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ब्रज में इस तरह मनेगी ईको फ्रेंडली दिवाली, खास है ये गणेश-लक्ष्मी की मूतियां
Fri, 25 Oct 2019 10:36 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Fri, 25 Oct 2019 10:36 AM IST
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गाय के गोबर से बनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां
- फोटो : अमर उजाला
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गाय के गोबर से बनाई जा रहीं लक्ष्मी, गणेश की प्रतिमाओं से पर्यावरण स्वच्छता का संदेश दे रही हैं। दिवाली के लिए बनाई गई लक्ष्मी-गणेश की यह मूर्तियां बाजार में मौजूद हैं। रामपुर में बनाई गई यह मूर्तियां मथुरा की पसंद बनकर उभर रही हैं। इनकी खरीद ऑनलाइन डिमांड पर हो रही है।
पर्यावरण प्रदूषण को लेकर मच रहे हो हल्ले के बीच इस बार गोबर से बनी ईको फ्रेडली लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां बाजार में आई हैं। इन्हें गाय के गोबर से बनाया जा रहा है। इसमें रसायन का कतई प्रयोग नहीं किया गया हैं।
मथुरा के दुकानदार कृष्ण कुमार शर्मा ने बताया रामपुर के गो अनुसंधान केंद्र से यह मूर्तियां ऑन डिमांड मंगाई जा रही हैं। दीवाली पर लोग गोबर से बने लक्ष्मी-गणेश को पसंद कर रहे हैं। अभी यह मूर्तिंयां ऑनलाइन मंगाई जा रहीं हैं। इसकी कीमत 51 रुपये से शुरू है।
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पर्यावरण प्रदूषण को लेकर मच रहे हो हल्ले के बीच इस बार गोबर से बनी ईको फ्रेडली लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां बाजार में आई हैं। इन्हें गाय के गोबर से बनाया जा रहा है। इसमें रसायन का कतई प्रयोग नहीं किया गया हैं।
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मथुरा के दुकानदार कृष्ण कुमार शर्मा ने बताया रामपुर के गो अनुसंधान केंद्र से यह मूर्तियां ऑन डिमांड मंगाई जा रही हैं। दीवाली पर लोग गोबर से बने लक्ष्मी-गणेश को पसंद कर रहे हैं। अभी यह मूर्तिंयां ऑनलाइन मंगाई जा रहीं हैं। इसकी कीमत 51 रुपये से शुरू है।
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रंगों का नहीं होता प्रयोग
गाय के गोबर से बनने वाली मूर्तियों में रंगों का प्रयोग नहीं किया है। गोबर में कुछ चिकनी मिट्टी मिलाने के बाद इनका निर्माण किया जाता है। इसमें वार्निस का प्रयोग नहीं होता है। रंग का भी बहुत कम मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
इन मूर्तियों को लोग अपने पौधों की जड़ों में डालकर खाद का प्रयोग कर सकते हैं। जबकि आम तौर पर मूर्तियां मिट्टी और पीओपी से बनती हैं। जिन्हें नदी, तालाब में छोड़ने पर प्रदूषण बढ़ता है।
प्रकाश पर्व दिवाली को लेकर कुंभकारों द्वारा मिट्टी के तैयार किए गए दीपक एवं गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति बाजार में आ चुकी है। इन्हें बिक्री के लिए सड़कों पर सजा दिया गया है। राजेश, कन्हैया ने बताया कि पूर्व में दिवाली में मिट्टी के दीये की मांग रहती है। विनोद ने बताया कि पीढ़ी दर पीढ़ी मूर्ति बनाते हैं।
गाय के गोबर से बनने वाली मूर्तियों में रंगों का प्रयोग नहीं किया है। गोबर में कुछ चिकनी मिट्टी मिलाने के बाद इनका निर्माण किया जाता है। इसमें वार्निस का प्रयोग नहीं होता है। रंग का भी बहुत कम मात्रा में प्रयोग किया जाता है।
इन मूर्तियों को लोग अपने पौधों की जड़ों में डालकर खाद का प्रयोग कर सकते हैं। जबकि आम तौर पर मूर्तियां मिट्टी और पीओपी से बनती हैं। जिन्हें नदी, तालाब में छोड़ने पर प्रदूषण बढ़ता है।
प्रकाश पर्व दिवाली को लेकर कुंभकारों द्वारा मिट्टी के तैयार किए गए दीपक एवं गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति बाजार में आ चुकी है। इन्हें बिक्री के लिए सड़कों पर सजा दिया गया है। राजेश, कन्हैया ने बताया कि पूर्व में दिवाली में मिट्टी के दीये की मांग रहती है। विनोद ने बताया कि पीढ़ी दर पीढ़ी मूर्ति बनाते हैं।