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हिंदी हैं हम: 'हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं... हमारी मां भी है, शुरुआत से ही अपनाएं अपनी भाषा'

Thu, 12 Aug 2021 09:59 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Thu, 12 Aug 2021 09:59 AM IST
सार

हिंदी का क्षेत्र व्यापक है, लेकिन समय की मांग अंग्रेजी है। जब तक हिंदी भाषा को रोजगारपरक और परिवार के भरण-पोषण का जरिए नहीं बनाया जाएगा, तब तक युवा इस ओर आकर्षित नहीं होंगे। यह कहना है 'हिंदी हैं हम' के तहत आयोजित वेबिनार में वक्ताओं का।

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amar ujala held webinar over Hindi hain hum campaign
हिंदी हैं हम अभियान के तहत हुआ बेविनार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला के विशेष अभियान हिंदी हैं हम के तहत बुधवार को आगरा, मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा और कासगंज के हिंदी जानकार एक मंच पर आए। वेबिनार के जरिए हिंदी के व्यापक क्षेत्र और युवाओं की भागेदारी को लेकर चर्चा की। इसमें तमाम महत्वपूर्ण बिंदु सामने आए। 

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सरकार से मांग की गई है कि हिंदी के क्षेत्र में युवाओं को नौकरियां उपलब्ध कराएं तो हमारी मातृभाषा का मान और बढ़ेगा। सभी का एक स्वर में कहना था कि बचपन से हिंदी के शब्दों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। बच्चों को उनके आसपास की वस्तुओं के नामों की जानकारी हिंदी में भी दी जाए ताकि शुरुआती दौर से ही उन्हें हिंदी के महत्व के बारे में पता चल सके।
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हर भाषा का अपना प्रभाव
आगरा के कवि अशोक रावत ने कहा कि हिंदी का क्षेत्र बहुत विशाल है। हर भाषा का अपना अलग प्रभाव है। हिंदी भाषी राज्यों में युवाओं को अगर अपनी ही भाषा में रोजगार मिलने लगेगा तो इससे अच्छी बात और कुछ नहीं हो सकती। आज तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सिर्फ अंग्रेजी में ही काम हो रहा है। फिर भी हिंदी का गौरव बढ़ रहा है। 

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'सरकारों को आना होगा आगे'
आगरा की कवियत्री डॉ. शशि तिवारी ने कहा कि हिंदी सिर्फ एक भाषा नहीं, हमारी मां भी है। हिंदी का क्षेत्र बहुत व्यापक है। आवश्यकता सिर्फ इतनी सी है कि भाषा को रोजगार अथवा जीवनयापन से जोड़ दिया जाए। इसमें सरकार को ही आगे आना होगा। हिंदी के क्षेत्र में आज लोग काम कर रहे हैं लेकिन उनकी संख्या कम है। युवाओं को आगे आना होगा। 

'बच्चों को समझाएं भाषा का महत्व'
मथुरा के वृंदावन शोध संस्थान के डॉ. बृजभूषण चतुर्वेदी ने कहा कि छोटे बच्चों को हिंदी का महत्व समझाना होगा। हर बच्चे के पहले गुरु उसके माता-पिता होते हैं। हम जो अपने आसपास देख रहे हैं, उनके हिंदी शब्द बच्चों को बताएं ताकि युवा अवस्था तक आते-आते उनका हिंदी का ज्ञान अच्छा हो जाए। हिंदी के क्षेत्र में रोजगार की संख्या भी बढ़ानी होगी। 

'ठोस कार्य करने की आवश्यकता'
फिरोजाबाद निवासी पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. राम स्नेही लाल शर्मा ने कहा कि हिंदी तो प्राण है। तमाम लोग आज हिंदी के माध्यम से परिवार चला रहे हैं फिर भी उनकी संख्या बहुत कम है। इस दिशा में ठोस कार्य करने की आवश्यकता है। हिंदी भाषी राज्यों में अंग्रेजी में काम किया जा रहा है। समय रहते बदलाव करना होगा। 

