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UP: मोरनी के चार अंडे दिखे तो थम गया ट्रैक्टर, किसान ने छोड़ी खेत की जुताई; बोला- खेती बाद में, जिंदगी पहले
Wed, 05 Aug 2026 09:23 AM IST
Dhirendra Singh
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Wed, 05 Aug 2026 09:23 AM IST
सार
आगरा के किरावली क्षेत्र में किसान राजवीर ने खेत की जुताई के दौरान मोरनी के चार अंडे देखे तो ट्रैक्टर रोक दिया और जुताई अधूरी छोड़ घर लौट आए। लीज पर ली गई जमीन होने के बावजूद उन्होंने अंडों को सुरक्षित छोड़ते हुए कहा कि खेती बाद में की जा सकती है, लेकिन जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती।
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Four Peahen Eggs Stop a Tracto
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
किसान के लिए खेत केवल मिट्टी का एक टुकड़ा नहीं होता। उसमें उसकी मेहनत, उम्मीद और परिवार का भविष्य जुड़ा होता है। लेकिन जब उसी खेत में किसी दूसरे जीव का जीवन संकट में दिखाई दे, तब अपनी जरूरतों से पहले उस जीवन को महत्व देना संवेदना की पहचान बन जाता है। किरावली क्षेत्र के भवनपुरा गांव में किसान राजवीर ने ऐसा ही फैसला लेकर इंसानियत और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की मिसाल पेश की है।
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खेती से पहले चार जिंदगियों की चिंता
किरावली क्षेत्र के गांव नगला टोडू निवासी राजवीर पुत्र धनीराम ने भवनपुरा निवासी गिरधारी लाल उपाध्याय का करीब दो बीघा खेत लीज (वेज) पर लेकर भिंडी की खेती की थी। फसल निकलने के बाद वह अगली फसल की तैयारी के लिए खेत की जुताई कर रहे थे। इसी दौरान उनकी नजर बार-बार उड़ रही एक मोरनी पर पड़ी। उन्होंने ट्रैक्टर रोककर देखा तो वहां मोरनी के चार अंडे मिले। राजवीर ने जुताई तुरंत रोक दी। अंडों को वहां से हटाने के बजाय उसी स्थान पर खेत में सुरक्षित रहने दिया और ट्रैक्टर लेकर घर लौट गए। खास बात यह है कि खेत उनकी अपनी जमीन नहीं, बल्कि लीज (वेज) पर लिया हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने खेती के काम से ज्यादा उन चार संभावित जिंदगियों की सुरक्षा को महत्व दिया।
किरावली क्षेत्र के गांव नगला टोडू निवासी राजवीर पुत्र धनीराम ने भवनपुरा निवासी गिरधारी लाल उपाध्याय का करीब दो बीघा खेत लीज (वेज) पर लेकर भिंडी की खेती की थी। फसल निकलने के बाद वह अगली फसल की तैयारी के लिए खेत की जुताई कर रहे थे। इसी दौरान उनकी नजर बार-बार उड़ रही एक मोरनी पर पड़ी। उन्होंने ट्रैक्टर रोककर देखा तो वहां मोरनी के चार अंडे मिले। राजवीर ने जुताई तुरंत रोक दी। अंडों को वहां से हटाने के बजाय उसी स्थान पर खेत में सुरक्षित रहने दिया और ट्रैक्टर लेकर घर लौट गए। खास बात यह है कि खेत उनकी अपनी जमीन नहीं, बल्कि लीज (वेज) पर लिया हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने खेती के काम से ज्यादा उन चार संभावित जिंदगियों की सुरक्षा को महत्व दिया।
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चार अंडे नहीं, चार संभावित जिंदगियां देखीं- खेती से पहले प्रकृति को चुना
खेती का काम कुछ समय बाद भी किया जा सकता है, लेकिन नष्ट हुए जीवन को वापस नहीं लाया जा सकता। शायद इसी सोच ने राजवीर को अपना काम रोकने का फैसला करने की प्रेरणा दी। खेत में पड़े वे चार अंडे उनके लिए महज अंडे नहीं, बल्कि प्रकृति की उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसका परिणाम कुछ दिनों बाद चार नन्हे जीवन के रूप में सामने आना है।
