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विश्वविद्यालयों की मर्जी पर एक वर्षीय एल-एल.एम
Lucknow
Updated Thu, 31 Jan 2013 05:30 AM IST
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लखनऊ। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग नए सत्र से एल-एल.एम की पढ़ाई एक वर्ष में समाप्त करने की तैयारी तो कर रहा है, लेकिन इसे लागू करना विश्वविद्यालयों की मर्जी पर ही निर्भर करेगा। यूजीसी ने इस व्यवस्था को ऐच्छिक बनाया है। ऐसे में विश्वविद्यालयों में चल रहे दो वर्षीय एल-एल.एम पाठ्यक्रम पर कोई खतरा नहीं है। एक वर्षीय पाठ़्यक्रम के लिए विश्वविद्यालयों को नियम एवं प्रक्रिया के स्तर पर बदलाव भी करने होंगे।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने मास्टर ऑफ लॉ की पढ़ाई को एक वर्ष का करने का मन बनाया है। तर्क यह है कि सामान्य तौर पर पीजी की डिग्री लेने में 17 वर्ष लगते हैं, लेकिन एल-एल.एम की डिग्री में विद्यार्थी को 20 वर्ष खर्च करने लगते होते हैं। इंटीग्रेटेड फाइव ईयर कोर्स हो तो 19 साल में एल-एल.एम की डिग्री मिल जाती है। एक वर्ष का एल-एल.एम होने पर छात्रों का कम समय लगेगा। हालांकि इस संदर्भ में यूजीसी की कमेटी ने जो गाइडलाइन जारी की है, उसे देखते हुए अधिकतर राज्य विश्वविद्यालयों में इसे लागू करना दूर की कौड़ी लग रही है। यही वजह है कि अभी एक वर्ष के पाठ्यक्रम को यूजीसी ने ऐच्छिक बनाया है। सत्र 2013-14 से इसे विश्वविद्यालय लागू तो कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें नियम एवं प्रक्रिया संशोधित करनी होगी। खास बात यह है कि ज्यादातर विश्वविद्यालय अभी मुश्किल से समेस्टर सिस्टम ही पीजी में लागू कर पाए हैं, ट्राईमेस्टर लागू करना उनके लिए और टेढ़ी खीर साबित होगी। ऐसे में अधिकतर राज्य विश्वविद्यालयों में फिलहाल पुराने स्वरूप पर ही लॉ में पीजी की पढ़ाई जारी रहेगी। लखनऊ विश्वविद्यालय भी इस प्रयोग के लिए तैयार नहीं लग रहा है। लॉ फैकेल्टी के डीन प्रो. ओएन मिश्र कहते हैं कि एक वर्ष के पाठ्यक्रम में औपचारिकताएं अधिक बढ़ेंगी और पढ़ाई कम हो पाएगी। छात्र पाठ्यक्रम एवं परीक्षा कार्यक्रम में ही उलझे रहेंगे तो पढ़ाई कब करेंगे। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्कूल फॉर लीगल स्टडीज की डीन प्रो. प्रीति सक्सेना कहती हैं कि यूजीसी की गाइडलाइन देखने के बाद ही पाठ्यक्रम में परिवर्तन के बारे में सोचा जाएगा, जो छात्रों के लिए फायदेमंद होगा वही निर्णय लिया जाएगा।
पहले तो शिक्षकों को ही करनी होगी पढ़ाई
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक वर्ष के एल-एल.एम पाठ्यक्रम का जो खाका खींचा है, उसे पढ़ाने के लिए पहले शिक्षकों को ही पढ़ाई करनी पड़ेगी। एक तो यूजीसी ने इसे कोर डिग्री की जगह छह स्पेशलाइज्ड कोर्स में बांटने का सुझाव दिया है। दूसरे, पाठ्यक्रम में लॉ के कई ऐसे नए आयाम शामिल किए गए हैं, जो अभी तक बहुत से विश्वविद्यालयों के लीगल एजुकेशन सिस्टम से अछूते हैं। मसलन एजुकेशन लॉ, हेल्थ लॉ, डिजास्टर मैनेजमेंट लॉ आदि अब भी ज्यादातर राज्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। हाउसिंग एवं अर्बन डवलपमेंट, टेलीकम्यूनिकेशन लॉ भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। प्रो. ओएन मिश्र कहते हैं कि पीजी पाठ्यक्रमों की संरचना आम तौर पर दो वर्ष की ही होती है। व्यापक पाठ्यक्रम एवं लघु शोध आदि को देखते हुए एक साल में एल-एल.