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हिंदी हैं हम: बाल साहित्य में योगदान ने नाम दिया ‘बच्चों के गांधी’, स्कूलों में आज पढ़ाई जाती हैं रचनाएं
Wed, 18 Aug 2021 10:57 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Wed, 18 Aug 2021 10:57 AM IST
सार
उनकी कई पुस्तकों और लेखों का देश की केंद्र व राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के दौरान इस्तेमाल भी किया। गुंजन नामक उनकी संस्था के बैनर तले तमाम कार्यक्रम भी हुए। वे चाहते थे कि चार से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए ऐसा साहित्य लिखा जाए, जो उनमें संस्कार पैदा करे।
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द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो..., सूरज निकला चिड़िया बोलीं, कलियों ने भी आंखें खोलीं..., सामने पहाड़ हो, सिंह की दहाड़ हो...। आपके बचपन की यादों को ताजा कर देने वाली ये कविताएं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कलम से निकली हैं। बाल साहित्य में योगदान ने उनको ‘बच्चों के गांधी’ उपनाम दे दिया। आगरा के रोहता में जन्मे हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की कविताएं आज भी स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं।
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वह बच्चों के लिए कवि सम्मेलन की शुरुआत करने वालों में से हैं। वह उत्तर प्रदेश के शिक्षा सचिव भी रहे। माहेश्वरी का हिंदी के प्रचार-प्रसार में बड़ा योगदान है। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला पर उन्होंने वृत्तचित्र बनाया था। केंद्रीय हिंदी संस्थान को वह तीर्थस्थल बताते और मानते थे। उन्होंने 40 से अधिक पुस्तकें लिखीं, इनमें से करीब 26 बाल साहित्य पर हैं। उनकी कई पुस्तकों और लेखों का देश की केंद्र व राज्य सरकारों ने राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के दौरान इस्तेमाल भी किया। गुंजन नामक उनकी संस्था के बैनर तले तमाम कार्यक्रम भी हुए। वे चाहते थे कि चार से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए ऐसा साहित्य लिखा जाए, जो उनमें संस्कार पैदा करे।
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द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी के बेटे विनोद माहेश्वरी बाएं से दाएं
- फोटो : अमर उजाला
पहला बाल गीत संग्रह ‘कातो और गाओ’
स्वतंत्रता के बाद उनका पहला बालगीत संग्रह ‘कातो और गाओ’ वर्ष 1949 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘लहरें बढ़े चलो, बुद्धि बड़ी या बल, प्यारे गुब्बारे, सूरज सा चमकूं मैं, सोने की कुल्हाड़ी, अंजन खंजन, सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ते हैं हम, सतरंगा फूल, अपने काम से काम, जल्दी सोना-जल्दी जागना, मेरा वंदन है, ना मौसी ना, चरखे और चूहे, बाल रामायण’ जैसी अनेकों कृतियों ने उन्हें बाल साहित्य के शिखर पर पहुंचा दिया। एक प्रसंग से उनके योगदान को और भलीभांति समझा जा सकता है...बाल साहित्य के महारथी कृष्ण विनायक फड़के ने अंतिम इच्छा के रूप में अपनी शवयात्रा में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का बालगीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ गाए जाने की इच्छा जताई थी।
रोहता में हुआ था जन्म
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म एक दिसंबर, 1916 को गांव रोहता में हुआ था। आगरा में ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा विभाग में तमाम शहरों में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1978 में सेवानिवृत्त होने के बाद गांव वापस आ गए। वर्ष 1981 में आलोक नगर में आकर बस गए। उनके लेखन विद्यार्थी जीवन से ही शुरू हो गया था लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद और अधिक साहित्य सृजन किया। बाल साहित्य पर आधारित उन्होंने 26 पुस्तकें लिखीं। उनके लिखे साहित्य को स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल किया गया।
स्वतंत्रता के बाद उनका पहला बालगीत संग्रह ‘कातो और गाओ’ वर्ष 1949 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘लहरें बढ़े चलो, बुद्धि बड़ी या बल, प्यारे गुब्बारे, सूरज सा चमकूं मैं, सोने की कुल्हाड़ी, अंजन खंजन, सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ते हैं हम, सतरंगा फूल, अपने काम से काम, जल्दी सोना-जल्दी जागना, मेरा वंदन है, ना मौसी ना, चरखे और चूहे, बाल रामायण’ जैसी अनेकों कृतियों ने उन्हें बाल साहित्य के शिखर पर पहुंचा दिया। एक प्रसंग से उनके योगदान को और भलीभांति समझा जा सकता है...बाल साहित्य के महारथी कृष्ण विनायक फड़के ने अंतिम इच्छा के रूप में अपनी शवयात्रा में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का बालगीत ‘हम सब सुमन एक उपवन के’ गाए जाने की इच्छा जताई थी।
रोहता में हुआ था जन्म
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म एक दिसंबर, 1916 को गांव रोहता में हुआ था। आगरा में ही उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा विभाग में तमाम शहरों में अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1978 में सेवानिवृत्त होने के बाद गांव वापस आ गए। वर्ष 1981 में आलोक नगर में आकर बस गए। उनके लेखन विद्यार्थी जीवन से ही शुरू हो गया था लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद और अधिक साहित्य सृजन किया। बाल साहित्य पर आधारित उन्होंने 26 पुस्तकें लिखीं। उनके लिखे साहित्य को स्कूलों की पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल किया गया।
निधन से दो घंटे पहले पूरी की आत्मकथा
माहेश्वरी जी ने निधन से दो घंटे पहले अपनी आत्मकथा ‘सीधी राह चलता रहा’ पूरी की। 29 अगस्त, 1998 को वह चिरनिद्रा में लीन हो गए। उनके पुत्र डॉ. विनोद माहेश्वरी ने संपादन कर आत्मकथा को पूरा किया।
बहुत प्रिय थे उन्हें बच्चे
पिताजी एक युग पुरुष थे। उनका बाल साहित्य सदियों तक दोहराया जाएगा। वह बच्चों के गांधी थे। बच्चे उनको बहुत प्रिय थे। बच्चे उनसे मिलने के लिए घर भी आते थे। पिताजी उन्हें अपनी कविताएं सुनाते। बरसों तक यह सिलसिला चला। - डॉ. विनोद माहेश्वरी, पुत्र
माहेश्वरी जी ने निधन से दो घंटे पहले अपनी आत्मकथा ‘सीधी राह चलता रहा’ पूरी की। 29 अगस्त, 1998 को वह चिरनिद्रा में लीन हो गए। उनके पुत्र डॉ. विनोद माहेश्वरी ने संपादन कर आत्मकथा को पूरा किया।
बहुत प्रिय थे उन्हें बच्चे
पिताजी एक युग पुरुष थे। उनका बाल साहित्य सदियों तक दोहराया जाएगा। वह बच्चों के गांधी थे। बच्चे उनको बहुत प्रिय थे। बच्चे उनसे मिलने के लिए घर भी आते थे। पिताजी उन्हें अपनी कविताएं सुनाते। बरसों तक यह सिलसिला चला। - डॉ. विनोद माहेश्वरी, पुत्र