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मोहब्बत की जुबां पहचानते थे कैफी आजमी
Lucknow
Updated Sat, 11 May 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। अपनी शायरी और गीतों से हमेशा के लिए दिलों में बस चुके शायर कैफी आजमी को शहर ने उनकी 11वीं पुण्यतिथि पर याद किया। संगीत नाटक अकादमी में आल इंडिया कैफी आजमी एकेडमी की ओर से शुक्रवार को आयोजित कार्यक्रम में अकादमी ने गीतकार नीरज और नामी शायर प्रो. वसीम बरेलवी समेत तीन को कैफी आजमी अवार्ड से नवाजा। आयोजन के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव रहे। समारोह को यादगार बनाया उनकी बेटी अभिनेत्री शबाना आजमी और गीतकार-संवाद लेखक सांसद जावेद अख्तर ने। ‘कैफी और मैं’ नाटक के जरिए लोगों को मशहूर शायर की जिंदगी से रूबरू कराया गया। अवार्ड समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि वे मिट्टी से जुड़े शायर थे। वे हमेशा ही अपनी जड़ों से जुड़े रहे। इसकी छाप उनकी रचनाओं में दिखती है। उन्होंने अपने जीवन में तमाम ऊंचाइयां देखी और प्रदेश को भी पहचान दी। इससे पहले उन्होंने यहां गीतकार गोपाल दास नीरज, शायर प्रो. वसीम बरेलवी और चित्रकूट से महिलाओं की सहायता से निकाले जा रहे अखबार ‘खबर लहरिया’ की संपादक शालिनी जोशी को कैफी आजमी अवार्ड से नवाजा। सभी को अंगवस्त्र, स्मृति चिह्न व प्रशस्ति पत्र दिया गया। उप्र भाषा संस्थान के अध्यक्ष और गीतकार गोपाल दास नीरज ने कैफी आजमी को अपना बड़ा भाई बताते हुए उनके साथ अरसे तक बिताए लम्हों को याद किया। इसमें मुंबई में उनसे मुलाकात से लेकर यशभारती तक का जिक्र रहा। नीरज ने कहा कि वे हिंदी उर्दू में कोई भेद नहीं जानते वे तो बस प्रेम की भाषा को पहचानते थे। इस दौरान उन्होंने सुनाया अब तो ऐसा भी कोई मजहब चलाया जाए.. सुनाने के बाद अब उजालों को यहां वनवास देना पड़ेगा, सूर्य के बेटे अंधेरे का समर्थन कर रहे हैं.. सुनाया। प्रो. वसीम बरेलवी ने उर्दू अदब की शख्सियत के नाम पर पुरस्कार पाने पर खुशी जताते हुए कहा कि कैफी के कहने और करने में कोई फर्क नहीं रहा। उन्होंने जो कहा वो किया। उनसे जुड़े 1969 के एक कि स्से को याद करते हुए बताया कि वे मानते थे कि हिंदुस्तान का शायर होने के लिए अवाम के बीच जाना जरूरी है। इस अवसर पर कैफी आजमी अवार्ड से नवाजी गई वरिष्ठ पत्रकार शालिनी जोशी ने भी अपनी बात रखी।
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