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चारागाहों पर कब्जा, फसलों पर गोवंशों की नजर
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एटा। धार्मिक आस्थाओं और मान्यता के चलते लोग गाय पालते हैं। पहले गोचर और चारागाह की जमीन पर गोवंश को चरने के लिए छोड़ दिया जाता था। धीरे धीरे गोवंश की संख्या कम हुई तो इन चारागाहों पर कब्जे कर लिए गए। शासन की सख्ती के बाद गोकसी पर लगाम लगी तो बड़ी संख्या में गोवंश फिर नजर आने लगे। चारागाहों के अभाव में यह गोवंश ग्रामीण इलाकों में किसानों की फसल पर मुंह मार कर अपनी भूख मिटाने को मजबूर हो गए। फसल का नुकसान देखते हुए अब किसानों ने सख्त रुख अख्तियार किया और गोवंश को लेकर आंदोलन छेड़ दिया। गोवंशों को सरकारी स्कूलों और भवनों में कैद किया जाने लगा। इससे प्रशासन की नींद टूटी तो जिले में पशु आश्रय स्थल बना दिए गए। अब परेशानी यह हो गई कि इतनी बड़ी संख्या में गोवंशों के लिए चारे का इंतजाम कहां से हो, तो जिम्मेदारों ने फौरी तौर पर प्रधानों और नगर निकायों से इसकी व्यवस्था कराने को कह दिया। लेकिन यह लोग भी कब तक इसका इंतजाम करेंगे। वहीं प्रशासन जिले में पड़ी चारागाह की जमीन को कब्जा मुक्त करा ले तो इन गोवंशों के लिए चारे का इंतजाम करना आसान होगा। पढ़िए रिपोर्ट...
जिले में 550 हेक्टेयर भूमि चारागाह की
जिला प्रशासन ने चारागाह की जो भूमि चिह्नित की है वह कुछ 550 हेक्टेयर बताई जा रही है। इसमें सबसे अधिक जमीन सदर तहसील में 363 हेक्टेयर है। इसके अलावा अलीगंज तहसील में 80.119 हेक्टेयर, जबकि जलेसर तहसील में 80 हेक्टेयर जमीन चारागाह की है। चिह्नित की गई इन जमीनों के अधिकतर हिस्से पर दबंग कब्जा जमाए बैठे हैं। प्रशासन अगर सख्ती से इन जमीनों को खाली कराए तो एक बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। जलेसर और अलीगंज तहसील के कर्मचारियों की मानें तो अधिकतर जमीन से कब्जा हटाया जा चुका है। लेकिन अगर ऐसा है तो इन क्षेत्रों में बने पशु आश्रय स्थलों पर मौजूद पशुओं के लिए चारे का संकट क्यों हैं।
मारहरा ब्लाक के गांव तो बस उदाहरण
सदर तहसील के मारहरा ब्लाक के चाठी रफीपुर, अहमदनगर बमनोई, खकरई, मेंहनीशोरां, नौजरपुर समोखर, भुरगंवा, बहटा, मुईनुद्दीनपुर आदि गांव तो बस उदाहरण हैं। इन गांवों की चारागाह की जमीन पर लंबे समय से कब्जा कर रखा गया है। इसके अलावा जलेसर तहसील के करीब दस हेक्टेयर भूमि पर भी कब्जा है। वहीं अलीगंज और सदर तहसील के अन्य ब्लाकों पर भी चारागाह की भूमि दबंगों के कब्जे से अछूती नहीं है।
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कब्जा मुक्त कार्रवाई में प्रशासन फेल
चारागाह की जमीन से दबंगों का कब्जा हटवाने में प्रशासन सफल होता नजर नहीं आ रहा है। जनपद की तीनों तहसीलों के बड़े क्षेत्र में कब्जा होने की जानकारी प्रशासन को भी है। लेकिन प्रशासन दबंगों से भूमि कब्जा मुक्त नहीं करा पा रहा है। जिस तरह से जिला प्रशासन चारागाह की जमीन को लेकर उदासीन बना हुआ है। इससे यह तो साफ है कि दबंगों के आगे प्रशासन लाचार है।
कहां गया एंटी भू माफिया अभियान
प्रदेश में योगी सरकार बनते ही एंटी भू माफिया अभियान की शुरुआत की गई थी। अपनी पीठ थपथपाने को लेकर प्रशासन ने आनन फानन टीम गठित की और कब्जों को चिह्नित कर उन्हें मुक्त कराने का काम भी शुरु किया। लेकिन यह अभियान जिस गति से शुरू हुआ, उसी गति से इस पर ब्रेक भी लग गया। एंटी भू माफिया अभियान लगातार चलाया जाता तो अब तक चारागाह की जमीनों सहित अन्य कब्जों को भी मुक्त कराया जा सकता था।
