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कागजों में अस्पताल बंद, हो रहा भ्रूण लिंग परीक्षण
कागजों में अस्पताल बंद, हो रहा भ्रूण लिंग परीक्षण
Updated Sat, 15 Oct 2016 12:33 AM IST
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जालंधर में पेपर में लिपटी मिली नवजात बच्ची
- फोटो : अमर उजाला
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भ्रूण लिंग परीक्षण का सबसे चौंकाने वाला मामला यमुनापार के प्रिया हास्पिटल में शुक्रवार को सामने आया। इस अस्पताल का लाइसेंस पहले ही निरस्त किया जा चुका था। अल्ट्रासाउंड मशीनें भी सील कर दी गई थीं। लेकिन कार्रवाई सिर्फ कागजों में थी। डमी डेस्ट में साफ हो गया कि यहां सील बताई गई मशीनों से ही धड़ल्ले से भ्रूण लिंग परीक्षण किया जा रहा था। एजेंट ने आठ हजार रुपये लिए। डाक्टर ने अल्ट्रासाउंड किया। इसके बाद जैसे ही बोला, बेटी है, वैसे ही उसे महिला सहयोगी समेत दबोच लिया गया।
एक समाजसेवी संगठन की शिकायत पर डीएम ने विशेष जांच दल बनाया। संगठन से फोन नंबर लेकर टीम ने एजेंट से बात की। जांच की हामी भरते ही डमी मरीज साथ लेकर टीम अस्पताल पहुंची। एजेंट का इशारा पाते ही मरीज को अंदर ले जाया गया। जांच पूरी होते ही टीम ने छापा मार दिया।
अस्पताल में हड़कंप मच गया। डाक्टर के पर्चे, रजिस्टर खंगाले गए। एजेंट का मोबाइल समेत रिकार्ड जब्त किए गए हैं। एसीएम प्रथम रजनीश मिश्रा ने बताया कि डमी मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचे। यहां सील हुई मशीन से छेड़छाड़ कर अल्ट्रासाउंड किया जा रहा था। रिकार्ड जब्त कर, रिपोर्ट डीएम को दी है। पीसीपीएनडीटी एक्ट प्रभारी डा. वीरेंद्र भारती ने बताया कि डमी मरीज का अल्ट्रासाउंड कराते हुए पकड़ा गया है। इसका सेंटर निरस्त है, सील मशीन को कंप्यूटर से जोड़कर लिंग भ्रूण परीक्षण किया जा रहा था।
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कंप्यूटर से जोड़कर की जा रही जांच
लिंग जांच के लिए डाक्टर ने कारस्तानी दिखाई। सील हुई मशीन के की-बोर्ड से कंप्यूटर स्क्रीन को जोड़ा गया। सील करने वाले कपड़े को मशीन के पिछले हिस्से से फाड़ दिया गया। मरीज की जांच मशीन की स्क्रीन के बजाए कंप्यूटर पर दिखाई देती थी। जांच करीब 6-10 मिनट में होती और मौखिक ही जानकारी दी जाती।
ऐसे पकड़ा गया कन्याओं की जान का दुश्मन
सात माह की गर्भवती समेत दो महिलाएं भेजी गई। गर्भवती ने खुद को बहू बताया। दूसरी ने सास। दोनों ने समाजसेवी संगठन से नंबर लेकर एजेंट से फोन पर बात की। इसके बाद 8000 रुपये दिए। वह प्रिया हास्पिटल ले गया। डाक्टर ने गर्भवती से पूछा, जांच क्यों कराना चाहती हो? उसने कहा, पहले से दो बेटी हैं, गरीब हैं और बेटी नहीं चाहते। डाक्टर ने कहा, अच्छा ठीक है। अल्ट्रासाउंड कर दिया। इसके बाद धीरे से बोला, बेटी है। तभी टीम आ गई, उसे पकड़ लिया।
बेटियां ही नहीं, बेटों का भी खून
आगरा। हाल ही में लिंग भ्रूण परीक्षण का यह तीसरा मामला है। तीनों में पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि ज्यादातर मामलों में लिंग भ्रूण परीक्षण किया ही नहीं जा रहा। डाक्टर अल्ट्रासाउंड करता जरूर है लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करता कि भ्रूण लड़के का है या लड़की का। वह बगैर परीक्षण के ही रिपोर्ट देता है। सिर्फ लड़की बताता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि उसे मालूम है कि जो परिवार हजारों रुपये फूंक रहा है परीक्षण कराने पर, वह किसी भी सूरत में बेटी नहीं चाहता है। वह गर्भपात करा देता है। भ्रूण में बेटी हो या बेटा, उसका कत्ल हो जाता है। पहले लोग कोड में बेटा या बेटी बताते थे। अब सिर्फ बेटी ही बोलते हैं। बता दें, इससे पहले राजस्थान की पुलिस ने डा. अमित गुप्ता, नालबंद के सेंटर पर छापा मारा। यहां एजेंट के जरिए 30 हजार रुपये में भ्रूण लिंग जांच की गई थी। मामला कोर्ट में चल रहा है। इसके बाद सलीम मेमोरियल अस्पताल अलीमुद्दीन और शरबती बेगम को पकड़ा गया। अलीमुद्दीन ने भी यही बताया था कि वह बगैर परीक्षण के बेटी होने की रिपोर्ट देता था।
