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समान पक्षी विहार पर बन रही डॉक्यूमेंट्री
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26एमएनपी-47-समान पक्षी विहार में मौजूद पक्षी।
- फोटो : MAINPURI
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मैनपुरी/किशनी। किशनी के समान पक्षी विहार को रामसर साइट में शामिल किए जाने से इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। अब देश विदेश के सैलानी यहां पहुंचने लगे हैं। बुधवार को दिल्ली से आई टीम ने यहां डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए शूटिंग की। यह फिल्म रामसर साइट के लिए तैयार की जा रही है।
बुधवार नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली से संजय शर्मा की टीम समान पक्षी विहार पहुंची। टीम ने करीब एक घंटे तक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए शूटिंग की। इसमें समान गांव व स्थानीय बच्चों को भी शामिल किया गया। साथ ही पक्षी विहार में तैनात वन दरोगा आदेश गुप्ता का इंटरव्यू भी लिया गया।
526 हेक्टेयर में फैली समान पक्षी विहार की झील प्रदेश की सबसे बड़ी झील है। संरक्षण के अभाव में अब तक ये गुमनामी के अंधेरों में थी। विदेशी पक्षियों के प्रवास से भी समान खूब गुलजार रहता है।
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यह है रामसर साइट
नम भूमि और जल पक्षियों के प्रवास स्थानों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर एक संधि हुई थी। ये संधि वर्ष 1971 में दो फरवरी को ईरान के शहर रामसर में आयोजित सम्मेलन में हुई थी। इसलिए इसे रामसर संधि का नाम दिया गया।
वहीं इस संधि के तहत चयनित होने वाले स्थलों को रामसर साइट कहा जाता है। हालांकि इस संधि के नियमों को 21 दिसंबर 1975 में प्रभावी किया गया। तब से प्रत्येक दो वर्ष में पूरे विश्व में रामसर संधि के तहत स्थानों को चिह्नित कर उनके संरक्षण की पहल की जाती है।
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बुधवार नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली से संजय शर्मा की टीम समान पक्षी विहार पहुंची। टीम ने करीब एक घंटे तक डॉक्यूमेंट्री फिल्म के लिए शूटिंग की। इसमें समान गांव व स्थानीय बच्चों को भी शामिल किया गया। साथ ही पक्षी विहार में तैनात वन दरोगा आदेश गुप्ता का इंटरव्यू भी लिया गया।
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526 हेक्टेयर में फैली समान पक्षी विहार की झील प्रदेश की सबसे बड़ी झील है। संरक्षण के अभाव में अब तक ये गुमनामी के अंधेरों में थी। विदेशी पक्षियों के प्रवास से भी समान खूब गुलजार रहता है।
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यह है रामसर साइट
नम भूमि और जल पक्षियों के प्रवास स्थानों के संरक्षण के लिए वैश्विक स्तर पर एक संधि हुई थी। ये संधि वर्ष 1971 में दो फरवरी को ईरान के शहर रामसर में आयोजित सम्मेलन में हुई थी। इसलिए इसे रामसर संधि का नाम दिया गया।
वहीं इस संधि के तहत चयनित होने वाले स्थलों को रामसर साइट कहा जाता है। हालांकि इस संधि के नियमों को 21 दिसंबर 1975 में प्रभावी किया गया। तब से प्रत्येक दो वर्ष में पूरे विश्व में रामसर संधि के तहत स्थानों को चिह्नित कर उनके संरक्षण की पहल की जाती है।