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दूसरों के खांसने-छींकने से तनाव, संक्रमित होने की आशंका से बेचैनी
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आगरा। आसपास किसी ने खांसा या फिर छींक दिया। इससे संक्रमित होने की आशंका से वह तनाव में आ गए। यहां तक कि उपचार और काउंसिलिंग के बाद भी दिमागी सेहत नहीं सुधरी। मानसिक स्वास्थ्य संस्थान की ओपीडी में ऐसे पांच से आठ फीसदी मरीज आ रहे हैं।
मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के प्रमुख अधीक्षक डॉ. दिनेश राठौर ने बताया कि ओपीडी में औसतन रोजाना 180 से 200 मरीज रोज आ रहे हैं। इनमें से सप्ताह में 25 से 35 मरीज ऐसे हैं, जिनकी दूसरी लहर में कोरोना वायरस के कहर के चलते दिमागी सेहत बिगड़ी। इनमें से 12 से 15 मरीजों की मानसिक स्थिति उपचार के बाद भी सुधरी नहीं।
ये ऐसे मरीज हैं, जिन्होंने दूसरी लहर में अपनों को खोया है। यह किसी के खांसने, छींकने, बुखार आने और उससे संपर्क में आने भर से आशंकित रहते हैं। इनके मस्तिष्क में वही दृश्य उभरने लगते हैं, इससे बेचैनी, नींद कम आना, भूख कम लगने, हाथ-पैरों में कंपकपाहट होने लगती है, कभी-कभार तो वह रोने भी लगते हैं। चिकित्सकीय भाषा में ऐसे मरीजों को पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के शिकार कहा जाता है। इनकी दवा के साथ काउंसिलिंग भी की जा रही है।
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तीसरी लहर की खबरों से भी तनाव
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. केसी गुरनानी ने बताया कि अप्रैल-मई में कोरोना वायरस से अपनों को खो चुके लोगों के सामने तीसरी लहर की बातें आने भर से वह आशंकित हो रहे हैं। स्थिति यह है कि वह अखबार, सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर कोरोना की तीसरी लहर का समाचार आने भर से ही तनाव में आ रहे हैं। कई ऐसे मरीजों ने तो इनसे दूरी ही बना ली है।
केस एक:
दयालबाग रहने वाले 43 साल के युवक दूसरी लहर में परिचितों की मौत से तनाव में आ गए। स्थिति यह हो गई कि उसने दरवाजे, खिड़की बंद कर लिया, यहां तक कि खाली जगह को टेप से बंद कर दिया, जिससे कहीं हवा में वायरस न हो और कमरे में आकर से संक्रमित कर दे। अभी इलाज चल रहा है, चिकित्सक से हर बार ‘क्या तीसरी लहर आएगी, इससे भी ज्यादा खतरनाक होगी’, यह प्रश्न जरूर करता है।
केस दो:
आवास विकास कॉलोनी के 29 साल के युवक ने दूसरी लहर में अपने पिता, चाचा को खो दिया। इससे वह अवसाद में आ गया। इलाज और काउंसिलिंग से दिमागी सेहत में सुधार हो रहा है, लेकिन किसी के खांसने-छींकने से वह बेचैन हो जाता है और नहाने और कपड़े बदलने लगता है। यहां तक कि कहीं उसे कोरोना तो नहीं हो जाएगा, इससे भयभीत होकर बेचैन रहता है।
इन बातों का रखें ध्यान
- मरीज को अकेला न छोड़ें, उससे बातें करें।
- किसी आशंका की बात कहने पर गंभीरता से सुनें।
- मरीज को व्यस्त रखने की कोशिश करें।
- परिजन, मित्र उसकी काउंसिलिंग भी करते रहें।
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मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के प्रमुख अधीक्षक डॉ. दिनेश राठौर ने बताया कि ओपीडी में औसतन रोजाना 180 से 200 मरीज रोज आ रहे हैं। इनमें से सप्ताह में 25 से 35 मरीज ऐसे हैं, जिनकी दूसरी लहर में कोरोना वायरस के कहर के चलते दिमागी सेहत बिगड़ी। इनमें से 12 से 15 मरीजों की मानसिक स्थिति उपचार के बाद भी सुधरी नहीं।
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ये ऐसे मरीज हैं, जिन्होंने दूसरी लहर में अपनों को खोया है। यह किसी के खांसने, छींकने, बुखार आने और उससे संपर्क में आने भर से आशंकित रहते हैं। इनके मस्तिष्क में वही दृश्य उभरने लगते हैं, इससे बेचैनी, नींद कम आना, भूख कम लगने, हाथ-पैरों में कंपकपाहट होने लगती है, कभी-कभार तो वह रोने भी लगते हैं। चिकित्सकीय भाषा में ऐसे मरीजों को पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर के शिकार कहा जाता है। इनकी दवा के साथ काउंसिलिंग भी की जा रही है।
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तीसरी लहर की खबरों से भी तनाव
वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. केसी गुरनानी ने बताया कि अप्रैल-मई में कोरोना वायरस से अपनों को खो चुके लोगों के सामने तीसरी लहर की बातें आने भर से वह आशंकित हो रहे हैं। स्थिति यह है कि वह अखबार, सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर कोरोना की तीसरी लहर का समाचार आने भर से ही तनाव में आ रहे हैं। कई ऐसे मरीजों ने तो इनसे दूरी ही बना ली है।
केस एक:
दयालबाग रहने वाले 43 साल के युवक दूसरी लहर में परिचितों की मौत से तनाव में आ गए। स्थिति यह हो गई कि उसने दरवाजे, खिड़की बंद कर लिया, यहां तक कि खाली जगह को टेप से बंद कर दिया, जिससे कहीं हवा में वायरस न हो और कमरे में आकर से संक्रमित कर दे। अभी इलाज चल रहा है, चिकित्सक से हर बार ‘क्या तीसरी लहर आएगी, इससे भी ज्यादा खतरनाक होगी’, यह प्रश्न जरूर करता है।
केस दो:
आवास विकास कॉलोनी के 29 साल के युवक ने दूसरी लहर में अपने पिता, चाचा को खो दिया। इससे वह अवसाद में आ गया। इलाज और काउंसिलिंग से दिमागी सेहत में सुधार हो रहा है, लेकिन किसी के खांसने-छींकने से वह बेचैन हो जाता है और नहाने और कपड़े बदलने लगता है। यहां तक कि कहीं उसे कोरोना तो नहीं हो जाएगा, इससे भयभीत होकर बेचैन रहता है।
इन बातों का रखें ध्यान
- मरीज को अकेला न छोड़ें, उससे बातें करें।
- किसी आशंका की बात कहने पर गंभीरता से सुनें।
- मरीज को व्यस्त रखने की कोशिश करें।
- परिजन, मित्र उसकी काउंसिलिंग भी करते रहें।