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जवाहर बाग में पुलिस गोली न चलाती तो सैकड़ों मारे जाते
Updated Sun, 16 Jul 2017 12:04 AM IST
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ये है जवाहर बाग।
- फोटो : अमर उजाला
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मथुरा। अगर जवाहर बाग में पुलिस को गोली चलाने का आदेश न दिया होता तो सैकड़ों लोग मारे जाते। कब्जाधारियों के पास बम थे। पिस्टल और तमंचों से गोली चला रहे थे। पेड़ों पर बैठकर फायर कर रहे थे। पुलिस को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ता। आसपास की कालोनियों में सैकड़ों लोग रहते हैं। फायरिंग का आदेश देने वाले सिटी मजिस्ट्रेट और एसपीआरए ने सीबीआई के समक्ष यह रिपोर्ट पेश कर दी है।
मथुरा के जवाहर बाग में 2 जून, 2016 की शाम करीब साढ़े चार बजे हिंसा शुरू हुई थी। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी जवाहरबाग में फोर्स के घुसने का रास्ता बनवाने के लिए दीवार तुड़वा रहे थे। तभी भीड़ ने हमला कर दिया था। भीड़ ने फायरिंग शुरू कर दी थी। थानाध्यक्ष संतोष यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी। जबकि भीड़ ने एसपी सिटी पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया था। जब हालात बिगड़े तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाहर बाग में आग भी लग गई थी।
इस हिंसा में दो पुलिस अधिकारियों समेत 29 लोगों की मौत हो गई थी। हिंसा की जांच कर रही सीबीआई ने फायरिंग का आदेश देने वाले तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट रामअरज यादव और एसपीआरए अरुण कुमार सिंह से भी पूछताछ की। अधिकारियों ने कहा कि अगर पुलिस को फायरिंग का आदेश न दिया गया होता तो हालात बेहद खराब होते। पुलिस के भी तमाम लोग मारे जाते। जवाहर बाग के आसपास कई कालोनियां हैं, जिनमें सैकड़ों लोग रहते हैं। इन लोगों को भी नुकसान हो सकता था। इसलिए पुलिस को फायरिंग का आदेश दिया गया था।
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बौखला गए थे पुलिस वाले
एसपी सिटी और थानाघ्यक्ष की मौत के बाद पुलिस भी बौखला गई थी। एक बार को तो स्थिति यह बन गई थी अधिकारियों के कहने पर भी पुलिस वाले रुक नहीं रहे थे। जो भी मिला उसी को लठिया दिया। फायरिंग भी खूब की गई थी। सीबीआई को कब्जाधारियों ने जो अपने बयान दर्ज कराए हैं उसमें कहा है कि थानों में ले जाकर भी पीटा गया था। पुलिस वालों ने महिलाओं और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा था।
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मथुरा के जवाहर बाग में 2 जून, 2016 की शाम करीब साढ़े चार बजे हिंसा शुरू हुई थी। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी जवाहरबाग में फोर्स के घुसने का रास्ता बनवाने के लिए दीवार तुड़वा रहे थे। तभी भीड़ ने हमला कर दिया था। भीड़ ने फायरिंग शुरू कर दी थी। थानाध्यक्ष संतोष यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी। जबकि भीड़ ने एसपी सिटी पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया था। जब हालात बिगड़े तो पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाहर बाग में आग भी लग गई थी।
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इस हिंसा में दो पुलिस अधिकारियों समेत 29 लोगों की मौत हो गई थी। हिंसा की जांच कर रही सीबीआई ने फायरिंग का आदेश देने वाले तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट रामअरज यादव और एसपीआरए अरुण कुमार सिंह से भी पूछताछ की। अधिकारियों ने कहा कि अगर पुलिस को फायरिंग का आदेश न दिया गया होता तो हालात बेहद खराब होते। पुलिस के भी तमाम लोग मारे जाते। जवाहर बाग के आसपास कई कालोनियां हैं, जिनमें सैकड़ों लोग रहते हैं। इन लोगों को भी नुकसान हो सकता था। इसलिए पुलिस को फायरिंग का आदेश दिया गया था।
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बौखला गए थे पुलिस वाले
एसपी सिटी और थानाघ्यक्ष की मौत के बाद पुलिस भी बौखला गई थी। एक बार को तो स्थिति यह बन गई थी अधिकारियों के कहने पर भी पुलिस वाले रुक नहीं रहे थे। जो भी मिला उसी को लठिया दिया। फायरिंग भी खूब की गई थी। सीबीआई को कब्जाधारियों ने जो अपने बयान दर्ज कराए हैं उसमें कहा है कि थानों में ले जाकर भी पीटा गया था। पुलिस वालों ने महिलाओं और बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा था।