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मतदाताओं ने तय कर दिया भाजपा-गठबंधन में कड़ा मुकाबला
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भाजपा और सपा
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एटा। प्रत्याशियों के भाग्य केेा फैसला ईवीएम में कैद हो गया है। मतदान केंद्रों पर उमड़ी हर वर्ग के मतदाताओं की भीड़ ने मन की बात भले न बताई हो लेकिन इशारों में ही सब कह दिया। बात चाहें पटियाली विस क्षेत्र की हो या मारहरा विस क्षेत्र की। लोकसभा क्षेत्र की पांचों विधानसभा क्षेत्र में इस बार रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा। मतगणना के दिन भी अंत तक यह स्पष्ट नहीं हो सकेगा कि जीत किसकी होगी।
चुनाव के पहले दिन से ही हावी हुए जातिगत समीकरणों के आगे मुद्दे दबकर रह गए। मतदान के दिन भी जातिगत आंकड़ेबाजी जमकर चली। लोकसभा सीट की पांच विधानसभा क्षेत्रों में कहीं लोधी तो कहीं यादव अधिक हैं। इसके बाद मुस्लिम, ब्राह्मण, शाक्य, वैश्य मतदाता प्रमुख माने जाते हैं। मतदान के दौरान सामान्य वर्ग के मतदाताओं की बूथों पर दिख रही अधिकता जहां भाजपा को बल देती है। वहीं मुस्लिम, यादव और एससी जाति के मतदाताओं ने भी मतदान प्रतिशत को 65 पार ले जाने में अहम भूमिका अदा की है। ऐसे में शांत रहे शाक्य मतदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं। अंदरखाने की माने तो शाक्य मतदाताओं ने अंत में अपना मन बदल लिया था। अब वह किस ओर रुख किए यह कहना तो अभी मुश्किल है। बात मतदाताओं की करें तो शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक जिस तरह उत्साह के साथ उन्होंने मतदान किया। वह भाजपा और गठबंधन को कड़े मुकाबले की ओर ले गया है। दोनों ही प्रत्याशी भले ही जीत के प्रति आश्वस्त लग रहे हों लेकिन जनता ने इशारों में ही सब कह दिया है।
भाजपा की मजबूती
1. लोध बहुल क्षेत्र होना और इस वोट का बंटवारा न होना।
2. पार्टी के परंपरागत वोटों को साधकर रखना और उनका विरोध नजर न आना।
3. सपा और बसपा के यादव बिरादरी के दिग्गजों का साथ आ जाना। राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव की पार्टी में मौजूदगी।
4. शहरी क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 60 फीसदी से अधिक रहना।
5. कल्याण सिंह के पुत्र का प्रत्याशी होना और मोदी की रैली होना।
6. लोकसभा क्षेत्र की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा होना।
सपा की मजबूती
1. सपा-बसपा का एक साथ होना।
2. मुस्लिम मतदाताओं का विभाजन न होना और 90 फीसदी गठबंधन को मिलना।
3. सपा प्रत्याशी डा. देवेंद्र यादव का स्थानीय होना।
4. पटियाली विधानसभा क्षेत्र में सपा की मजबूत पकड़ होना।
5. वर्तमान सांसद से लोगों की नाराजगी।
6. जहां गठबंधन का अधिक वोट है उन क्षेत्रों में अधिक मतदान प्रतिशत होना।
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चुनाव के पहले दिन से ही हावी हुए जातिगत समीकरणों के आगे मुद्दे दबकर रह गए। मतदान के दिन भी जातिगत आंकड़ेबाजी जमकर चली। लोकसभा सीट की पांच विधानसभा क्षेत्रों में कहीं लोधी तो कहीं यादव अधिक हैं। इसके बाद मुस्लिम, ब्राह्मण, शाक्य, वैश्य मतदाता प्रमुख माने जाते हैं। मतदान के दौरान सामान्य वर्ग के मतदाताओं की बूथों पर दिख रही अधिकता जहां भाजपा को बल देती है। वहीं मुस्लिम, यादव और एससी जाति के मतदाताओं ने भी मतदान प्रतिशत को 65 पार ले जाने में अहम भूमिका अदा की है। ऐसे में शांत रहे शाक्य मतदाता अहम भूमिका निभा सकते हैं। अंदरखाने की माने तो शाक्य मतदाताओं ने अंत में अपना मन बदल लिया था। अब वह किस ओर रुख किए यह कहना तो अभी मुश्किल है। बात मतदाताओं की करें तो शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक जिस तरह उत्साह के साथ उन्होंने मतदान किया। वह भाजपा और गठबंधन को कड़े मुकाबले की ओर ले गया है। दोनों ही प्रत्याशी भले ही जीत के प्रति आश्वस्त लग रहे हों लेकिन जनता ने इशारों में ही सब कह दिया है।
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भाजपा की मजबूती
1. लोध बहुल क्षेत्र होना और इस वोट का बंटवारा न होना।
2. पार्टी के परंपरागत वोटों को साधकर रखना और उनका विरोध नजर न आना।
3. सपा और बसपा के यादव बिरादरी के दिग्गजों का साथ आ जाना। राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव की पार्टी में मौजूदगी।
4. शहरी क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 60 फीसदी से अधिक रहना।
5. कल्याण सिंह के पुत्र का प्रत्याशी होना और मोदी की रैली होना।
6. लोकसभा क्षेत्र की पांचों विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा होना।
सपा की मजबूती
1. सपा-बसपा का एक साथ होना।
2. मुस्लिम मतदाताओं का विभाजन न होना और 90 फीसदी गठबंधन को मिलना।
3. सपा प्रत्याशी डा. देवेंद्र यादव का स्थानीय होना।
4. पटियाली विधानसभा क्षेत्र में सपा की मजबूत पकड़ होना।
5. वर्तमान सांसद से लोगों की नाराजगी।
6. जहां गठबंधन का अधिक वोट है उन क्षेत्रों में अधिक मतदान प्रतिशत होना।