{"_id":"3-90175","slug":"Agra-90175-3","type":"story","status":"publish","title_hn":"रजिस्ट्रार पर पौने तीन लाख का जुर्माना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रजिस्ट्रार पर पौने तीन लाख का जुर्माना
Agra
Updated Wed, 19 Nov 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आगरा/लखनऊ। डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के पांच साल पहले तक के छात्रों को डिग्री और मार्कशीट न मिल पाने पर राज्य सूचना आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। विवि के जनसूचना अधिकारी और कुलसचिव प्रभात रंजन पर 11 मामलों में 2.75 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगाया। साथ ही 40 अन्य मामलों में 15 दिन के भीतर वादी को सही जवाब देने के निर्देश दिए। अगली सुनवाई 22 दिसंबर और 13 जनवरी को होगी।
राज्य सूचना आयुक्त गजेंद्र यादव ने 17 और 18 नवंबर को डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से संबंधित कुल 361 मामलों की सुनवाई की। इनमें 40 प्रकरण छात्रों को मार्कशीट या डिग्री उपलब्ध न कराने और इनमें खामी होने पर संशोधन न कर पाने से संबंधित हैं। बाकी महाविद्यालयों की संबद्धता, स्ववित्त पोषित कॉलेजों में शिक्षकों का अनुमोदन, अंकपत्र सत्यापन, गोल्ड मेडल और शोध संबंधी मामले हैं। एक मामले में कार्यालय अधीक्षक (गोपनीय) पीके अग्रवाल पर 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया है। 34 मामले निस्तारित किए गए और बाकी मामलों में 22 व 23 अप्रैल की तारीख दी गई है। विश्वविद्यालय की ओर से आयोग में उप कुलसचिव विशेश्वर प्रसाद उपस्थित हुए।
सूचना आयुक्त की कड़ी टिप्पणी
आयोग में पेश होने आए वादियों ने कई साल बाद भी मार्कशीट और डिग्री न मुहैया कराने पर विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि को आड़े हाथों लिया। सुनवाई के दौरान यह मामला राज्य सूचना आयुक्त के संज्ञान में आया तो उन्होंने कहा, ‘विद्यार्थी और उनके संबंधियों के गुस्से को गलत नहीं ठहराया जा सकता। जिन्होंने साल भर मेहनत करके परीक्षा दी, उन्हें समय से मार्कशीट और डिग्री उपलब्ध कराना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी है।’ उन्होंने इस पर गहरा अफसोस जताते हुए कहा कि चार-पांच साल तक डिग्री और मार्कशीट न देने का मतलब है बच्चों का भविष्य चौपट कर देना।
विज्ञापन
सूचना देने से खुल जाएंगे करोड़ों के घपले
डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में अधिकारियों के सूचना न देने के पीछे की वजह यह भी है कि उन्हें मूल रिकॉर्ड के असली या फर्जी होने का पता नहीं। दूसरा यह भी डर है कि कहीं आरटीआई से किसी नए फर्जीवाडे़ से पर्दा हट सकता है। मूल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ पर कानूनी पचड़ों से बचने के लिए विश्वविद्यालय ने जानकारी न देने का रास्ता निकाला था जो सूचना आयोग की सख्ती के बाद अब बंद होता नजर आ रहा है।
विज्ञापन
राज्य सूचना आयुक्त गजेंद्र यादव ने 17 और 18 नवंबर को डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से संबंधित कुल 361 मामलों की सुनवाई की। इनमें 40 प्रकरण छात्रों को मार्कशीट या डिग्री उपलब्ध न कराने और इनमें खामी होने पर संशोधन न कर पाने से संबंधित हैं। बाकी महाविद्यालयों की संबद्धता, स्ववित्त पोषित कॉलेजों में शिक्षकों का अनुमोदन, अंकपत्र सत्यापन, गोल्ड मेडल और शोध संबंधी मामले हैं। एक मामले में कार्यालय अधीक्षक (गोपनीय) पीके अग्रवाल पर 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया है। 34 मामले निस्तारित किए गए और बाकी मामलों में 22 व 23 अप्रैल की तारीख दी गई है। विश्वविद्यालय की ओर से आयोग में उप कुलसचिव विशेश्वर प्रसाद उपस्थित हुए।
विज्ञापन
सूचना आयुक्त की कड़ी टिप्पणी
आयोग में पेश होने आए वादियों ने कई साल बाद भी मार्कशीट और डिग्री न मुहैया कराने पर विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि को आड़े हाथों लिया। सुनवाई के दौरान यह मामला राज्य सूचना आयुक्त के संज्ञान में आया तो उन्होंने कहा, ‘विद्यार्थी और उनके संबंधियों के गुस्से को गलत नहीं ठहराया जा सकता। जिन्होंने साल भर मेहनत करके परीक्षा दी, उन्हें समय से मार्कशीट और डिग्री उपलब्ध कराना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी है।’ उन्होंने इस पर गहरा अफसोस जताते हुए कहा कि चार-पांच साल तक डिग्री और मार्कशीट न देने का मतलब है बच्चों का भविष्य चौपट कर देना।
विज्ञापन
सूचना देने से खुल जाएंगे करोड़ों के घपले
डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में अधिकारियों के सूचना न देने के पीछे की वजह यह भी है कि उन्हें मूल रिकॉर्ड के असली या फर्जी होने का पता नहीं। दूसरा यह भी डर है कि कहीं आरटीआई से किसी नए फर्जीवाडे़ से पर्दा हट सकता है। मूल रिकॉर्ड में छेड़छाड़ पर कानूनी पचड़ों से बचने के लिए विश्वविद्यालय ने जानकारी न देने का रास्ता निकाला था जो सूचना आयोग की सख्ती के बाद अब बंद होता नजर आ रहा है।