आंकड़ों पर नजर
550 हेक्टेयर भूमि है चारागाह की कुल जिले में
80.119 अलीगंज तहसील में है चारागाह की जमीन
80 हेक्टेयर जलेसर तहसील में चारागाह की जमीन
363 हेक्टेयर सदर तहसील में चारागाह की जमीन
गांव में काफी जमीन है, जो अभिलेखों में चारागाह में दर्ज है। लोगों का जमीन पर अवैध कब्जा है।
बाबूराम, अहमद नगर बमनाई
कई बार तहसील प्रशासन को चारागाह की जमीन कब्जा मुक्त कराने के लिए शिकायत की गई है। मगर कोई सुनवाई नहीं होती है।
रवेंद्र पाल, मिरहची
ऐसा कोई गांव ही नहीं है, जहां चारागाह की जमीन न हो। मगर ज्यादातर जमीनों पर लोगों ने कब्जा कर रखा है।
इसकी जानकारी तहसील अधिकारियों को भी है।
नूर आलम, मारहरा
हमारे यहां भी चारागाह की जमीन तो है। मगर वह आज कल कहीं भी देखने को नहीं मिलती। लोगों ने जमीन पर कब्जा कर रखा है।
ब्रह्मानंद, भुरगवां
तीनों तहसीलदारों की रही मिली जुली बात
चारागाहों को लेकर तीनों ही तहसीलदारों ने एक जैसी बात कही है। सदर तहसील के तहसीलदार दुर्गेश यादव ने बताया कि क्षेत्र की चारागाह की जमीन पूरी तरह से कब्जा मुक्त है। अगर कहीं कोई कब्जे की जानकारी मिलती है और वैसे ही वह चारागाह की जमीन को कब्जा मुक्त करा देते हैं। वहीं जलेसर के तहसीलदार विजय कुमार छत्रपति का कहना है कि वह लगातार चारागाह की जमीन को कब्जा मुक्त करा रहे हैं। बहुत कम चारागाह की जमीन पर ही लोगों का कब्जा होगा।
उधर, अलीगंज के तहसीलदार आरके त्यागी का कहना है कि उनके यहां चारागाह की जमीन कब्जा मुक्त है। अगर कोई कब्जा करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
21 स्थानों पर रह रहा है गोवंश
जिले में 21 स्थानों पर गोवंश को रखा गया है, जिनमें एटा और जलेसर की दो गौशाला, जैथरा, अलीगंज और राजा का रामपुर के तीन कान्हा पशु आश्रय केंद्र के अलावा अस्थाई गोवंश संरक्षण केंद्र बनाए गए है। जहां जिले भर के दो हजार से अधिक गोवंश के रहने का ठिकाना बनाया गया है।
तीनों तहसीलों को निर्देश जारी कर दिए गए है कि चारागाह की जमीन पर किसी भी तरह की कोई कब्जा नहीं होना चाहिए। इसके लिए ग्राम प्रधानों को भी सख्त हिदायत दी गई है। साथ ही जहां भी लोगों ने कब्जा कर रखा है। उस जगह को कब्जा मुक्त कराया जा रहा है। जल्द ही चारागाह की जमीन को गोवंश के लिए प्रयोग में लाया जाएगा।
आईपी पांडेय, जिलाधिकारी
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जिले में 550 हेक्टेयर भूमि चारागाह की
जिला प्रशासन ने चारागाह की जो भूमि चिह्नित की है वह कुछ 550 हेक्टेयर बताई जा रही है। इसमें सबसे अधिक जमीन सदर तहसील में 363 हेक्टेयर है। इसके अलावा अलीगंज तहसील में 80.119 हेक्टेयर, जबकि जलेसर तहसील में 80 हेक्टेयर जमीन चारागाह की है। चिह्नित की गई इन जमीनों के अधिकतर हिस्से पर दबंग कब्जा जमाए बैठे हैं। प्रशासन अगर सख्ती से इन जमीनों को खाली कराए तो एक बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। जलेसर और अलीगंज तहसील के कर्मचारियों की मानें तो अधिकतर जमीन से कब्जा हटाया जा चुका है। लेकिन अगर ऐसा है तो इन क्षेत्रों में बने पशु आश्रय स्थलों पर मौजूद पशुओं के लिए चारे का संकट क्यों हैं।
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मारहरा ब्लाक के गांव तो बस उदाहरण
सदर तहसील के मारहरा ब्लाक के चाठी रफीपुर, अहमदनगर बमनोई, खकरई, मेंहनीशोरां, नौजरपुर समोखर, भुरगंवा, बहटा, मुईनुद्दीनपुर आदि गांव तो बस उदाहरण हैं। इन गांवों की चारागाह की जमीन पर लंबे समय से कब्जा कर रखा गया है। इसके अलावा जलेसर तहसील के करीब दस हेक्टेयर भूमि पर भी कब्जा है। वहीं अलीगंज और सदर तहसील के अन्य ब्लाकों पर भी चारागाह की भूमि दबंगों के कब्जे से अछूती नहीं है।
