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सब देशों से बढ़कर सुंदर देश हमारा...
Updated Sun, 28 Jan 2018 12:02 AM IST
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गोष्ठी का आयोजन
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करहल। चूना वाली गली स्थित एक प्रतिष्ठान पर गणतंत्र पर्व की रात काव्य गोष्ठी में कवियों ने राष्ट्र्र को समर्पित रचनाएं सुनाईं। काव्य गोष्ठी का शुभारंभ सेवानिवृत्त प्राथमिक शिक्षक कल्याण परिषद के जिला अध्यक्ष रघुवीर सिंह यादव ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया।
डा. पदमसिंह पदम ने जहां भावना प्यार की तहरीर होना चाहती है, मानवीयता जगत से संताप हरना चाहती है। दीन मुहम्मद दीन ने-सृष्टि नियंता ने रच कर जब सारा विश्व निहारा था, सब देशों से बढ़कर सुंदर देश हमारा था। ताहिर चांद ने-अरमा ये निकल जाता गर वतन पर मर जाता, काश ये तिरंगा इस जिस्म पर भी लिपट जाता।
शिक्षक राकेश सरल ने-सर दिया पर सर को न झुकने दिया, उन वीरों को शत-शत नमन है मेरा। प्रेमचंद शाक्य प्रेम-वीर प्रसूता वसुंधरा ये बिसरी याद दिलाती, स्वतंत्रता की रक्षा करना हमको सदा सिखाती। संजू सूर्यम ठाकुर ने- तू हिंदू होगा अच्छा है, तू मुस्लिम होगा अच्छा है, हिंदू मुस्लिम होने से पहले भारत मां का बच्चा है। विवेक पांडेय ने- मैं नयन में गढ़ रहा हूं, उम्र भर तुझे प्यार करने का मैं प्रण कर रहा हूं।
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अरमान ने- यहां गीता भी पढ़ते हैं, यहां आयत भी पढ़ते हैं। नन्हें खां ने- आंखें तरेर कर भेड़ भेड़िये पर हावी हो, उसमें इतने पैर कहां होते हैं। बदन सिंह मस्ताना ने- मैं तो पिया गुजर कर लूंगी धोती फटी पुरानी में। रघुवर दयाल ने-गुइयां रोज बजारे जावे मोय देख देख गुर्रावे। डा. केशव सिंह, डा.. दुर्वेश यादव, नितिन चतुर्वेदी, डा. रामशंकर यादव, रामकिशोर वर्मा, रिषीकांत दुबे मौजूद थे।
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डा. पदमसिंह पदम ने जहां भावना प्यार की तहरीर होना चाहती है, मानवीयता जगत से संताप हरना चाहती है। दीन मुहम्मद दीन ने-सृष्टि नियंता ने रच कर जब सारा विश्व निहारा था, सब देशों से बढ़कर सुंदर देश हमारा था। ताहिर चांद ने-अरमा ये निकल जाता गर वतन पर मर जाता, काश ये तिरंगा इस जिस्म पर भी लिपट जाता।
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शिक्षक राकेश सरल ने-सर दिया पर सर को न झुकने दिया, उन वीरों को शत-शत नमन है मेरा। प्रेमचंद शाक्य प्रेम-वीर प्रसूता वसुंधरा ये बिसरी याद दिलाती, स्वतंत्रता की रक्षा करना हमको सदा सिखाती। संजू सूर्यम ठाकुर ने- तू हिंदू होगा अच्छा है, तू मुस्लिम होगा अच्छा है, हिंदू मुस्लिम होने से पहले भारत मां का बच्चा है। विवेक पांडेय ने- मैं नयन में गढ़ रहा हूं, उम्र भर तुझे प्यार करने का मैं प्रण कर रहा हूं।
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अरमान ने- यहां गीता भी पढ़ते हैं, यहां आयत भी पढ़ते हैं। नन्हें खां ने- आंखें तरेर कर भेड़ भेड़िये पर हावी हो, उसमें इतने पैर कहां होते हैं। बदन सिंह मस्ताना ने- मैं तो पिया गुजर कर लूंगी धोती फटी पुरानी में। रघुवर दयाल ने-गुइयां रोज बजारे जावे मोय देख देख गुर्रावे। डा. केशव सिंह, डा.. दुर्वेश यादव, नितिन चतुर्वेदी, डा. रामशंकर यादव, रामकिशोर वर्मा, रिषीकांत दुबे मौजूद थे।