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पितृ पक्ष पर विशेष- सोरोंजी में श्राद्ध करने से जल, थल, नभ से मिलती है मुक्ति

Thu, 08 Sep 2022 11:48 PM IST
Agra Bureau आगरा ब्यूरो
Updated Thu, 08 Sep 2022 11:48 PM IST
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By performing Shradh in Soronji, one gets freedom from water, land, nabha
कासगंज। शनिवार से पितृपक्ष शुरू हो रहा है। पितृपक्ष में परिजन अपने पितरों की आत्मशांति के लिए तर्पण और श्राद्ध करते हैं। पितरों के मोक्ष की कामना के लिए तर्पण और श्राद्ध किया जाता है। तीर्थनगरी सोरोंजी के हरि की पौड़ी घाट पर तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व है। यहां तर्पण करने से पितरों का विशेष आशीर्वाद संतान और परिवार को मिलता है। श्राद्ध करने के पश्चात श्रीहरि विष्णु के मंदिर में विराजमान वराह रूप में दर्शन के उपरांत श्राद्ध कर्म पूर्ण माना जाता है।
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सोरोंजी में श्राद्ध करने से जल, थल, नभ से पितरों को मुक्ति मिलती है। शास्त्रों में सूकरक्षेत्र में श्राद्ध करने का सर्वाधिक महत्व वर्णित किया है। भगवान वराह का स्थान होने के कारण इससे श्रेष्ठ कोई और स्थान नहीं है।
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- स्वयं भगवान वराह ने यहां महात्म्य के बारे में कहा है कि हे देवि जो व्यक्ति मेरे प्रिय सूकरक्षेत्र में जाते हैं उनके पूर्ववर्ती 10 पूर्वज तथा 15 परवर्ती वंशजों की सद्गति सुनिश्चित हो जाती है इसके अतिरिक्त तीर्थयात्रा करने वाले व्यक्ति अगले सात जन्म तक उच्च कुल में जन्म लेता है। डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित, ज्योतिषाचार्य
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- सूकर क्षेत्र हरि की पौड़ी में मनुष्य जितनी अस्थियां विसर्जित करते हैं , उतने सहस्त्र वर्ष पर्यंत उनके पूर्वज मेरे लोक में सुख भोगकर पृथ्वी पर राज करते हैं वराह पुराण के मुताबिक यह पूर्वजों के मोक्ष का श्रेष्ठ धाम है यहां किया गया श्राद्ध कर्म सीधे पितरों को प्राप्त होता है। पंडित जगदीश महेरे, ज्योतिर्विद।
- यहां पिंडदान कर्म तर्पण और दान कर्म पितरों की संतुष्टि का साधन बनता है। यह पावन क्षेत्र है यहां उपवास करने रात्रि जागरण करने और पितरों के श्राद्ध से महापुण्य प्राप्त होता है- पंडित शशिधर द्विवेदी।

- यह क्षेत्र पृथ्वी का आदि क्षेत्र है यह वराह गंगा वृहद गंगा और भागीरथी गंगा के पवित्र अंचल में स्थित है। इस तीर्थस्थल को देखने यहां की रज को स्पर्श करने और दान आदि से पितर ही नहीं व्यक्ति स्वयं भी मोक्ष प्राप्त करता है। भगवान वराह का यह अति प्रिय क्षेत्र है इसी के चलते यहां उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। पंडित प्रद्युम्न निर्भय, अनुष्ठान विशेषज्ञ
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