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अगस्त क्रांतिः सीने गोलियों से छलनी थे... फिर भी आगे बढ़ते गए आजादी के दीवाने

Sun, 11 Aug 2019 03:39 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 11 Aug 2019 03:39 PM IST
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August kranti 1942 Chamraula Railway Station Kand inside story of Martyrs
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिम्मनलाल जैन व रानी सरोज गौरिहार - फोटो : अमर उजाला
ताजनगरी में जंग ए आजादी की चिंगारी तो 1857 के गदर में ही भड़क गई थी। 1942 आते आते यह ज्वाला बन गई। अगस्त क्रांति में आजादी के दीवानों ने फिरंगियों को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया।
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कहीं बम फेंके तो कहीं स्टेशन फूंके। सीने गोलियों से छलनी हो गए, फिर भी कदम रुके नहीं। चमरौला की घटना ऐसी ही थी। गोलियां खाकर भी क्रांतिकारी स्टेशन तक पहुंच गए थे।
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रक्षा बंधन का त्योहार था, तारीख थी 21 अगस्त 1942। योजना थी चमरौला रेलवे स्टेशन को फूंकने की। इसका नेतृत्व किया महान क्रांतिकारी ठाकुर उल्फत सिंह चौहान ने। उनके नेतृत्व में 600-700 लोगों के दल ने चमरौला स्टेशन पर धावा बोला।
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पुलिस को पहले से खबर थी। मोर्चाबंदी की जा चुकी थी, पर आजादी के दीवाने कहां रुकने वाले थे, वे तो सिर पर कफन बांधकर निकले थे। उनके बढ़ते कदम देख पुलिस ने बगैर चेतावनी दिए सीधे बंदूकों का मुंह खोल दिया, दनादन गोलियां चलाईं।
 

एत्मादपुर के सोबरन सिंह, साहब सिंह, खौड़ा के खजान सिंह ने मातृभूमि की आजादी के लिए प्राणों की कुर्बानी दे दी। 31 क्रांतिकारी लहूलुहान हो गए लेकिन रुके नहीं, आगे बढ़ते गए।

इन्हें घेराबंदी कर गिरफ्तार किया गया। चमरौला में शहीदों की याद में हर बरस मेला लगाया जाता है। सभी शहीद और घायल 19-20 बरस के थे, शादी हो चुकी थी।

तुम अंग्रेजो के पिट्ठू हो... तुम्हारे हाथ का पानी नहीं पी सकता 
चमरौला में पुलिस की फायरिंग में क्रांतिकारी सीताराम गर्ग, किशनलाल, सोहनलाल गुप्ता, प्यारेलाल, डूमर सिंह, बाबूराम घायल हो गए। इन्हें साथियों ने रूपधनू गांव पहुंचाया। ठाकुर उल्फत सिंह चौहान मरणासन्न हालत में थे। तीन शहीदों के पार्थिव शरीरों के साथ उन्हें रेल इंजन में रखकर टूंडला पहुंचाया गया। 

उनका जज्बे की दास्तां आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। रास्ते में उल्फत सिंह को प्यास लगी, गला सूख रहा था, उन्होंने पानी मांगा। जब स्टेशन मास्टर पानी लेकर आया, तब उन्होंने पीने से इंकार कर दिया। बोले, तुम अंग्रेजों के पिट्ठू हो, मैं तुम्हारे हाथ से पानी नहीं पी सकता।

स्टेशन मास्टर चला गया। उल्फत को फिर से प्यास लगी, कई बार ऐसा हुआ, हर बार फिरंगी हुकूमत के मुलाजिम पानी लेकर पहुंचे।  उल्फत ने इंकार किया। स्टेशन के आउटर पर पहुंचते पहुंचते रणबांकुरे ने दम तोड़ दिया।

मुझे जिंदा जला दो, पर पुलिस के हाथ न पड़ने देना 
चमरौला कांड के घायलों में सोहनलाल गुप्ता को बड़ी वेदना हो रही थी। उन्हें जान की परवाह नहीं थी लेकिन इस बात की चिंता थी कि पार्थिव शरीर कहीं अंग्रेजों के हाथ न लग जाए। 

उन्होंने कहा, अगर मेरा जीवन बचाने में कोई कठिनाई हो तो मिट्टी का तेल डालकर आग लगा देना लेकिन काया पुलिस के हाथ न आने दें। उनकी चिकित्सा के लिए फिरोजाबाद से डॉक्टर प्यारेलाल गहलौत वेष बदलकर आते थे। सभी घायलों की जान बचाई गई, पहचान भी छिपी रही।
 
नोट- --- किताब समय चक्र आगरा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमदत्त पालीवाल ने इस घटना का वर्णन किया है। 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चिम्मन लाल जैन ने बताया कि 1942 में ताजनगरी में बड़ा जोश था, युवा, बच्चे, महिलाएं सभी जंग ए आजादी में शरीक थे। शहर से लेकर देहात तक कई ऐसी घटनाएं हुईं जिनसे फिरंगी हिल गए थे। क्रांतिकारियों ने फिरंगी अफसरों को भी निशाना बनाया, इंकम टैक्स ऑफिस, रेलवे स्टेशन फूंके गए।
 

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रानी सरोज गौरिहार ने बताया कि अगस्त क्रांति बहुत सुनियोजित तरीके से हुई थी। सभी की भूमिका अलग अलग थी। जो क्रांतिकारी जेलों में बंद थे, मैं उनसे मिलने के लिए जाती थी। आगरा में कुछ लोग प्रदर्शन करते थे, जुलूस निकालते थे, यह उनका जज्बा था, लेकिन क्रांतिकारी गोपनीयता का पूरा ख्याल रखते थे, उनकी योजनाएं गोपनीय होती थीं। इनका पता तभी लगता था जब वे इन्हें अंजाम देते थे।
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