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जिंदगी की कसौटी पर सदा घिसती रहीं हैं ओमवती

Sun, 28 Jul 2013 05:33 AM IST
Agra
Agra Updated Sun, 28 Jul 2013 05:33 AM IST
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आगरा। फूल सी थीं जब सासरे में कदम रखा था। पलकों पर कितने ख्वाब संग लाई थीं। लाल ओढ़नी में जिंदगी के सारे रंग घुल गए पर एक तूफान ने बड़ी बेदर्दी से उसे सिर से खींच लिया। बदहवास सी ओमवती देखती ही रह गईं। जब सहेलियों की शादी भी नहीं हुई थी, उनकी मांग उजड़ चुकी थी। कोमल मन लहूलुहान हो गया। देश के लिए खुद को मिटाने वाला उनके गर्भ में अपनी निशानी छोड़ गया था। बड़ा बेटा मुकेश साल भर का था। बीच मंझधार में खड़ी ओमवती को बच्चों की नैया पार लगानी थी। जिसने दर्द दिया, उसने हिम्मत भी दी। अपने दो लाडलों के साथ शहीद भवन आ गईं। भैंस का दूध बेचकर उनका पालन पोषण किया। शहीद पिता रणबीर सिंह की यूनिट में जाने के अपने सपने को मुकेश ने पूरा किया। मां भी कमजोर नहीं पड़ीं पर तीन साल पहले बड़ी बहू गीता के देहांत ने ओमवती को पूरी तरह तोड़कर रख दिया। सहारे की उम्र में पोतों को संभाल रही हैं। 42 साल का लंबा वक्त बीत गया पर आज भी इन बूढ़ी आंखों में उन टूटे सपनों के शीशे चुभते हैं। कहती तो हैं कि जो पूरे न हो सके, उनकी याद भी नहीं लेकिन चेहरे पर आए भाव...ये क्या कह रहे हैं।
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रौझौली के शहीद रणबीर की पत्नी 65 वर्षीय ओमवती जिंदगी की कसौटी पर सदा घिसती ही रही हैं। बताती हैं, 23 साल की उमर में विधवा है गई। शुरु शुरू मै तो यहां रोमती रहतीं। तब भवन में रहवे वारी दूसरी विधवान नै धीरज बंधायौ। रात मै सब जनी बाहर ही सोमतीं। 142 रुपया पेंशन मिलती। जमीन पै गांव वारेन नै मुकद्दमा चलाय दयो। इत्ते पैसन में बच्चन नै कैसे पालती। भैंस बांधकै गुजारौ करौ। सबरी जिंदगी ही मेहनत मै बीत गई। मेरौ संघर्ष नाय खतम भयो कबहू। न जानै कैसौ भाग लिखाय कै लाई हूं।
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मैं भी पापा जैसौ बनऊंगो
ओमवती ने बताया मुकेश बचपन ते ही कहतौ, अम्मा पापा जैसौ ही बनऊंगौ। देखियो, बिनकी यूनिट में ही भर्ती होऊंगो। आर्मी स्कूल में ही पढ़ौ। आज 9 जाट रेजीमेंट में नायब सूबेदार है। या बखत नागालैंड में तैनात है। मोते रोज बात करतौ है। छोटौ हिम्मत प्राइवेट सर्विस करतौ है।
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बड़े शर्मीले हते
पति के बारे में लजाती हुई कहती हैं, बड़े शर्मीले हते। मैं घूंघट में रहती। बात ही नाय हो पाती। शादी के तीन साल बाद तौ बिनकी खबर आय गई। बा समय 6 महीना की गर्भवती हती। बिनै आखिरी बार देख ऊ नाय पाई। कछू दिना पीछै एक डिब्बा आयौ दाड़ी बनावे वारौ। बई ऐ संभाल कै रखौ है अब तक।

लगै कि छाती के दो टूक भये
लोग कहतैं, तुम्हारौ सम्मान कर हम गौरव पामें पर मोते पूछौ। जब बिनकौ सम्मान लैवे मंच पै जातूं तो लगतै छाती के दो टूक भये जा रहे पर का करूं नाय जायकै बिनकौ अपमान कैसे करूं।


दादी बहुत प्यारी है
पोते प्रेम और सचिन कहते हैं कि दर्द में रहकर भी दादी प्यार ही बांटती रहीं। मां के जाने के बाद मातृत्व की छांव कर दी हमारे सिर पर। बहुत प्यारी हैं दादी।

पूरी पलटन ही शहीद हो गई
सिपाही रणबीर सिंह ने 71 के भारत पाक युद्ध में वीर गति पाई। ओमवती को इतना ही पता है कि उनकी सारी पलटन ही शहीद हो गई थी।
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