खेती का काम कुछ समय बाद भी किया जा सकता है, लेकिन नष्ट हुए जीवन को वापस नहीं लाया जा सकता। शायद इसी सोच ने राजवीर को अपना काम रोकने का फैसला करने की प्रेरणा दी। खेत में पड़े वे चार अंडे उनके लिए महज अंडे नहीं, बल्कि प्रकृति की उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जिसका परिणाम कुछ दिनों बाद चार नन्हे जीवन के रूप में सामने आना है।
ग्रामीण बोले- संवेदना से ही प्रकृति का संरक्षण संभव
किसान-मजदूर नेता चौधरी दिलीप सिंह, गंगाराम माहौर और देवेंद्र इंदौलिया सहित ग्रामीणों ने राजवीर के इस फैसले की सराहना की है। उनका कहना है कि प्रकृति संरक्षण के लिए हमेशा बड़े अभियान चलाने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी खेत में चल रहे ट्रैक्टर को रोक देना भी संरक्षण की बड़ी पहल बन जाता है।
किसान-मजदूर नेता चौधरी दिलीप सिंह, गंगाराम माहौर और देवेंद्र इंदौलिया सहित ग्रामीणों ने राजवीर के इस फैसले की सराहना की है। उनका कहना है कि प्रकृति संरक्षण के लिए हमेशा बड़े अभियान चलाने की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी खेत में चल रहे ट्रैक्टर को रोक देना भी संरक्षण की बड़ी पहल बन जाता है।
27 से 30 दिन तक अंडों की रखवाली, बच्चे निकलने के बाद भी जारी रहती है मोरनी की जिम्मेदारी
पशु चिकित्साधिकारी के अनुसार मोरनी 27 से 30 दिन तक अंडों को सेती है। इस दौरान वह बहुत सतर्क रहती है। शिकारियों (जैसे सियार, नेवला या बाज) से अंडों को बचाने के लिए वह झाड़ियों या सुरक्षित छिपे हुए स्थानों पर घोंसला बनाती है। वह सावधानी से उनकी रक्षा करती है। बच्चे निकलने के बाद भी वह लंबे समय तक उनकी देखभाल करती है और उन्हें प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रहना सिखाती है।
पशु चिकित्साधिकारी के अनुसार मोरनी 27 से 30 दिन तक अंडों को सेती है। इस दौरान वह बहुत सतर्क रहती है। शिकारियों (जैसे सियार, नेवला या बाज) से अंडों को बचाने के लिए वह झाड़ियों या सुरक्षित छिपे हुए स्थानों पर घोंसला बनाती है। वह सावधानी से उनकी रक्षा करती है। बच्चे निकलने के बाद भी वह लंबे समय तक उनकी देखभाल करती है और उन्हें प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रहना सिखाती है।
न कोई अभियान, न कोई नारा, प्रकृति के लिए ट्रैक्टर रोककर बदली अपनी राह
राजवीर ने कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया और न ही प्रकृति संरक्षण का कोई नारा दिया। उन्होंने बस अपने ट्रैक्टर को रोक दिया। लेकिन उनका यह छोटा-सा फैसला बहुत कुछ कह गया। लीज (वेज) पर ली गई जमीन पर खेती करने वाले किसान ने अपनी फसल की तैयारी कुछ समय के लिए रोककर यह साबित किया कि किसान का प्रकृति से रिश्ता केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं है। वह खेत में जीवन पैदा करना जानता है और जरूरत पड़ने पर किसी दूसरे जीवन को बचाने के लिए अपनी राह रोकना भी।
राजवीर ने कोई बड़ा अभियान नहीं चलाया और न ही प्रकृति संरक्षण का कोई नारा दिया। उन्होंने बस अपने ट्रैक्टर को रोक दिया। लेकिन उनका यह छोटा-सा फैसला बहुत कुछ कह गया। लीज (वेज) पर ली गई जमीन पर खेती करने वाले किसान ने अपनी फसल की तैयारी कुछ समय के लिए रोककर यह साबित किया कि किसान का प्रकृति से रिश्ता केवल फसल उगाने तक सीमित नहीं है। वह खेत में जीवन पैदा करना जानता है और जरूरत पड़ने पर किसी दूसरे जीवन को बचाने के लिए अपनी राह रोकना भी।