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एक समाजसेवी संगठन की शिकायत पर डीएम ने विशेष जांच दल बनाया। संगठन से फोन नंबर लेकर टीम ने एजेंट से बात की। जांच की हामी भरते ही डमी मरीज साथ लेकर टीम अस्पताल पहुंची। एजेंट का इशारा पाते ही मरीज को अंदर ले जाया गया। जांच पूरी होते ही टीम ने छापा मार दिया।
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अस्पताल में हड़कंप मच गया। डाक्टर के पर्चे, रजिस्टर खंगाले गए। एजेंट का मोबाइल समेत रिकार्ड जब्त किए गए हैं। एसीएम प्रथम रजनीश मिश्रा ने बताया कि डमी मरीज को लेकर अस्पताल पहुंचे। यहां सील हुई मशीन से छेड़छाड़ कर अल्ट्रासाउंड किया जा रहा था। रिकार्ड जब्त कर, रिपोर्ट डीएम को दी है। पीसीपीएनडीटी एक्ट प्रभारी डा. वीरेंद्र भारती ने बताया कि डमी मरीज का अल्ट्रासाउंड कराते हुए पकड़ा गया है। इसका सेंटर निरस्त है, सील मशीन को कंप्यूटर से जोड़कर लिंग भ्रूण परीक्षण किया जा रहा था।
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कंप्यूटर से जोड़कर की जा रही जांच
लिंग जांच के लिए डाक्टर ने कारस्तानी दिखाई। सील हुई मशीन के की-बोर्ड से कंप्यूटर स्क्रीन को जोड़ा गया। सील करने वाले कपड़े को मशीन के पिछले हिस्से से फाड़ दिया गया। मरीज की जांच मशीन की स्क्रीन के बजाए कंप्यूटर पर दिखाई देती थी। जांच करीब 6-10 मिनट में होती और मौखिक ही जानकारी दी जाती।
ऐसे पकड़ा गया कन्याओं की जान का दुश्मन
सात माह की गर्भवती समेत दो महिलाएं भेजी गई। गर्भवती ने खुद को बहू बताया। दूसरी ने सास। दोनों ने समाजसेवी संगठन से नंबर लेकर एजेंट से फोन पर बात की। इसके बाद 8000 रुपये दिए। वह प्रिया हास्पिटल ले गया। डाक्टर ने गर्भवती से पूछा, जांच क्यों कराना चाहती हो? उसने कहा, पहले से दो बेटी हैं, गरीब हैं और बेटी नहीं चाहते। डाक्टर ने कहा, अच्छा ठीक है। अल्ट्रासाउंड कर दिया। इसके बाद धीरे से बोला, बेटी है। तभी टीम आ गई, उसे पकड़ लिया।
बेटियां ही नहीं, बेटों का भी खून
आगरा। हाल ही में लिंग भ्रूण परीक्षण का यह तीसरा मामला है। तीनों में पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि ज्यादातर मामलों में लिंग भ्रूण परीक्षण किया ही नहीं जा रहा। डाक्टर अल्ट्रासाउंड करता जरूर है लेकिन यह जानने की कोशिश नहीं करता कि भ्रूण लड़के का है या लड़की का। वह बगैर परीक्षण के ही रिपोर्ट देता है। सिर्फ लड़की बताता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि उसे मालूम है कि जो परिवार हजारों रुपये फूंक रहा है परीक्षण कराने पर, वह किसी भी सूरत में बेटी नहीं चाहता है। वह गर्भपात करा देता है। भ्रूण में बेटी हो या बेटा, उसका कत्ल हो जाता है। पहले लोग कोड में बेटा या बेटी बताते थे। अब सिर्फ बेटी ही बोलते हैं। बता दें, इससे पहले राजस्थान की पुलिस ने डा. अमित गुप्ता, नालबंद के सेंटर पर छापा मारा। यहां एजेंट के जरिए 30 हजार रुपये में भ्रूण लिंग जांच की गई थी। मामला कोर्ट में चल रहा है। इसके बाद सलीम मेमोरियल अस्पताल अलीमुद्दीन और शरबती बेगम को पकड़ा गया। अलीमुद्दीन ने भी यही बताया था कि वह बगैर परीक्षण के बेटी होने की रिपोर्ट देता था।