सावधान: घर के बाहर ही नहीं, स्कूल के अंदर भी 'जहरीली' है हवा, विश्वविद्यालय के शोध में हुआ खुलासा
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के शोधार्थी प्रदूषण पर शोध कर रहे हैं, जिसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आगरा के डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के शोधार्थी प्रोफेसर अजय तनेजा के निर्देशन में स्कूलों के अंदर के प्रदूषण पर शोध कार्य कर रहे हैं। शोध के दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से निर्धारित मानक की अपेक्षा स्कूलों में पीएम (पार्टिकुलेट मैटर)-2.5 का स्तर छह से 13 गुना और पीएम-10 का स्तर पांच से दस गुना अधिक पाया गया है।
प्रोफेसर अजय तनेजा ने बताया कि प्रोजेक्ट पर सितंबर 2021 से शोधार्थी स्तुति दुबे और रिनी जॉन ने काम शुरू किया। आठ स्कूलों को चिह्नित किया गया। इसमें सर्दी और गर्मी के मौसम के प्रदूषण के नमूने लिए गए। अभी मानसून और पोस्ट मानसून के नमूने लिए जाने बाकी हैं। शोध कार्य के लिए शहरी क्षेत्र के चार और शहर से लगे ग्रामीण क्षेत्रों के चार विद्यालयों में नमूने लिए गए।
इसमें रोड के किनारे स्थित स्कूल और आवासीय क्षेत्र में स्थित स्कूल भी शामिल थे। पीएम 1.0 का मानक अभी निर्धारित नहीं किया गया है। अधिक सूक्ष्म कण होने से व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए ये अधिक हानिकारक होते हैं। अधूरे दहन से निकलने वाला ब्लैक कार्बन भी स्कूलों के अंदर पाया गया है।
शहर से लगे ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों के अंदर वायु गुणवत्ता अधिक खराब
| स्कूल | पीएम-10 | पीएम-2.5 | पीएम-1.0 | ब्लैक कार्बन |
| ग्रामीण क्षेत्र के सड़क किनारे स्थित | 423.52 | 183.95 | 145.38 | 9.01 |
| ग्रामीण क्षेत्र के आवासीय क्षेत्र स्थित | 257.89 | 153.4 | 127.72 | 5.42 |
| शहर के सड़क किनारे स्थित | 346.69 | 163.64 | 132.86 | 6.63 |
| शहर के आवासीय क्षेत्र स्थित | 279.45 | 133.69 | 106.86 | 4.95 |
नोट : आंकड़े माइक्रोग्राम/प्रति क्यूबिक मीटर है।
अंदर का वायु प्रदूषण अधिक खतरनाक
अंदर का वायु प्रदूषण बाहरी परिवेश की अपेक्षा दो से तीन गुना अधिक खतरनाक है। लोग अपना 80 से 90 फीसदी समय घर, कार्यालय, स्कूल या अन्य परिसर के अंदर बिताते हैं।अस्थमा व कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं
शोध कार्य के निर्देशक प्रोफेसर अजय तनेजा ने बताया कि पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) में केमिकल (मेटल व ऑर्गेनिक्स) होते हैं। शरीर में पहुंचने के बाद नुकसान पहुंचाते हैं। अवधि के अनुरूप एलर्जी, थकान, सिरदर्द, नाक बहना, खांसी आने के साथ अस्थमा और कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है। बच्चों के सांस लेने का औसत करीब डेढ़ गुना अधिक होता है। उनको अधिक नुकसान पहुंच सकता है।
स्कूलों के अंदर प्रदूषण कम करने के उपाय
- स्कूल के कमरे हवादार होने चाहिए। यहां बच्चे अधिकतर समय बिताते हैं।
- स्कूल के आसपास हरियाली अधिक होनी चाहिए, जिससे धूल न आए।
- कक्षा की सफाई स्कूल खुलने के करीब एक घंटे पहले हो जानी चाहिए, जिससे धूल सतह पर बैठ पाए।
- स्कूल के बाहर पानी का छिड़काव कर सकते हैं।
- कक्षा में सीमित संख्या में विद्यार्थी बैठाने चाहिए।