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आगरा का सावन: 'कैप्टन पति शृंगार के लिए लाए थे तिरंगा बंदी, देशभक्ति से महक उठा था सावन'

Sun, 26 Jul 2020 12:02 AM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 26 Jul 2020 12:02 AM IST
सार

  • सरला भदौरिया ने बताया कि सावन से जुड़ी लोक परंपराएं टूटती जा रही हैं।

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Agra Ka Sawan Special Story in Hindi
सरला भदौरिया - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सरला भदौरिया ने 49 साल पहले रुदमुली गांव के कैप्टन निहाल सिंह के साथ सात फेरे लिए। उन्होंने बताया कि शादी के बाद पहले सावन में वो शृंगार के लिए तिरंगा बिंदी लाए थे। साड़ी बांधने को तिरंगा क्लिप भी दी थी। यही बिंदी लगाकर मायके पहुंची तो परिवार देशभक्ति से महक उठा। सावन में सहेलियों के संग बाग में झूला झूलते, गीत मल्हार गाते। 

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अब परंपराएं खत्म हो रही हैं। 

उन्होंने कहा कि ससुराल में भी यही माहौल मिला। परिवार की बहू-बेटी मिलकर गाती थीं। तालाब पर भुजरियां विसर्जन के लिए जाते थे। आकर बड़ों को भुजरियां बांधते थे। पूर्णिमा को सेंवईं बनती। मेहंदी की पत्ती तोड़कर सिल बटना से पीसते और मंगल गीतों के साथ हाथों पर रचाते। तब मेहंदी का रंग महीनों नहीं छूटता था। अब परंपराएं खत्म हो रही हैं।
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उपहारों से भर जाती थी झोली

मायके में सावन के उपहारों से झोली भर जाती थी। मां और बाबूजी साड़ी देते थे। भाई भी राखी का नेग देते थे। जब कभी मायके नहीं जा पाई तो सास-ससुर से उपहार में साड़ी मिलती थी। पति भी सावन में शृंगार का सामान जरूर लाते थे। सरहद पर होते तो दोस्तों के हाथ भिजवाते थे। 
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सूना-सूना सा लगता है सावन

सरला भदौरिया ने बताया कि सावन से जुड़ी लोक परंपराएं टूटती जा रही हैं। अब बाजार की मेहंदी रचाने और ब्यूटी पार्लर से लगवाने का चलन शुरू हो गया है। बागों में झूले और गीत मल्हार की महफिल भी नहीं जमती। भागदौड़ की जिंदगी में राखी का बंधन भी रस्म अदायगी मात्र रह गया है। भुजरियां बंधाने की परंपरा भी घर की देहरी तक सीमित हो गई है। बचपन के सावन का उल्लास अब सूनेपन में बदल गया है।

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