{"_id":"5c62fbe0bdec22739a5bf421","slug":"11549990880-agra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"आधी आबादी को घूंघट से बाहर निकालने की पहल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आधी आबादी को घूंघट से बाहर निकालने की पहल
विज्ञापन
demo pic
- फोटो : अमर उजाला
कासगंज। ग्राम पंचायतों में घूंघट की ओट हटाकर महिला ग्राम प्रधान अभी भी दहलीज के बाहर नहीं आ पा रही हैं। तमाम पंचायतों में प्रधानों के पति ही गांव की सरकार चला रहे हैं। ऐसे में जिला प्रशासन के निर्देश पर पंचायत राज विभाग ने प्रधानों के पतियों के हस्तक्षेप पर अंकुश लगाने की योजना बनाई है।
जिले में 423 ग्राम पंचायतें हैं। महिला आरक्षण के चलते पंचायत चुनाव में 222 ग्राम पंचायतों में सरकार की कमान महिलाओं के हाथ में सौंपी गई। मतदाताओं ने महिलाओं को सिरमौर बनाया। उम्मीद थी कि ग्राम पंचायतों की सूरत बदलने के लिए महिलाएं आगे आएंगी और गांव की तस्वीर चमकेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बुजुर्गों की लोकलाज और गांव की परंपराओं ने तमाम महिलाओं को घूंघट की ओट से बाहर नहीं आने दिया। अधिकांश ग्राम प्रधानों के पति ही गांव की सरकार चला रहे हैं। दस्तावेजों पर प्रधानपति ही हस्ताक्षर कर प्रस्ताव तैयार कर लेते हैं। ऐसे में महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है। निर्वाचन आयोग ने महिला आरक्षण देकर उन्हें अधिकार दिया, लेकिन गांव की परंपराओं ने अधिकार पर महिलाओं को कब्जा नहीं करने दिया। अब प्रशासन ने इस ओर ध्यान दिया है। महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए योजना बनाई गई है। जिला पंचायत राज अधिकारी ने सभी विकास खंडों को पत्र भेजकर दस्तावेजों को महिला ग्राम प्रधानों के हस्ताक्षर से तैयार कराने के निर्देश दिए हैं। स्पष्ट कहा है कि कहीं भी प्रधानपतियों का हस्तक्षेप दस्तावेजों में न हो।
नहीं होती खुली बैठकें
कासगंज। जिले की ग्राम पंचायतों में खुलीं बैठकों की औपचारिकताएं भी नहीं होती हैं। प्रस्ताव बिना बैठकों के पास कर लिए जाते हैं। ग्राम पंचायत सदस्यों को अपने अधिकार भी नहीं पता हैं। ऐसे में ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता के साथ काम नहीं हो पा रहा है।
विज्ञापन
- सभी विकासखंडों को पत्र भेजकर निर्देशित किया गया है कि ग्राम प्रधानों के पतियों का हस्तक्षेप पंचायतों के दस्तावेजों में नहीं होना चाहिए। ग्राम प्रधानपति मनमानी नहीं कर सकेंगे।
विश्वनाथ सिंह, जिला पंचायतराज अधिकारी।
विज्ञापन
जिले में 423 ग्राम पंचायतें हैं। महिला आरक्षण के चलते पंचायत चुनाव में 222 ग्राम पंचायतों में सरकार की कमान महिलाओं के हाथ में सौंपी गई। मतदाताओं ने महिलाओं को सिरमौर बनाया। उम्मीद थी कि ग्राम पंचायतों की सूरत बदलने के लिए महिलाएं आगे आएंगी और गांव की तस्वीर चमकेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बुजुर्गों की लोकलाज और गांव की परंपराओं ने तमाम महिलाओं को घूंघट की ओट से बाहर नहीं आने दिया। अधिकांश ग्राम प्रधानों के पति ही गांव की सरकार चला रहे हैं। दस्तावेजों पर प्रधानपति ही हस्ताक्षर कर प्रस्ताव तैयार कर लेते हैं। ऐसे में महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है। निर्वाचन आयोग ने महिला आरक्षण देकर उन्हें अधिकार दिया, लेकिन गांव की परंपराओं ने अधिकार पर महिलाओं को कब्जा नहीं करने दिया। अब प्रशासन ने इस ओर ध्यान दिया है। महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए योजना बनाई गई है। जिला पंचायत राज अधिकारी ने सभी विकास खंडों को पत्र भेजकर दस्तावेजों को महिला ग्राम प्रधानों के हस्ताक्षर से तैयार कराने के निर्देश दिए हैं। स्पष्ट कहा है कि कहीं भी प्रधानपतियों का हस्तक्षेप दस्तावेजों में न हो।
विज्ञापन
नहीं होती खुली बैठकें
कासगंज। जिले की ग्राम पंचायतों में खुलीं बैठकों की औपचारिकताएं भी नहीं होती हैं। प्रस्ताव बिना बैठकों के पास कर लिए जाते हैं। ग्राम पंचायत सदस्यों को अपने अधिकार भी नहीं पता हैं। ऐसे में ग्राम पंचायतों में पारदर्शिता के साथ काम नहीं हो पा रहा है।
विज्ञापन
- सभी विकासखंडों को पत्र भेजकर निर्देशित किया गया है कि ग्राम प्रधानों के पतियों का हस्तक्षेप पंचायतों के दस्तावेजों में नहीं होना चाहिए। ग्राम प्रधानपति मनमानी नहीं कर सकेंगे।
विश्वनाथ सिंह, जिला पंचायतराज अधिकारी।