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कब्जा मुक्त कार्रवाई में प्रशासन फेल
चारागाह की जमीन से दबंगों का कब्जा हटवाने में प्रशासन सफल होता नजर नहीं आ रहा है। जनपद की तीनों तहसीलों के बड़े क्षेत्र में कब्जा होने की जानकारी प्रशासन को भी है। लेकिन प्रशासन दबंगों से भूमि कब्जा मुक्त नहीं करा पा रहा है। जिस तरह से जिला प्रशासन चारागाह की जमीन को लेकर उदासीन बना हुआ है। इससे यह तो साफ है कि दबंगों के आगे प्रशासन लाचार है।
कहां गया एंटी भू माफिया अभियान
प्रदेश में योगी सरकार बनते ही एंटी भू माफिया अभियान की शुरुआत की गई थी। अपनी पीठ थपथपाने को लेकर प्रशासन ने आनन फानन टीम गठित की और कब्जों को चिह्नित कर उन्हें मुक्त कराने का काम भी शुरु किया। लेकिन यह अभियान जिस गति से शुरू हुआ, उसी गति से इस पर ब्रेक भी लग गया। एंटी भू माफिया अभियान लगातार चलाया जाता तो अब तक चारागाह की जमीनों सहित अन्य कब्जों को भी मुक्त कराया जा सकता था।
आंकड़ों पर नजर
550 हेक्टेयर भूमि है चारागाह की कुल जिले में
80.119 अलीगंज तहसील में है चारागाह की जमीन
80 हेक्टेयर जलेसर तहसील में चारागाह की जमीन
363 हेक्टेयर सदर तहसील में चारागाह की जमीन
गांव में काफी जमीन है, जो अभिलेखों में चारागाह में दर्ज है। लोगों का जमीन पर अवैध कब्जा है।
बाबूराम, अहमद नगर बमनाई
कई बार तहसील प्रशासन को चारागाह की जमीन कब्जा मुक्त कराने के लिए शिकायत की गई है। मगर कोई सुनवाई नहीं होती है।
रवेंद्र पाल, मिरहची
ऐसा कोई गांव ही नहीं है, जहां चारागाह की जमीन न हो। मगर ज्यादातर जमीनों पर लोगों ने कब्जा कर रखा है।
इसकी जानकारी तहसील अधिकारियों को भी है।
नूर आलम, मारहरा
हमारे यहां भी चारागाह की जमीन तो है। मगर वह आज कल कहीं भी देखने को नहीं मिलती। लोगों ने जमीन पर कब्जा कर रखा है।
ब्रह्मानंद, भुरगवां
तीनों तहसीलदारों की रही मिली जुली बात
चारागाहों को लेकर तीनों ही तहसीलदारों ने एक जैसी बात कही है। सदर तहसील के तहसीलदार दुर्गेश यादव ने बताया कि क्षेत्र की चारागाह की जमीन पूरी तरह से कब्जा मुक्त है। अगर कहीं कोई कब्जे की जानकारी मिलती है और वैसे ही वह चारागाह की जमीन को कब्जा मुक्त करा देते हैं। वहीं जलेसर के तहसीलदार विजय कुमार छत्रपति का कहना है कि वह लगातार चारागाह की जमीन को कब्जा मुक्त करा रहे हैं। बहुत कम चारागाह की जमीन पर ही लोगों का कब्जा होगा।
उधर, अलीगंज के तहसीलदार आरके त्यागी का कहना है कि उनके यहां चारागाह की जमीन कब्जा मुक्त है। अगर कोई कब्जा करेगा तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
21 स्थानों पर रह रहा है गोवंश
जिले में 21 स्थानों पर गोवंश को रखा गया है, जिनमें एटा और जलेसर की दो गौशाला, जैथरा, अलीगंज और राजा का रामपुर के तीन कान्हा पशु आश्रय केंद्र के अलावा अस्थाई गोवंश संरक्षण केंद्र बनाए गए है। जहां जिले भर के दो हजार से अधिक गोवंश के रहने का ठिकाना बनाया गया है।
तीनों तहसीलों को निर्देश जारी कर दिए गए है कि चारागाह की जमीन पर किसी भी तरह की कोई कब्जा नहीं होना चाहिए। इसके लिए ग्राम प्रधानों को भी सख्त हिदायत दी गई है। साथ ही जहां भी लोगों ने कब्जा कर रखा है। उस जगह को कब्जा मुक्त कराया जा रहा है। जल्द ही चारागाह की जमीन को गोवंश के लिए प्रयोग में लाया जाएगा।
आईपी पांडेय, जिलाधिकारी