादा है। साल 2020 में 107 दिन और 2021 में 143 दिन हवा खराब बताई गई, जबकि उसके एक साल बाद, जब फैक्टरी, वाहन और प्रदूषण फैलाने वाले काम शुरू हो गए थे, वर्ष 2023 में सिर्फ एक दिन और 2024 में चार दिन हवा खराब दर्ज की गई।
हलफनामा में ये किया गया दावा
- नेचुरल गैस, बिजली से चलाए जा रहे उद्योग
- ताज के चारों ओर हरित पट्टी विकसित की
- दक्षिणी बाईपास और इनर रिंग रोड चालू किया
- उत्तरी बाईपास का निर्माण अंतिम चरण में जारी
- ताज के पास 7 मशीनों से की जा रही सफाई
- कोयला, लकड़ी, कूड़ा, बायोमास जलाने पर प्रतिबंध
- ताजगंज में विद्युत शवदाह गृह के 4 प्लेटफार्म चालू
- नेचुरल गैस, बिजली से चलाए जा रहे उद्योग
- ताज के चारों ओर हरित पट्टी विकसित की
- दक्षिणी बाईपास और इनर रिंग रोड चालू किया
- उत्तरी बाईपास का निर्माण अंतिम चरण में जारी
- ताज के पास 7 मशीनों से की जा रही सफाई
- कोयला, लकड़ी, कूड़ा, बायोमास जलाने पर प्रतिबंध
- ताजगंज में विद्युत शवदाह गृह के 4 प्लेटफार्म चालू
जिन आंकड़ों पर सवाल, उन्हीं को पेश किया
पर्यावरणविद डाॅ. संजय कुलश्रेष्ठ के मुताबिक एनजीटी में यूपीपीसीबी के आंकड़ों को राज्य सरकार ने पेश किया, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एएसआई रसायन शाखा और आगरा स्मार्ट सिटी के प्रदूषण आंकड़े यूपीपीसीबी से एकदम अलग हैं। इनमें तीन गुने का फर्क सामने आया है। यूपीपीसीबी के ऑटोमेटिक वेदर स्टेशनों पर स्प्रिंकलर के जरिए पानी डालने का वीडियो इन कागजी आंकड़ों की पोल पहले ही खोल चुका है। मानसून जैसे आंकड़े आएं, इसलिए लगातार स्प्रिंकलर चलाए जाते थे, जिसका अमर उजाला ने खुलासा किया था।
पर्यावरणविद डाॅ. संजय कुलश्रेष्ठ के मुताबिक एनजीटी में यूपीपीसीबी के आंकड़ों को राज्य सरकार ने पेश किया, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, एएसआई रसायन शाखा और आगरा स्मार्ट सिटी के प्रदूषण आंकड़े यूपीपीसीबी से एकदम अलग हैं। इनमें तीन गुने का फर्क सामने आया है। यूपीपीसीबी के ऑटोमेटिक वेदर स्टेशनों पर स्प्रिंकलर के जरिए पानी डालने का वीडियो इन कागजी आंकड़ों की पोल पहले ही खोल चुका है। मानसून जैसे आंकड़े आएं, इसलिए लगातार स्प्रिंकलर चलाए जाते थे, जिसका अमर उजाला ने खुलासा किया था।