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बलदेव में अगहन पूर्णिमा का लक्खी मेला आज से
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बलदेव (मथुरा)। ब्रजराज दाऊजी महाराज का 438 वां प्राकट्योत्सव 22 दिसंबर से मनाया जाएगा। इसी के साथ अगहन पूर्णिमा लक्खी मेला शुरू हो जाएगा। दाऊजी महाराज आज से रजाई (गद्दल) ओढ़ कर भक्तों को संदेश देंगे कि सर्दी अधिक है, इससे बचने का उपाय करो। प्रात: से ही शहनाई वादन होगा। ब्राह्मणों द्वारा बलभद्र सहस्त्र नाम का पाठ किया जाएगा। ठाकुर जी को पंचामृत केशर स्नान करा कर अभिषेक किया जाएगा तथा गर्म वस्त्र धारण कराए जाएंगे। ठाकुर जी को विशेष भोग में दोपहर को मेवायुक्त खीर व रात को गर्म मेवायुक्त दूध का भोग लगाया जाएगा। मेला दाऊजी महाराज के प्राकट्य से जुड़ा है। मेला पूर्णिमा से शुरू होकर एक माह तक चलेगा। बलदेव जी व माता रेवती का प्राकट्य मार्गशीर्ष शुक्ल 15 संवत 1638 सन 1582 को हुआ। मेला में लाखों श्रद्धालु ठाकुर जी के दर्शन करते हैं।
सबसे प्राचीन है दाऊजी का विग्रह
बलदेव। दाऊजी महाराज का श्रीविग्रह पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों के विग्रहों से प्राचीन है। यह कुषाणकालीन है। बलदेव का आठ फीट ऊंचा व साढ़े तीन फीट चौड़ा विग्रह है। विग्रह विशाल सिंहासन पर विराजमान है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं। बलदेव जी के समक्ष उनकी पत्नी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह बड़े ही सुंदर व मनोहारी भाव में विराजमान है।
दाऊजी व रेवती मैया की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
बलदेव। सर्दी में दाऊजी को विशेष रजाई ओढ़ाई जाती है। पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया कि दाऊजी व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर कपड़ा लगता है। जिसमें 12 किलो रुई भरी जाती है। कोट बनाने के लिए 56 मीटर गर्म कपड़ा लगता है।
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सबसे प्राचीन है दाऊजी का विग्रह
बलदेव। दाऊजी महाराज का श्रीविग्रह पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों के विग्रहों से प्राचीन है। यह कुषाणकालीन है। बलदेव का आठ फीट ऊंचा व साढ़े तीन फीट चौड़ा विग्रह है। विग्रह विशाल सिंहासन पर विराजमान है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं। बलदेव जी के समक्ष उनकी पत्नी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह बड़े ही सुंदर व मनोहारी भाव में विराजमान है।
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दाऊजी व रेवती मैया की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
बलदेव। सर्दी में दाऊजी को विशेष रजाई ओढ़ाई जाती है। पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया कि दाऊजी व रेवती मैया की रजाई में 75 मीटर कपड़ा लगता है। जिसमें 12 किलो रुई भरी जाती है। कोट बनाने के लिए 56 मीटर गर्म कपड़ा लगता है।
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