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ब्रज दूलह को सिर नवाकर ही होली खेलते हैं हुरियारे
Updated Sun, 11 Feb 2018 08:00 PM IST
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- फोटो : डेमो
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बरसाना (मथुरा)। ब्रज का कण-कण राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम की लीलाओं का साक्षात्कार कराता है। उनकी लीला स्थलियों पर अब मंदिर बने हुए हैं जो उनकी लीलाओं की अनुभूति कराते हैं। ऐसा ही एक मंदिर है ब्रज दूलह का जहां कृष्ण दूलह यानी दूल्हा के रूप में पूजे जाते हैं।
इस मंदिर की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बरसाना की लठामार होली में नंदगांव से होली खेलने आने वाले हुरियारे यहां आकर ब्रज दूलह को प्रणाम करते हैं और होली खेलने की आज्ञा लेकर साथ होली खेलने को आमंत्रित करते हैं।
ब्रज दूलह का मंदिर भूमिया गली स्थित कटारा हवेली में है। ब्रज दूलह की मान्यता प्राचीन है। इसी मान्यता से प्रेरित होकर भरतपुर राज्य के राजपुरोहित और वकील रहे रूपराम कटारा ने करीब ढाई सौ वर्ष पहले इस मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर में कृष्ण की पूजा दूल्हे के रूप में की जाती है। अन्य मंदिरों में जहां सेवा पूजा के कार्य पुरुष करते हैं उसके ठीक उलट इस मंदिर की सेवा का दायित्व महिलाएं और लड़कियां ही संभालती हैं।
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ब्रज दूलह के नामकरण के बारे में रूपराम कटारा के वंशज गोकुलेश कटारा बताते हैं कि द्वापर में जब कृष्ण अपने सखाओं के साथ सज धज कर होली खेलने बरसाना आए तो गोपियों ने उनके साथ लठामार होली खेलने का मन बना लिया। गोपियों के हाथों में लाठियां देखकर ग्वाल-वाल डरकर भाग खड़े हुए और कृष्ण वहीं कहीं छिप गए। छिपे हुए कृष्ण को गोपियों ने ढूंढ निकाला और उनका कान खींचकर कहा कि दूलह तो यहां छिपा हुआ है। तब से कृष्ण का एक नाम ब्रज दूलह भी पड़ गया।
नंदगांव से हर साल हुरियारे बनकर होली खेलने बरसाना आने वाले बिजेंद्र शरण गोस्वामी बताते हैं कि पहले नंदगांव के हुरियारे ब्रज दूलह के मंदिर पर पहुंचकर ही पाग बांधते थे। हुरियारे ब्रज दूलह से होली खेलने की आज्ञा लेते हैं और अपने साथ होली खेलने को आमंत्रित करते हैं। यह प्राचीन परंपरा है। मथुरा संग्रहालय के संस्थापक और ब्रिटिश राज में मथुरा के जिला कलेक्टर रहे फ्रेडरिक सोल्मन ग्रांउस ने 22 फरवरी 1877 को बरसाना की लठामार होली इसी ब्रज दूलह मंदिर की छत पर बैठकर ही देखी थी।
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इस मंदिर की महत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बरसाना की लठामार होली में नंदगांव से होली खेलने आने वाले हुरियारे यहां आकर ब्रज दूलह को प्रणाम करते हैं और होली खेलने की आज्ञा लेकर साथ होली खेलने को आमंत्रित करते हैं।
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ब्रज दूलह का मंदिर भूमिया गली स्थित कटारा हवेली में है। ब्रज दूलह की मान्यता प्राचीन है। इसी मान्यता से प्रेरित होकर भरतपुर राज्य के राजपुरोहित और वकील रहे रूपराम कटारा ने करीब ढाई सौ वर्ष पहले इस मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर में कृष्ण की पूजा दूल्हे के रूप में की जाती है। अन्य मंदिरों में जहां सेवा पूजा के कार्य पुरुष करते हैं उसके ठीक उलट इस मंदिर की सेवा का दायित्व महिलाएं और लड़कियां ही संभालती हैं।
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ब्रज दूलह के नामकरण के बारे में रूपराम कटारा के वंशज गोकुलेश कटारा बताते हैं कि द्वापर में जब कृष्ण अपने सखाओं के साथ सज धज कर होली खेलने बरसाना आए तो गोपियों ने उनके साथ लठामार होली खेलने का मन बना लिया। गोपियों के हाथों में लाठियां देखकर ग्वाल-वाल डरकर भाग खड़े हुए और कृष्ण वहीं कहीं छिप गए। छिपे हुए कृष्ण को गोपियों ने ढूंढ निकाला और उनका कान खींचकर कहा कि दूलह तो यहां छिपा हुआ है। तब से कृष्ण का एक नाम ब्रज दूलह भी पड़ गया।
नंदगांव से हर साल हुरियारे बनकर होली खेलने बरसाना आने वाले बिजेंद्र शरण गोस्वामी बताते हैं कि पहले नंदगांव के हुरियारे ब्रज दूलह के मंदिर पर पहुंचकर ही पाग बांधते थे। हुरियारे ब्रज दूलह से होली खेलने की आज्ञा लेते हैं और अपने साथ होली खेलने को आमंत्रित करते हैं। यह प्राचीन परंपरा है। मथुरा संग्रहालय के संस्थापक और ब्रिटिश राज में मथुरा के जिला कलेक्टर रहे फ्रेडरिक सोल्मन ग्रांउस ने 22 फरवरी 1877 को बरसाना की लठामार होली इसी ब्रज दूलह मंदिर की छत पर बैठकर ही देखी थी।