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खतरे में काम कर रह कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी, टूटकर गिरा छत का टुकड़ा
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एटा। उप कृषि निदेशक कार्यालय के प्रथम तल पर बैठे कर्मचारियों के मेज पर शनिवार को छत का टुकड़ा टूटकर गिर गया। जिससे कर्मचारी की टेबल में छेद हो गया, गनीमत रही कि कर्मचारी के सिर पर नहीं गिरा। वरना कोई बड़ा हादसा हो सकता था। सिर पर मंडराती मौत के साये में कर्मचारी कार्य करने को विवश हैं और आए दिन कर्मचारियों के ऊपर टुकड़े गिरते रहते हैं।
ठंडी सड़क से कटरा मोहल्ला को जाने वाले रास्ते पर स्थित उप कृषि निदेशक कार्यालय के प्रथम तल पर बैठकर कार्य कर रहे कर्मचारियों की मेज पर छत से टूटकर एक टुकड़ा गिर गया। जिससे मेज में छेद हो गया। कर्मचारियों का कहना है कि छत से आए दिन टुकड़े टूट-टूटकर गिरते हैं। कई बार कर्मचारी बच चुके हैं और विभाग को भी लिखित में दिया जा चुका है।
मगर अब तक भवन की मरम्मत नहीं कराई जाने से डर के साए में कार्य करने को विवश होना पड़ता है। कृषि विभाग के इस भवन का निर्माण 1992 में होना बताया जा रहा है। जब कि बिल्डिंग के हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों वर्ष पुरानी हो चुकी है। भवन निर्माण का कार्य करने वाली संस्था पर भी आरोप लगाए जाते रहते हैं, मगर जिस संस्था ने कार्य किया था वह पूरा भुगतान लेकर जा चुकी है अब सरकार पर दोहरी मार पड़ने जा रही है।
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प्रधान सहायक कृषि अनिल उपाध्याय का कहना है कि जब घर से दफ्तर की ओर आते हैं तो ऐसा लगता है कि आज जिंदगी दाव पर लगाकर जा रहे हैं। कब छत की पपड़ी (टुकड़ा) सिर पर गिर जाए कहा नहीं जा सकता। छत की हालत देखकर कोई भी कर्मचारी डर सकता है ऐसी स्थिति पैदा हो चुकी है।
वरिष्ठ प्राविधिक सहायक कृषि रघुवीर सिंह का कहना है कि अब तो खतरों रहने की आदत से पड़ गई है। शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा जिस दिन छत की पपड़ी सिर पर नहीं गिरती हो। मगर मजबूरी है कि यहां पर बैठकर कार्य किया जा रहा है।
उप संभागीय कृषि प्रसार अधिकारी सदर सत्य प्रकाश का कहना है कि अब तो छत से सरियां पूरी तरह से दिखने लगी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके कितने टुकड़े हम लोगों के सिर पर गिरे होंगे। भगवान का शुक्र है कि यहां पर कार्य करने वाले लोगों की जानें सलामत हैं।
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ठंडी सड़क से कटरा मोहल्ला को जाने वाले रास्ते पर स्थित उप कृषि निदेशक कार्यालय के प्रथम तल पर बैठकर कार्य कर रहे कर्मचारियों की मेज पर छत से टूटकर एक टुकड़ा गिर गया। जिससे मेज में छेद हो गया। कर्मचारियों का कहना है कि छत से आए दिन टुकड़े टूट-टूटकर गिरते हैं। कई बार कर्मचारी बच चुके हैं और विभाग को भी लिखित में दिया जा चुका है।
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मगर अब तक भवन की मरम्मत नहीं कराई जाने से डर के साए में कार्य करने को विवश होना पड़ता है। कृषि विभाग के इस भवन का निर्माण 1992 में होना बताया जा रहा है। जब कि बिल्डिंग के हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि सैकड़ों वर्ष पुरानी हो चुकी है। भवन निर्माण का कार्य करने वाली संस्था पर भी आरोप लगाए जाते रहते हैं, मगर जिस संस्था ने कार्य किया था वह पूरा भुगतान लेकर जा चुकी है अब सरकार पर दोहरी मार पड़ने जा रही है।
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प्रधान सहायक कृषि अनिल उपाध्याय का कहना है कि जब घर से दफ्तर की ओर आते हैं तो ऐसा लगता है कि आज जिंदगी दाव पर लगाकर जा रहे हैं। कब छत की पपड़ी (टुकड़ा) सिर पर गिर जाए कहा नहीं जा सकता। छत की हालत देखकर कोई भी कर्मचारी डर सकता है ऐसी स्थिति पैदा हो चुकी है।
वरिष्ठ प्राविधिक सहायक कृषि रघुवीर सिंह का कहना है कि अब तो खतरों रहने की आदत से पड़ गई है। शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा जिस दिन छत की पपड़ी सिर पर नहीं गिरती हो। मगर मजबूरी है कि यहां पर बैठकर कार्य किया जा रहा है।
उप संभागीय कृषि प्रसार अधिकारी सदर सत्य प्रकाश का कहना है कि अब तो छत से सरियां पूरी तरह से दिखने लगी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इसके कितने टुकड़े हम लोगों के सिर पर गिरे होंगे। भगवान का शुक्र है कि यहां पर कार्य करने वाले लोगों की जानें सलामत हैं।