'अंग्रेजी में काम कर रहे विभाग'
मैनपुरी की युवा लेखिका शिवालिनी ने कहा कि हिंदी हमारी मातृभाषा है लेकिन तमाम विभागों में आज भी अंग्रेजी में काम होता है। सिर्फ साल के 15 दिन हिंदी को याद कर, हम युवाओं तक उचित संदेश नहीं पहुंचा पाएंगे। हिंदी लेखकों, समीक्षकों को अगर लगातार रोजगार मिलता रहेगा तो हिंदी के क्षेत्र में नए लोग भी काम करने आएंगे। 

'शुरुआत से ही अपनाएं अपनी भाषा'
बच्चों को शुरुआत से ही हिंदी के शब्द सिखाने होंगे। युवाओं की पेशागत मजबूरियां हैं कि उन्हें अंग्रेजी में काम करना पड़ता है। फिर भी हमें हिंदी के महत्व को समझना होगा। हिंदी को हम जितना रोजगार से जोड़ेंगे, उतना ही युवाओं को हम इस भाषा के करीब ला सकते हैं। - अपूर्वा सिंह, युवा लेखिका (आगरा)

'हिंदी में काम मिलेगा तो आएंगे युवा' 
एटा के  पूर्व हिंदी प्राध्यापक डॉ. प्रेमीराम मिश्रा ने कहा कि हिंदी को जब तक रोजगारपरक नहीं बनाया जाएगा, तब तक युवा इस ओर आकर्षित नहीं होंगे। लगभग सभी सरकारी विभागों में हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। फिर भी हिंदी रोजगार के क्षेत्र में पिछड़ रही है। केंद्र और हिंदी भाषी प्रदेशों की सरकारें भी इस ओर ध्यान दें। 

'विशाल सागर है हिंदी साहित्य'
फिरोजाबाद के कवि कृष्ण कुमार कनक ने कहा कि युवाओं को अंग्रेजी में संदेश भेजना भाता है। इन संदेशों को अगर हिंदी में भेजा जाए तो समस्या क्या है। आज हिंदी के मान-सम्मान में लगातार ही इजाफा हो रहा है। तमाम लोग हिंदी में काम करके अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। हिंदी साहित्य विशाल सागर है। 

'इच्छानुसार होता है भाषा का चयन'
कासगंज के हिंदी प्राध्यापक राधा कृष्ण दीक्षित ने कहा कि हिंदी को जीवनयापन में सहायक बनाने की जरूरत है। हिंदी के बिना सब कुछ अधूरा है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हिंदी के अलावा हम अन्य भाषाओं की ओर ध्यान न दें। अन्य भाषाओं के साहित्य के हिंदी अनुवादों पर भी नजर दौड़ाएं। काफी जानकारी मिलेगी। 

'युवाओं के बीच लानी होगी सोच'
मैनपुरी के पूर्व प्रधानाचार्य डॉ. पदम सिंह पदम ने कहा कि हिंदी तो आमजन की भाषा है। युवाओं के बीच एक सोच लाने की आवश्यकता है कि हिंदी से भी रोजगार प्राप्त हो सकता है। तमाम लोग आज हिंदी के बढ़ावे के लिए काम कर रहे हैं। युवाओं को इस सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए कि हिंदी में काम करने से भी जीवनयापन हो सकता है।

'घुमक्कड़ी की तर्ज पर हों कार्यक्रम'
कासगंज के कवि डॉ. अजय अटल ने कहा कि युवाओं के बीच हिंदी भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए लगातार ही कार्यक्रमों के आयोजन होना चाहिए। घुमक्कड़ी की तर्ज पर अन्य राज्यों के युवाओं के साथ बातचीत से भी हिंदी बढ़ेगी। युवाओं का इसमें बड़ा योगदान हो सकता है। 

मंथन के  मोती
- हिंदी के क्षेत्र में उपलब्ध कराए जाने रोजगार के मौके।
- शुरुआती दौर में ही बच्चों को बताएं हिंदी के शब्द।
- स्कूल-कॉलेजों में साल भर हों हिंदी से जुड़े कार्यक्रम।
- हिंदी भाषा के जानकारों से साक्षात्कार करें युवा।
- भाषा के प्रति युवाओं को प्रेरित करें अभिभावक।
 
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