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स्वामी दयानंद सरस्वती नै मथुरा में लीनी दीक्षा
Updated Tue, 03 Apr 2018 08:16 PM IST
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मथुरा। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती की दीक्षा मथुरा में ही हुई थी। दयानंद सरस्वती ने जिस पाठशाला में दीक्षा ली थी, वह आज भी विश्रामघाट के निकट स्थित है।
बताते हैं कि 1855 में दयानंद सरस्वती हरिद्वार में दीक्षा के लिए तपस्वी सन्यासी पूर्णानंद सरस्वती से दीक्षा के लिए पहुंचे थे। उस वक्त पूर्णानंद की उम्र 116 साल होने के कारण उन्होंने मथुरा में दंडी विरजानंद स्वामी से दीक्षा लेने को कहा लेकिन, इसी दौरान 1857 की क्रांति की ज्वाला देशभर में फैलने के कारण दयानंद सरस्वती को मथुरा पहुंचने में तीन साल लग गए। 1859 को मथुरा पहुंचकर स्वामी दयानंद रंगेश्वर मंदिर में ठहरे। यहां दंडी विरजानंद स्वामी से मुलाकात के बाद दीक्षा शुरू की। उन्होंने तीन साल भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली में रहकर दीक्षा ली।
आर्य समाज के प्रचारक आचार्य स्वदेश बताते हैं कि दयानंद सरस्वती के गुरु विरजानंद स्वामी को आंखों से दिखाई नहीं देता था। विरजानंद स्वामी ने उनसे भोजन की व्यवस्था खुद ही करने के लिए कह दिया था। पहले कुछ माह तक तो दयानंद सरस्वती ने चने खाकर ही दीक्षा ली, लेकिन बाद में यह दायित्व अमरलाल जोशी ने ले लिया। विश्राम घाट के ऊपर लक्ष्मीनारायण मंदिर में रहने की व्यवस्था की। छत्ता बाजार के खेतामल सराफ ने पढ़ाई के दौरान दीया जलाने के लिए तेल की व्यवस्था की। कुछ माह में ही दयानंद स्वामी विरजानंद के प्रिय शिष्य हो गए थे। आर्य समाज के पूर्व चेयरमैन वीरेंद्र अग्रवाल बताते हैं स्वामी दयानंद की दीक्षा स्थली के चलते मथुरा में आर्य समाज का काफी विस्तार हुआ है।
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जीर्णशीर्ण कुटिया को दिया नया स्वरूप
विश्रामघाट के निकट स्वामी विरजानंद की कुटिया के जीर्ण-शीर्ण होने पर स्वतंत्र भारत में इसकी मरम्मत की गई। इसकी आधारशिला देश के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद ने रखी थी। वर्तमान में यहां बड़ा भवन मौजूद है।
मथुरा में आर्य समाज
महर्षि दयानंद सरस्वती जिला अस्पताल
दयानंद आर्य वैदिक विद्यालय
आर्य समाज गर्ल्स इंटर कालेज
वेद मंदिर (ब्रह्मानंद वैदिक साधना आश्रम)
गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन
डीएवी कालेज गोवर्धन
आर्य मंदिर मथुरा
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बताते हैं कि 1855 में दयानंद सरस्वती हरिद्वार में दीक्षा के लिए तपस्वी सन्यासी पूर्णानंद सरस्वती से दीक्षा के लिए पहुंचे थे। उस वक्त पूर्णानंद की उम्र 116 साल होने के कारण उन्होंने मथुरा में दंडी विरजानंद स्वामी से दीक्षा लेने को कहा लेकिन, इसी दौरान 1857 की क्रांति की ज्वाला देशभर में फैलने के कारण दयानंद सरस्वती को मथुरा पहुंचने में तीन साल लग गए। 1859 को मथुरा पहुंचकर स्वामी दयानंद रंगेश्वर मंदिर में ठहरे। यहां दंडी विरजानंद स्वामी से मुलाकात के बाद दीक्षा शुरू की। उन्होंने तीन साल भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली में रहकर दीक्षा ली।
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आर्य समाज के प्रचारक आचार्य स्वदेश बताते हैं कि दयानंद सरस्वती के गुरु विरजानंद स्वामी को आंखों से दिखाई नहीं देता था। विरजानंद स्वामी ने उनसे भोजन की व्यवस्था खुद ही करने के लिए कह दिया था। पहले कुछ माह तक तो दयानंद सरस्वती ने चने खाकर ही दीक्षा ली, लेकिन बाद में यह दायित्व अमरलाल जोशी ने ले लिया। विश्राम घाट के ऊपर लक्ष्मीनारायण मंदिर में रहने की व्यवस्था की। छत्ता बाजार के खेतामल सराफ ने पढ़ाई के दौरान दीया जलाने के लिए तेल की व्यवस्था की। कुछ माह में ही दयानंद स्वामी विरजानंद के प्रिय शिष्य हो गए थे। आर्य समाज के पूर्व चेयरमैन वीरेंद्र अग्रवाल बताते हैं स्वामी दयानंद की दीक्षा स्थली के चलते मथुरा में आर्य समाज का काफी विस्तार हुआ है।
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विश्रामघाट के निकट स्वामी विरजानंद की कुटिया के जीर्ण-शीर्ण होने पर स्वतंत्र भारत में इसकी मरम्मत की गई। इसकी आधारशिला देश के प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेंद्र प्रसाद ने रखी थी। वर्तमान में यहां बड़ा भवन मौजूद है।
मथुरा में आर्य समाज
महर्षि दयानंद सरस्वती जिला अस्पताल
दयानंद आर्य वैदिक विद्यालय
आर्य समाज गर्ल्स इंटर कालेज
वेद मंदिर (ब्रह्मानंद वैदिक साधना आश्रम)
गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन
डीएवी कालेज गोवर्धन
आर्य मंदिर मथुरा