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मन ही है सुख और दुख के लिए जिम्मेदार, चिंतन से करें शुद्ध: दलाई लामा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला मैनपुरी
Updated Tue, 04 Dec 2018 06:49 PM IST
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बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा
- फोटो : अमर उजाला
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मैनपुरी के जसराजपुर में तीन दिवसीय धम्म प्रवचन के लिए आए तिब्ब्ती बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने मन को ही सुख और दुख के लिए जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि मन के कर्म प्रभावी होते हैं, जो चिरकाल तक हमें लाभ पहुंचाते हैं। उन्होंने मौजूद लोगों से चिंतन कर अपने मन को शुद्ध करने की अपील की।
उन्होंने कहा कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं, पहला जो हम तन से करते हैं, दूसरे जो हम वचन से करते हैं, तीसरे जो कर्म मन से किए जाते हैं। इन सभी में से मन से किया गया कर्म का प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी होता है। वह केवल इस जन्म में ही नहीं, बल्कि अगले जन्म में भी फल देते हैं।
उन्होंने कहा कि बाकी सब कर्म केले के पौधे के समान हैं। वे केवल एक बार फल देते हैं, लेकिन मन के कर्म बार-बार फलते रहते हैं। अगर हम अपने मन में क्रोध व ईर्ष्या रखेंगे तो मन के कर्म खराब होंगे। इससे दूसरे लोगों को तो नुकसान होगा ही, बल्कि खुद को भी होगा। इसलिए ईर्ष्या, बैर व द्वेष को अपने मन से निकालकर अपने मन को शुद्ध करें।
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उन्होंने कहा कि हमारे मन में प्रेम और क्रोध दोनों का वास होता है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम प्रेम से अपने क्रोध पर विजय प्राप्त करते हैं या फिर क्रोध के वशीभूत होकर प्रेम को मरने देते हैं।
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उन्होंने कहा कि कर्म तीन प्रकार के होते हैं, पहला जो हम तन से करते हैं, दूसरे जो हम वचन से करते हैं, तीसरे जो कर्म मन से किए जाते हैं। इन सभी में से मन से किया गया कर्म का प्रभाव सबसे अधिक प्रभावी होता है। वह केवल इस जन्म में ही नहीं, बल्कि अगले जन्म में भी फल देते हैं।
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उन्होंने कहा कि बाकी सब कर्म केले के पौधे के समान हैं। वे केवल एक बार फल देते हैं, लेकिन मन के कर्म बार-बार फलते रहते हैं। अगर हम अपने मन में क्रोध व ईर्ष्या रखेंगे तो मन के कर्म खराब होंगे। इससे दूसरे लोगों को तो नुकसान होगा ही, बल्कि खुद को भी होगा। इसलिए ईर्ष्या, बैर व द्वेष को अपने मन से निकालकर अपने मन को शुद्ध करें।
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उन्होंने कहा कि हमारे मन में प्रेम और क्रोध दोनों का वास होता है। ये हम पर निर्भर करता है कि हम प्रेम से अपने क्रोध पर विजय प्राप्त करते हैं या फिर क्रोध के वशीभूत होकर प्रेम को मरने देते हैं।
ज्ञान से करें मन का शोधन
धम्म प्रवचन सुनते विदेशी अनुयायी
- फोटो : अमर उजाला
मन के शोधन के लिए दलाई लामा ने ज्ञान को सबसे उपयुक्त बताया। उन्होंने कहा कि हमें चिंतन से ज्ञान अर्जित कर उससे मन को शुद्ध करना चाहिए। मन ही सब कर्मों का स्वामी है। इसलिए मन की शुद्धता सबसे जरूरी है। नालंदा परंपरा के अनुसार ज्ञान के उपयोग से ही मन को शुद्ध किया जा सकता है। हमारा मन ही दूसरों को शत्रु मान लेता है, जबकि हम वास्तव में देखेंगे तो हमारी सोच से वह व्यक्ति बेहतर होगा।
जीवधारियों में श्रेष्ठ है मानव
अनगिनत जीवधारियों में मानव सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वह चिंतन कर सकता है। अगर हमें मानव का जन्म मिला है तो इसका उपयोग करना चाहिए। हम जैसे कर्म करेंगे, उसी के अनुसार हमें फल मिलेगा। अगर हम चिंतन करके अपने मन को शुद्ध कर लेंगे तो निश्चित रूप से हमें अगले जन्म में भी मानव होने का सुख प्राप्त होगा।
विज्ञान भी मानता है मन की शुद्धि को
दलाई लामा ने कहा कि इस बात को विज्ञान भी मानता है, जो भी मनोवैज्ञानिक हैं, वे केवल मन की शुद्धि पर ही कार्य करते हैं। इसलिए मन की शुद्धि को झुठलाया नहीं जा सकता है।
जीवधारियों में श्रेष्ठ है मानव
अनगिनत जीवधारियों में मानव सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि वह चिंतन कर सकता है। अगर हमें मानव का जन्म मिला है तो इसका उपयोग करना चाहिए। हम जैसे कर्म करेंगे, उसी के अनुसार हमें फल मिलेगा। अगर हम चिंतन करके अपने मन को शुद्ध कर लेंगे तो निश्चित रूप से हमें अगले जन्म में भी मानव होने का सुख प्राप्त होगा।
विज्ञान भी मानता है मन की शुद्धि को
दलाई लामा ने कहा कि इस बात को विज्ञान भी मानता है, जो भी मनोवैज्ञानिक हैं, वे केवल मन की शुद्धि पर ही कार्य करते हैं। इसलिए मन की शुद्धि को झुठलाया नहीं जा सकता है।