एम को समेटना न शिक्षक की दृष्टि से व्यवहारिक है और न ही छात्र के लिए फायदेमंद। कभी-कभी तो केवल लघु शोध में ही एक साल में लग जाते हैं। दूसरे लॉ के जिन नए ट्रेंड को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात की जा रही है, उसके लिए पहले शिक्षकों को ही प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ेगी।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने मास्टर ऑफ लॉ की पढ़ाई को एक वर्ष का करने का मन बनाया है। तर्क यह है कि सामान्य तौर पर पीजी की डिग्री लेने में 17 वर्ष लगते हैं, लेकिन एल-एल.एम की डिग्री में विद्यार्थी को 20 वर्ष खर्च करने लगते होते हैं। इंटीग्रेटेड फाइव ईयर कोर्स हो तो 19 साल में एल-एल.एम की डिग्री मिल जाती है। एक वर्ष का एल-एल.एम होने पर छात्रों का कम समय लगेगा। हालांकि इस संदर्भ में यूजीसी की कमेटी ने जो गाइडलाइन जारी की है, उसे देखते हुए अधिकतर राज्य विश्वविद्यालयों में इसे लागू करना दूर की कौड़ी लग रही है। यही वजह है कि अभी एक वर्ष के पाठ्यक्रम को यूजीसी ने ऐच्छिक बनाया है। सत्र 2013-14 से इसे विश्वविद्यालय लागू तो कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें नियम एवं प्रक्रिया संशोधित करनी होगी। खास बात यह है कि ज्यादातर विश्वविद्यालय अभी मुश्किल से समेस्टर सिस्टम ही पीजी में लागू कर पाए हैं, ट्राईमेस्टर लागू करना उनके लिए और टेढ़ी खीर साबित होगी। ऐसे में अधिकतर राज्य विश्वविद्यालयों में फिलहाल पुराने स्वरूप पर ही लॉ में पीजी की पढ़ाई जारी रहेगी। लखनऊ विश्वविद्यालय भी इस प्रयोग के लिए तैयार नहीं लग रहा है। लॉ फैकेल्टी के डीन प्रो. ओएन मिश्र कहते हैं कि एक वर्ष के पाठ्यक्रम में औपचारिकताएं अधिक बढ़ेंगी और पढ़ाई कम हो पाएगी। छात्र पाठ्यक्रम एवं परीक्षा कार्यक्रम में ही उलझे रहेंगे तो पढ़ाई कब करेंगे। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में स्कूल फॉर लीगल स्टडीज की डीन प्रो. प्रीति सक्सेना कहती हैं कि यूजीसी की गाइडलाइन देखने के बाद ही पाठ्यक्रम में परिवर्तन के बारे में सोचा जाएगा, जो छात्रों के लिए फायदेमंद होगा वही निर्णय लिया जाएगा।
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पहले तो शिक्षकों को ही करनी होगी पढ़ाई
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक वर्ष के एल-एल.एम पाठ्यक्रम का जो खाका खींचा है, उसे पढ़ाने के लिए पहले शिक्षकों को ही पढ़ाई करनी पड़ेगी। एक तो यूजीसी ने इसे कोर डिग्री की जगह छह स्पेशलाइज्ड कोर्स में बांटने का सुझाव दिया है। दूसरे, पाठ्यक्रम में लॉ के कई ऐसे नए आयाम शामिल किए गए हैं, जो अभी तक बहुत से विश्वविद्यालयों के लीगल एजुकेशन सिस्टम से अछूते हैं। मसलन एजुकेशन लॉ, हेल्थ लॉ, डिजास्टर मैनेजमेंट लॉ आदि अब भी ज्यादातर राज्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। हाउसिंग एवं अर्बन डवलपमेंट, टेलीकम्यूनिकेशन लॉ भी इसी श्रेणी में रखे जा सकते हैं। प्रो. ओएन मिश्र कहते हैं कि पीजी पाठ्यक्रमों की संरचना आम तौर पर दो वर्ष की ही होती है। व्यापक पाठ्यक्रम एवं लघु शोध आदि को देखते हुए एक साल में एल-एल.एम को समेटना न शिक्षक की दृष्टि से व्यवहारिक है और न ही छात्र के लिए फायदेमंद। कभी-कभी तो केवल लघु शोध में ही एक साल में लग जाते हैं। दूसरे लॉ के जिन नए ट्रेंड को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात की जा रही है, उसके लिए पहले शिक्षकों को ही प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ेगी।
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