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सरकारों की बेरुखरी झेल रही ती र्थ नगरी
Updated Sat, 19 Aug 2017 11:22 PM IST
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सूकर क्षेत्र को तीर्थनगरी घोषित न करने की पीड़ा
- फोटो : अमर उजाला
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कासगंज।
जिले का सोरों सूकर क्षेत्र पौराणिक और प्राचीन तीर्थस्थल होने के बावजूद देश के तीर्थस्थलों की सूची में इसे शामिल नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप यह तीर्थनगरी तीर्थ पर्यटन के क्षेत्र में पिछड़ी हुई है। सूकर क्षेत्र के लोग लंबे समय से तीर्थनगरी का दर्जा मिलने की मांग करते रहे हैं लेकिन अभी तक इसे पूरा नहीं किया गया गया। अमर उजाला ने तीर्थनगरी के जन-जन की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के लिए सोरों सूकर क्षेत्र परिक्रमा अभियान शुरू किया है।
तीर्थ नगरी सोरों का पौराणिक इतिहास वराह पुराण में पद्म पुराण, वायु पुराण, स्कंद पुराण, गर्ग संहिता आदि में मिलता है। यह क्षेत्र भगवान वराह का क्षेत्र है। भगवान विष्णु ने पृथ्वी का सूकर के रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष राक्षस का वध किया। इसके उपरांत मार्गशीर्ष मास की द्वादशी को इसी स्थान पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। तभी से यह गंगा का तटवर्ती क्षेत्र सूकर क्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान विष्णु के प्राकट्य का आदि स्थल होने के कारण इसे आदि वराह क्षेत्र भी माना गया है।
वराह पुराण में भगवान वराह के अवतरण के संबंध में श्लोक : ‘यत्र भागीरथी गंगा, मम: सौकरवे स्थिता का उल्लेख मिलता है। सूकर क्षेत्र की प्राकट्य भूमि की परिधि 5 योजन (52 किमी) तक बताई गई है। इस संबंध में पद्म पुराण के एक श्लोक ‘पंचयोजन विस्तीर्णे सूकरे मम: मंदिरे’ में यह उल्लेख किया गया है। वहीं तीर्थ नगरी में हरिपदी गंगा के संबंध में यह सत्य है कि इस कुंड में विसर्जित की जाने वाली अस्थियां स्वत: ही जल रूप ले लेतीं हैं। वराह पुराण में इसका भी उल्लेख किया गया है। आज भी हरिपदी कुंड की सफाई में विसर्जित की जाने वाली अस्थियां नहीं मिलतीं। इस मान्यता के चलते प्रतिदिन लोग अस्थि विसर्जन के लिए यहां पहुंचते हैं। ऐसी ऐतिहासिक और पौराणिक तीर्थस्थल एवं धार्मिक महत्व के बावजूद तीर्थस्थल की सूची में सोरों सूकर क्षेत्र का नाम शामिल न होना यहां के बाशिंदों की पीड़ा का विषय है। उपेक्षा का दंश झेल रहे तीर्थपुरोहित भी आहत हैं। क्यों कि सरकार का ध्यान यहां के विकास पर नहीं है।
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क्या कहते हैं तीर्थनगरी सोरों के लोग
- सोरों सूकर क्षेत्र अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है। यहां भगवान वराह में सतयुग में अवतार लिया था, लेकिन यह तीर्थस्थल पूरी तरह से उपेक्षित है। आजादी के 70 वर्ष बाद भी किसी भी सरकार ने यहां के विकास पर ध्यान नहीं दिया। इससे इस क्षेत्र के लोग उपेक्षित महसूस करते हैं।
सत्यप्रकाश अबोध, श्रीराम कथा वाचक
- सोरों तीर्थनगरी अन्य तीर्थों की तुलना में काफी प्राचीन है। कभी भी किसी सरकार ने यहां के विकास के लिए कोई पैकेज नहीं दिया और न ही इसे तीर्थस्थल की सूची में शामिल किया गया। जबकि अन्य स्थानों के लिए विकास के पैकेज आए दिन मिलते हैं। डा.राधाकृष्ण दीक्षित, साहित्यकार एवं ज्योतिषाचार्य
- सोरों तीर्थ जनपद का गौरव है, लेकिन इस पर सरकार का ध्यान नहीं है। तीर्थ पर्यटकों के लिए यहां कोई सुविधा नहीं मिलती। इससे पर्यटन पर असर पड़ता है। पर्यटकों को दिक्कतें होतीं हैँ। तीर्थ नगरी को तीर्थस्थल घोषित किया जाना आवश्यक है- विनोद गुप्ता कारोबारी
- सोरों सूकर क्षेत्र राजनैतिक दृष्टि से काफी उपेक्षित है। जबकि यह भूमि देव भूमि है। प्राचीन इतिहास और धरोहरों का संरक्षण भी नहीं किया गया है। तीर्थनगरी घोषित होने के बाद ही यहां अच्छे विकास के अवसर पैदा होंगे। डा. लालाराम पल्लव, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक
