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भाजपाइयों की चुप्पी से ‘डर्टी डील’ की चर्चाएं जोरोें पर
ब्यूरो, अमर उजाला आगरा
Updated Fri, 19 Feb 2016 02:14 AM IST
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अपराध के कई मामलों में सपा सरकार को घेरने वाली भाजपा अपने ही एमएलसी प्रत्याशी के अपहरण के मामले में चुप हो गई है। विरोध-प्रदर्शन तो दूर इस मामले में पार्टी का प्रतिनिधिमंडल वरिष्ठ अधिकारियों तक से नहीं मिला है। इससे इस ‘राजनीतिक अपहरण’ में प्रत्याशी के साथ-साथ संगठन के भी कुछ पदाधिकारियों पर सपा से सांठगांठ की चर्चाएं जोर पकड़ने लगी हैं।
बता दें कि आगरा-फीरोजाबाद सीट पर एमएलसी के लिए भाजपा प्रत्याशी टीपी सिंह अपना नामांकन दाखिल नहीं कर पाए थे। उनका कहना है कि उनका अपहरण कर लिया गया था। भाजपाइयों ने सपा पर आरोप लगाए थे।
मगर, अपहरण जैसा संगीन मामला पहले ही दिन ठंडा पड़ गया। अब तो पार्टी के अंदरखाने भी सपा से साठगांठ के सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। इससे टीपी सिंह की पैरवी करने वाले नेता शक के दायरे में आ गए हैं। कार्यकर्ता भी इस ‘राजनीतिक अपहरण’ में लाखों की ‘डर्टी डील’ मान रहे हैं।
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हालांकि इन आरोपों से बचने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से टीपी सिंह से पल्ला झाड़ने का पांसा फेंका जा चुका है। कार्यकर्ता वरिष्ठ नेताओं के इस बयान को उसी ‘डर्टी डील’ की कहानी का हिस्सा मान रहे हैं।
इनसेट
चुनाव लड़ने की रणनीति पर भी सवाल
पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रत्याशी न मिलने के बावजूद कुछ पदाधिकारियों ने एमएलसी का चुनाव लड़ने पर जोर दिया था। इसके पीछे ‘सेटिंग-गेटिंग’ की ही मंशा बताई जा रही है। इनका कहना है कि पार्टी को पता था कि उनके पास कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं है। ऐसे में चुनाव न लड़ने का फैसला उचित रहता। कम से कम पार्टी पर लग रहे बदनामी के दागों से बच जाते। भाजपा कार्यकर्ता बसपा के निर्णय को सही ठहराने पर तुल गए हैं। इससे पार्टी के अंदर गतिरोध बढ़ता जा रहा है।
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बता दें कि आगरा-फीरोजाबाद सीट पर एमएलसी के लिए भाजपा प्रत्याशी टीपी सिंह अपना नामांकन दाखिल नहीं कर पाए थे। उनका कहना है कि उनका अपहरण कर लिया गया था। भाजपाइयों ने सपा पर आरोप लगाए थे।
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मगर, अपहरण जैसा संगीन मामला पहले ही दिन ठंडा पड़ गया। अब तो पार्टी के अंदरखाने भी सपा से साठगांठ के सवाल खड़े किए जाने लगे हैं। इससे टीपी सिंह की पैरवी करने वाले नेता शक के दायरे में आ गए हैं। कार्यकर्ता भी इस ‘राजनीतिक अपहरण’ में लाखों की ‘डर्टी डील’ मान रहे हैं।
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हालांकि इन आरोपों से बचने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की तरफ से टीपी सिंह से पल्ला झाड़ने का पांसा फेंका जा चुका है। कार्यकर्ता वरिष्ठ नेताओं के इस बयान को उसी ‘डर्टी डील’ की कहानी का हिस्सा मान रहे हैं।
इनसेट
चुनाव लड़ने की रणनीति पर भी सवाल
पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रत्याशी न मिलने के बावजूद कुछ पदाधिकारियों ने एमएलसी का चुनाव लड़ने पर जोर दिया था। इसके पीछे ‘सेटिंग-गेटिंग’ की ही मंशा बताई जा रही है। इनका कहना है कि पार्टी को पता था कि उनके पास कोई मजबूत प्रत्याशी नहीं है। ऐसे में चुनाव न लड़ने का फैसला उचित रहता। कम से कम पार्टी पर लग रहे बदनामी के दागों से बच जाते। भाजपा कार्यकर्ता बसपा के निर्णय को सही ठहराने पर तुल गए हैं। इससे पार्टी के अंदर गतिरोध बढ़ता जा रहा है।