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जिले का सोरों सूकर क्षेत्र पौराणिक और प्राचीन तीर्थस्थल होने के बावजूद देश के तीर्थस्थलों की सूची में इसे शामिल नहीं किया गया है। इसके परिणामस्वरूप यह तीर्थनगरी तीर्थ पर्यटन के क्षेत्र में पिछड़ी हुई है। सूकर क्षेत्र के लोग लंबे समय से तीर्थनगरी का दर्जा मिलने की मांग करते रहे हैं लेकिन अभी तक इसे पूरा नहीं किया गया गया। अमर उजाला ने तीर्थनगरी के जन-जन की आवाज को शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के लिए सोरों सूकर क्षेत्र परिक्रमा अभियान शुरू किया है।
तीर्थ नगरी सोरों का पौराणिक इतिहास वराह पुराण में पद्म पुराण, वायु पुराण, स्कंद पुराण, गर्ग संहिता आदि में मिलता है। यह क्षेत्र भगवान वराह का क्षेत्र है। भगवान विष्णु ने पृथ्वी का सूकर के रूप में अवतार लेकर हिरण्याक्ष राक्षस का वध किया। इसके उपरांत मार्गशीर्ष मास की द्वादशी को इसी स्थान पर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। तभी से यह गंगा का तटवर्ती क्षेत्र सूकर क्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान विष्णु के प्राकट्य का आदि स्थल होने के कारण इसे आदि वराह क्षेत्र भी माना गया है।
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वराह पुराण में भगवान वराह के अवतरण के संबंध में श्लोक : ‘यत्र भागीरथी गंगा, मम: सौकरवे स्थिता का उल्लेख मिलता है। सूकर क्षेत्र की प्राकट्य भूमि की परिधि 5 योजन (52 किमी) तक बताई गई है। इस संबंध में पद्म पुराण के एक श्लोक ‘पंचयोजन विस्तीर्णे सूकरे मम: मंदिरे’ में यह उल्लेख किया गया है। वहीं तीर्थ नगरी में हरिपदी गंगा के संबंध में यह सत्य है कि इस कुंड में विसर्जित की जाने वाली अस्थियां स्वत: ही जल रूप ले लेतीं हैं। वराह पुराण में इसका भी उल्लेख किया गया है। आज भी हरिपदी कुंड की सफाई में विसर्जित की जाने वाली अस्थियां नहीं मिलतीं। इस मान्यता के चलते प्रतिदिन लोग अस्थि विसर्जन के लिए यहां पहुंचते हैं। ऐसी ऐतिहासिक और पौराणिक तीर्थस्थल एवं धार्मिक महत्व के बावजूद तीर्थस्थल की सूची में सोरों सूकर क्षेत्र का नाम शामिल न होना यहां के बाशिंदों की पीड़ा का विषय है। उपेक्षा का दंश झेल रहे तीर्थपुरोहित भी आहत हैं। क्यों कि सरकार का ध्यान यहां के विकास पर नहीं है।
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क्या कहते हैं तीर्थनगरी सोरों के लोग
- सोरों सूकर क्षेत्र अत्यंत प्राचीन तीर्थस्थल है। यहां भगवान वराह में सतयुग में अवतार लिया था, लेकिन यह तीर्थस्थल पूरी तरह से उपेक्षित है। आजादी के 70 वर्ष बाद भी किसी भी सरकार ने यहां के विकास पर ध्यान नहीं दिया। इससे इस क्षेत्र के लोग उपेक्षित महसूस करते हैं।
सत्यप्रकाश अबोध, श्रीराम कथा वाचक
- सोरों तीर्थनगरी अन्य तीर्थों की तुलना में काफी प्राचीन है। कभी भी किसी सरकार ने यहां के विकास के लिए कोई पैकेज नहीं दिया और न ही इसे तीर्थस्थल की सूची में शामिल किया गया। जबकि अन्य स्थानों के लिए विकास के पैकेज आए दिन मिलते हैं। डा.राधाकृष्ण दीक्षित, साहित्यकार एवं ज्योतिषाचार्य
- सोरों तीर्थ जनपद का गौरव है, लेकिन इस पर सरकार का ध्यान नहीं है। तीर्थ पर्यटकों के लिए यहां कोई सुविधा नहीं मिलती। इससे पर्यटन पर असर पड़ता है। पर्यटकों को दिक्कतें होतीं हैँ। तीर्थ नगरी को तीर्थस्थल घोषित किया जाना आवश्यक है- विनोद गुप्ता कारोबारी
- सोरों सूकर क्षेत्र राजनैतिक दृष्टि से काफी उपेक्षित है। जबकि यह भूमि देव भूमि है। प्राचीन इतिहास और धरोहरों का संरक्षण भी नहीं किया गया है। तीर्थनगरी घोषित होने के बाद ही यहां अच्छे विकास के अवसर पैदा होंगे। डा. लालाराम पल्लव, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक